22 मार्च दिन रविवार की वह शाम जैसे समय के कैनवास पर अचानक गहरे स्याह रंग की तरह उतर आई। कला समीक्षक सुमन कुमार सिंह के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने यह असह्य समाचार दिया कि कलागुरु प्रो. बीरेश्वर भट्टाचार्य अब हमारे बीच नहीं रहे। यह खबर केवल एक व्यक्ति के जाने की सूचना नहीं थी, बल्कि जैसे भारतीय कला-जगत की एक पूरी संवेदनात्मक परंपरा के मौन हो जाने की अनुभूति थी। निःसंदेह बीरेश्वर दा के निधन से एक युग का अवसान हुआ है।
भूपेन्द्र कुमार अस्थाना
विडंबना यह है कि जिन दिनों उनके सम्मान में 23 और 24 मार्च 2026 को आयोजित होने वाले दो दिवसीय कार्यक्रम की तैयारियाँ पूरे उत्साह के साथ चल रही थीं—जहाँ 24 मार्च को उन पर केंद्रित मोनोग्राफ और पुस्तक का विमोचन होना था—उसी समय नियति ने एक अप्रत्याशित विराम खींच दिया। 22 मार्च 2026 की संध्या, ठीक 3:35 बजे, वे इस नश्वर संसार से विदा लेकर अनंत में विलीन हो गए। 23 मार्च को कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटना के परिसर में “भारतीय कला में आधुनिकता” विषय पर संगोष्ठी आयोजित होनी थी, जिसमें वक्ता के रूप में अशोक भौमिक उपस्थित होने वाले थे, साथ ही छात्र-छात्राओं की पोर्ट्रेट पेंटिंग कार्यशाला भी प्रस्तावित थी। 24 मार्च को उन पर केंद्रित मोनोग्राफ और पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम तो हुआ—किन्तु उसका स्वर बदल चुका था। उत्सव की जगह वहाँ एक गहरी, सन्नाटे भरी श्रद्धा थी। बड़ी संख्या में उपस्थित विद्यार्थियों, कलाकारों और कला-प्रेमियों ने नम आँखों से अपने गुरुदेव को याद किया—मानो हर चेहरा एक जीवित स्मृति बन गया हो।
बीरेश्वर भट्टाचार्जी (26 जुलाई 1935 – 22 मार्च 2026) ने 91 वर्षों का भरपूर जीवन जिया—पर यह मात्र समय की लंबाई नहीं, बल्कि अनुभवों, संघर्षों और सृजन की एक विराट यात्रा थी। यह केवल उनकी आयु का विस्तार नहीं, बल्कि एक युग की चेतना का विस्तार था।
उनसे व्यक्तिगत भेंट का अवसर भले ही न मिल सका, पर उनकी कृतियों, उनके बारे में सुनी बातों और पढ़े गए शब्दों के माध्यम से उनकी कला-यात्रा को भीतर तक महसूस कर सकता हूँ । अपनी राष्ट्रीय छात्रवृत्ति के दौरान उनसे दूरभाष पर हुई एक लंबी बातचीत आज भी स्मृतियों में एक जीवंत रेखाचित्र की तरह अंकित है—धीरे-धीरे उभरती, गहराती और अंततः आत्मा को छूती हुई।
उनकी कला के संसार में प्रवेश करना दरअसल अपने समय के असुविधाजनक सच से साक्षात्कार करना है। उन्होंने चित्रकला को केवल रंगों और आकृतियों का खेल नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक सजग, संवेदनशील और नैतिक हस्तक्षेप की भाषा बना दिया। उनकी कृतियाँ मनुष्य की हिंसात्मक प्रवृत्तियों के विरुद्ध एक सतत प्रतिरोध हैं—एक ऐसी आवाज़, जो चुप रहते हुए भी बहुत कुछ कहती है।
24 मार्च को पटना संग्रहालय में आयोजित कार्यक्रम के तहत बीरेश्वर भट्टाचार्य पर केन्द्रित मोनोग्राफ और पुस्तक का विमोचन
ढाका में जन्म और 1947 के भारत के विभाजन की त्रासदी ने उनके भीतर जो संवेदनशीलता जगाई, वही आगे चलकर उनकी कला का मूल स्वर बनी। देश विभाजन की वजह से 1950 में उनका परिवार ढाका से पटना आया I कला की अभिरुचि की वजह से वर्ष 1952 में बतौर छात्र कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटना से जुड़े I इसके बाद यह जुडाव कुछ ऐसा रहा कि 1957 में पहले बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े और थोड़े ही दिनों बाद अपने उसी कला महाविद्यालय में बतौर प्राध्यापक I विदित हो कि उन दिनों कला महाविद्यालय बिहार सरकार के ही अंतर्गत आता था I ऐसे में 1993 में अपनी सेवा निवृति तक कला महाविद्यालय से जुड़े रहे I 1957 से 1993 तक अध्यापन—यह एक निरंतर साधना थी, जिसने न केवल एक कलाकार, बल्कि पीढ़ियों के कलाकारों को गढ़ा।
एक भावुक क्षण : पटना म्यूजियम में आयोजित कार्यक्रम से पूर्व पद्मश्री श्याम शर्मा के साथ किन्गशूक भट्टाचार्य (बीरेश्वर भट्टाचार्य के पुत्र) का आत्मीय मिलन I
उनके जीवन का एक निर्णायक पड़ाव 1969–1970 में आया, जब उन्हें इस्तांबुल ललित कला अकादमी में शोधवृत्ति प्राप्त हुई। पेरिस, मिलान, स्विट्ज़रलैंड और एथेंस जैसे कला केंद्रों का अनुभव उनके भीतर एक वैश्विक दृष्टि लेकर आया, जिसे उन्होंने भारतीय संदर्भों में आत्मसात कर एक विशिष्ट शैली में ढाला।
उनकी कला केवल सौंदर्य साधना नहीं, बल्कि एक सजग हस्तक्षेप थी। “सिविल वॉर” (1986), “टेररिस्ट” (1987) और “मैसाकर इन रोज गार्डन” (1989) जैसी कृतियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि वे अपने समय के सबसे कठिन प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ते थे। उनकी शिक्षकीय साधना का प्रभाव बिपिन कुमार, रबीन्द्र कुमार दास, सुबोध गुप्ता, संजीव सिन्हा, नरेन्द्र पाल सिंह, त्रिभुवन कुमार देव और शाम्भवी सिंह जैसे कलाकारों की उपलब्धियों में स्पष्ट देखा जा सकता है।
प्रो. जयकृष्ण अग्रवाल
देश के वरिष्ठ कलाकार/कलाविद प्रो. जय कृष्ण अग्रवाल ने उन्हें याद करते हुए कहा कि बीरेश्वर दा का बिहार की आधुनिक कला-आंदोलन में योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण और अमूल्य रहा है। वास्तव में, उन्होंने जिस दृष्टि, संवेदना और वैचारिक ऊर्जा के साथ कला को समाज से जोड़ा, उसने बिहार में आधुनिक कला को एक नई दिशा और पहचान प्रदान की। उनकी उपस्थिति केवल एक कलाकार की नहीं, बल्कि एक आंदोलन की थी—एक ऐसी ऊर्जा, जिसने अनेक कलाकारों को प्रेरित किया, उन्हें मार्ग दिखाया और उन्हें अपने समय से संवाद करने का साहस दिया।
शहंशाह हुसैन
लखनऊ के वरिष्ठ कला समीक्षक शहंशाह हुसैन ने उन्हें स्मरण करते हुए अत्यंत आत्मीय शब्दों में लिखा है कि स्वर्गीय वीरेश्वर दा का जुड़ाव लखनऊ क्षेत्रीय ललित कला केंद्र की स्थापना-काल से ही रहा। उस समय बिहार इसी केंद्र के अंतर्गत आता था, और उन्होंने अपने विद्यार्थियों को ललित कला अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रदत्त एक वर्षीय छात्रवृत्ति के माध्यम से लखनऊ भेजना प्रारंभ किया। प्रत्येक वर्ष उनके दो-तीन छात्र इस छात्रवृत्ति पर यहाँ आकर कला-साधना करते थे। इस प्रकार उन्होंने न केवल लखनऊ केंद्र से अपना जीवंत संबंध बनाए रखा, बल्कि बिहार के युवा कलाकारों के लिए राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचने का मार्ग भी प्रशस्त किया। 1985 से 1999 तक उनका यह संबंध विशेष रूप से सक्रिय रहा—वे केंद्र की सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे और वर्ष में एक-दो बार लखनऊ आकर कलाकार शिविरों, क्षेत्रीय प्रदर्शनियों और विविध कला आयोजनों में सक्रिय भागीदारी करते रहे। वे अपने विद्यार्थियों को भी इन आयोजनों में सम्मिलित कराते थे, जिससे एक सशक्त कला-संवाद विकसित हुआ।
सदस्यता अवधि पूर्ण होने के बाद भी उनका आना-जाना बना रहा—कभी समूह प्रदर्शनी के सिलसिले में, तो कभी किसी अन्य कलात्मक उद्देश्य से। यह संबंध औपचारिकता से कहीं अधिक आत्मीयता का था।
शहंशाह हुसैन के शब्दों में—वीरेश्वर दा केवल एक महान कलाकार ही नहीं, बल्कि एक अत्यंत हँसमुख, सरल और सुंदर व्यक्तित्व के धनी थे। उनका बाह्य व्यक्तित्व जितना आकर्षक था, उनका अंतर उतना ही विशाल और उदार था। उन्होंने बिहार के युवा कलाकारों को जो दिशा दी, उसने वहाँ कला के क्षेत्र में एक नई जागृति उत्पन्न की। उनके शिष्यों ने राष्ट्रीय राजधानी तक अपनी पहचान स्थापित की—यह उनकी साधना का साकार रूप है।
वे आगे लिखते हैं कि ऐसे समय में, जब 24 मार्च 2026 को उनकी कला-यात्रा पर एक कैटलॉग और स्मारिका प्रकाशित होने जा रही थी, उनका इस संसार से जाना अत्यंत दुखद और हृदयविदारक है। अपने व्यक्तिगत संबंधों को स्मरण करते हुए वे बताते हैं कि 2010 में वाराणसी में आयोजित एक आर्टिस्ट रेज़ीडेंसी में उनके साथ बिताया गया समय आज भी स्मृतियों में जीवित है। कला और जीवन पर हुई लंबी चर्चाओं के आधार पर उन्होंने उन पर एक लेख भी लिखा, जो उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी की पत्रिका में प्रकाशित हुआ और बाद में उनके कैटलॉग में भी शामिल किया गया। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि बीरेश्वर भट्टाचार्जी केवल एक कलाकार नहीं थे—वे एक सेतु थे, जो पीढ़ियों, प्रदेशों और संवेदनाओं को जोड़ता था। उनका जाना एक रिक्तता अवश्य छोड़ गया है, पर उनकी कला, उनके विचार और उनके द्वारा रोपी गई संवेदना की यह परंपरा निरंतर प्रवाहित होती रहेगी।
अंततः, यही प्रार्थना है—उनकी आत्मा को शांति मिले, और उनकी सृजनात्मक ज्योति हमारे भीतर यूँ ही प्रकाश देती रहे।
अखिलेश निगम
लखनऊ के ही वरिष्ठ कलाकार एवं इतिहासकार अखिलेश निगम कहते हैं कि बीरेश्वर दा ने अपने शुरुआती दिनों में ‘ट्रैंगल वौइस्’ नामक एक समूह बनाया था, जिसका प्रदर्शन राज्य ललित कला अकादमी, लखनऊ में हुआ था, जिसका कवरेज मैंने लखनऊ और दिल्ली के समाचार पत्रों में किया था। यह शायद 1972 या 1974 की बात है। तभी मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई थी, जिसने बाद में मित्रता का स्वरूप ले लिया। यह मित्रता और प्रगाढ़ हो गई जब हम और वे 1984 में राष्ट्रीय ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के सदस्य बने, जहाँ लगभग दस वर्षों तक हमारा साथ रहा। इस दौरान हम कई समितियों के सदस्य भी रहे और कला तथा कलाकारों के विकास संबंधी अनेक कार्य किए।
अंत में यही कि बीरेश्वर भट्टाचार्जी केवल एक सृजनकर्ता नहीं थे—वे एक सेतु थे। एक ऐसा सेतु, जो पीढ़ियों, प्रदेशों और संवेदनाओं को जोड़ता था। उनका जाना निश्चित ही एक गहरी रिक्तता छोड़ गया है, पर उनकी कला, उनके विचार और उनके द्वारा रोपी गई संवेदना की यह परंपरा कभी समाप्त नहीं होगी। वह निरंतर प्रवाहित रहेगी—नए कलाकारों, नई अभिव्यक्तियों और नए समय के साथ।