नेपल्स का मोंटे सेंट’आंजेलो स्टेशन : कला और वास्तुकला का अनूठा संगम

भारतीय मूल के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार अनीश कपूर ने सार्वजनिक स्थान और कला के रिश्ते को एक नया रूप देते हुए हाल ही में इटली के नेपल्स शहर में मोंटे सेंट’आंजेलो सबवे स्टेशन का डिज़ाइन तैयार किया है। यह स्टेशन केवल आवागमन की सुविधा नहीं, बल्कि एक कलात्मक अनुभव के रूप में देखा जा रहा है।

इस परियोजना की शुरुआत 2003 में हुई थी और इसके पूर्ण होने में लगभग दो दशक लगे। कपूर ने इस डिज़ाइन को लंदन की वास्तुशिल्प फर्म फ्यूचर सिस्टम्स (Jan Kaplický और Amanda Levete) के साथ मिलकर आकार दिया। उद्देश्य था — भूमिगत यात्रा को एक साधारण तकनीकी प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर उसे एक सांस्कृतिक और सौंदर्यात्मक अनुभव बनाना।

स्टेशन के दो प्रवेश-द्वार (entrances) हैं, जो पूरी तरह से मूर्तिकला जैसी संरचनाओं के रूप में गढ़े गए हैं।

  • पहला द्वार weathering steel से बना है, जो मिट्टी से उभरते किसी जीवित प्राणी की तरह प्रतीत होता है। यह कच्चा, असंपूर्ण और आदिम अहसास कराता है।
  • दूसरा द्वार इसके विपरीत है — चिकना, ट्यूबुलर और परिष्कृत, जो नियंत्रित और सुस्पष्ट शिल्प रूप को व्यक्त करता है।

इन दोनों में एक तरह का द्वंद्व और संवाद है — आदिम और आधुनिक, अराजक और नियंत्रित, शरीर और शून्य।

कपूर ने इस डिज़ाइन में तीन प्रमुख विषयों को सामने रखा है — पौराणिक वस्तु (mythical object), शरीर (the body) और शून्य (the void)। नेपल्स के निकट माउंट वेसुवियस ज्वालामुखी और दांते के Inferno (नरक के द्वार) की कल्पना को आधार बनाकर उन्होंने स्टेशन को ऐसा रूप दिया है, जो ‘भूमिगत’ होने के वास्तविक और मानसिक अनुभव को दर्शाता है।

स्टेशन की सुरंगें और भीतरी दीवारें अपेक्षाकृत रॉ यानी कच्ची अवस्था में रखी गई हैं। सजावट की चमक-दमक से अधिक यहाँ निर्माण की सच्चाई और मूर्तिकला का गहन प्रभाव महसूस होता है। यात्री जब इन द्वारों से नीचे उतरते हैं तो उन्हें लगता है जैसे वे केवल एक स्टेशन में नहीं, बल्कि एक कलात्मक यात्रा में प्रवेश कर रहे हों।

यह स्टेशन औपचारिक रूप से 11 सितम्बर 2025 को सार्वजनिक उपयोग के लिए खोला गया। मोंटे सेंट’आंजेलो स्टेशन इस बात का प्रमाण है कि कला और वास्तुकला मिलकर न केवल यातायात की संरचना गढ़ सकती है, बल्कि नागरिक जीवन को भी नए अनुभवों और प्रतीकों से समृद्ध कर सकती है।

शून्य (The Void) की अवधारणा

अनीश कपूर की कला में शून्य (Void) केवल खालीपन नहीं है, बल्कि एक सक्रिय दार्शनिक और आध्यात्मिक रूपक है। उनके कार्यों में शून्य अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि अनंत उपस्थिति को दर्शाता है—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ दृष्टि और चेतना दोनों खिंचकर प्रवेश करते हैं।

  • Descension (2015) में घूमते हुए काले जल का गोलाकार भंवर दर्शकों को निगलने वाला प्रतीत होता है।
  • Sky Mirror या Cloud Gate में शून्य प्रतिबिंब की शक्ल में सामने आता है—जहाँ वास्तविकता और भ्रम की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।

मोंटे सेंट’आंजेलो स्टेशन में यही शून्य, भूमिगत अंधकार और ज्वालामुखीय गहराई के प्रतीक के रूप में प्रकट होता है। यात्री जब स्टेशन में उतरते हैं तो वे दरअसल एक “अनुभवात्मक शून्य” में प्रवेश करते हैं।

विदित हो कि कपूर के इन शिल्पों में प्रवेश-द्वार केवल आर्किटेक्चरल कार्य नहीं करते, बल्कि वे अनुभवात्मक सीमाओं को तोड़ते हैं।

  • जैसे Marsyas (2002, Tate Modern) में विशाल लाल झिल्ली जैसी संरचना, एक जैविक द्वार की तरह दर्शकों को भीतर खींच लेती है।
  • वहीँ Orbit Tower में सर्पिल संरचना चढ़ाई और अवरोहण, दोनों की प्रतीकात्मक यात्रा प्रस्तुत करती है।

इसी प्रकार मोंटे सेंट’आंजेलो स्टेशन के दो द्वार—एक कच्चा और दूसरा चिकना—मानव अस्तित्व के दो विपरीत आयामों के प्रतीक हैं। यह केवल वास्तुकला का प्रवेश-द्वार नहीं, बल्कि दार्शनिक यात्रा का आरंभ बिंदु भी है।

वस्तुतः अनीश कपूर के लिए “शून्य” और “प्रवेश” परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे एक-दूसरे को परिभाषित करते हैं। शून्य तभी अनुभव होता है जब उसके भीतर प्रवेश किया जाए, और प्रवेश-द्वार का अर्थ तभी बनता है जब वह किसी शून्य या अनदेखी गहराई की ओर ले जाए।

  • नेपल्स स्टेशन इसका मूर्त रूप है: द्वार से भीतर जाते ही यात्री केवल एक स्टेशन में नहीं, बल्कि एक भौतिक-दार्शनिक शून्य में प्रवेश करता है।

इस प्रकार, अनीश कपूर की कलात्मक भाषा में मोंटे सेंट’आंजेलो स्टेशन एक अनूठा प्रयोग है, जहाँ सार्वजनिक उपयोगिता और दार्शनिक प्रतीकात्मकता एक साथ आते हैं। यहाँ प्रवेश-द्वार केवल आवागमन का मार्ग नहीं, बल्कि अस्तित्व और शून्यता की दार्शनिक यात्रा का रूपक है।

शून्य, प्रवेश और भारतीय दार्शनिक संदर्भ

शून्यवाद और कपूर का शून्य (“Void”) : बौद्ध दर्शन में शून्यवाद (Śūnyavāda) यह कहता है कि सभी वस्तुएँ स्वभावतः शून्य हैं — उनका कोई स्थायी, स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। यह शून्यता नकारात्मक रिक्तता नहीं, बल्कि सभी संभावनाओं का स्रोत है। अनीश कपूर के कार्यों में यही भाव झलकता है।

  • उनकी मूर्तियों के भीतर का गहरा अंधकार (जैसे Void, Descent into Limbo) एक ऐसी शून्यता है जो दर्शक को भयभीत भी करती है और आकर्षित भी।
  • मोंटे सेंट’आंजेलो स्टेशन का प्रवेश भी एक “शून्य” की यात्रा है — यात्री भूमिगत अंधकार में उतरते हुए उस अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं, जहाँ रिक्तता ही सार बन जाती है।

अद्वैत वेदांत और “प्रवेश” : अद्वैत वेदांत का मुख्य सूत्र है — ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः। यानी अंतिम सत्य अद्वैत (एकत्व) है, और विविधता केवल आभास है। कपूर की कला में प्रवेश-द्वार इस अद्वैत अनुभव का संकेत देते हैं।

  • द्वार बाहर और भीतर, दृश्य और अदृश्य, भौतिक और आध्यात्मिक के बीच की सीमा को तोड़ देते हैं।
  • नेपल्स स्टेशन के दो विपरीत द्वार (कच्चा और चिकना) भी अद्वैत के इसी द्वंद्वात्मक भाव को व्यक्त करते हैं—भिन्नता के बावजूद उनका सत्य एक ही है।

भारतीय प्रतीकवाद और अनीश कपूर

भारतीय मंदिर वास्तुकला में गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) तक जाने के लिए अनेक प्रवेश-द्वार होते हैं। यह यात्रा बाहर की चहल-पहल से भीतर के मौन और शून्य की ओर ले जाती है। कपूर का स्टेशन भी इसी परंपरा का आधुनिक रूप प्रतीत होता है।

  • जैसे गर्भगृह में अंधकारमय शून्य ईश्वर का प्रतीक है, वैसे ही स्टेशन का भूमिगत शून्य मानव अस्तित्व की गहराई का प्रतीक बन जाता है।
  • दोनों ही यात्राएँ बाहर से भीतर और स्थूल से सूक्ष्म की ओर हैं।

इस तरह अनीश कपूर का मोंटे सेंट’आंजेलो स्टेशन न केवल एक आधुनिक स्थापत्य-कला का उदाहरण है, बल्कि वह भारतीय दार्शनिक परंपराओं—बौद्ध शून्यवाद और अद्वैत वेदांत—की वैश्विक अभिव्यक्ति भी है। यह कला-स्थापना हमें यह सोचने पर विवश करती है कि शून्यता केवल अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उपस्थिति का गहनतम रूप है, और प्रवेश केवल भौतिक मार्ग नहीं, बल्कि आत्मिक यात्रा की शुरुआत है।

स्रोत : chatgpt

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