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विषय : ग्लोबल साउथ का साझा इतिहास
पटना, 9 अगस्त, 2025 I बिहार म्यूजियम बिनाले 2025 के तहत आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी का आज दूसरा दिन था। संगोष्ठी के प्रथम सत्र में सारी ससाकी और डॉ. अचल पांड्या आमंत्रित थे। सारी ससाकी अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के मुखौटों की अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ व शोधकर्ता हैं। इन्होंने शमनिक संस्कृति के मुखौटों के विषय में विस्तार से बताया। उन्होंने मास्क की उत्पत्ति और विकास को आदिवासी संस्कृति से जोड़ते हुए बताया कि मास्क पहनने और बनाने का प्रचलन अति प्राचीन काल से चला आ रहा है। इसका प्रयोग सिर्फ चेहरा और पहचान छिपाने के लिए नहीं किया जाता बल्कि उससे आगे बढ़कर अपने पूर्वजों से आत्मिक जुड़ाव और उनसे संवाद स्थापित करने के लिए किया जाता है। यह एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा अपने पूर्वजों की दुनिया में प्रवेश और भय से मुक्त होने का एहसास होता है। सारी ससाकी ने बताया कि वर्तमान समय में मास्क का उपयोग आदिवासी अपने पर्व-त्योहार में करते हैं। वे प्रकृति से जुड़े हुए लोग हैं लेकिन इन दिनों वे लोग भी तकनीक का उपयोग करने लगे हैं। इनके सांस्कृतिक इतिहास को कुछ खास वजहों से बदल दिया गया है या राजनीतिक प्रभाव से उसकी दिशा बदल दी गई है।

डॉ. अचल पांड्या दूसरे वक्ता रहे, जो संस्कृति एवं संरक्षण विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, दिल्ली के अध्यक्ष हैं। इन्होंने मास्क के महत्व बताते हुए कहा कि यह कल्चरल सहअस्तित्व को दर्शाता है और इसकी भूमिका कहानी कथन में महत्वपूर्ण होती है। मास्क मुख्य रूप से ईश्वरीय, राक्षसी एवं दैवीय शक्तियों को प्रतीकित करता है। भारतीय संस्कृति में मुखौटे गहन और बहुआयामी महत्व रखते हैं, जो ऐतिहासिक, धार्मिक, सामाजिक और कलात्मक सभी पहलुओं में फैला हुआ है। भारत में इनका उपयोग केवल सजावटी उद्देश्य से नहीं होता, बल्कि यह अनुष्ठानों, मान्यताओं और प्रदर्शन कलाओं से गहराई से जुड़ा है, जो आध्यात्मिक और सामाजिक मूल्यों दोनों को प्रतिबिंबित करता है। सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से, मुखौटे प्रभावी संचार के साधन हैं। ये पहचान को छिपा भी सकते हैं और उजागर भी; सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दे सकते हैं और नैतिक या दार्शनिक संदेश पहुँचा सकते हैं। उदाहरण के लिए, केरल के “पोट्टन तेय्यम” में एक निम्न जाति का पात्र व्यंग्य और प्रदर्शन के माध्यम से सामाजिक असमानता और आभिजात्यवाद पर प्रश्न उठाता है। असम के “भाओना” नाटकों में मुखौटे का प्रयोग महाकाव्यों और धर्मग्रंथों की कथाओं को प्रस्तुत करने के लिए होता है, जो न केवल नैतिक मूल्यों को मजबूत करता है, बल्कि सामुदायिक पहचान को भी सुदृढ़ करता है। ये प्रदर्शन समुदाय को एकजुट रखते हैं और सांस्कृतिक मूल्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित करते हैं। कलात्मक दृष्टि से, मुखौटे बनाना भारत की कई परंपराओं में एक सम्मानित शिल्प है।

संगोष्ठी का दूसरा सत्र ‘नारी शक्ति, यौनिकता एवं भौतिक संस्कृति’ पर केन्द्रित था जिसपर तीन विद्वान वक्ताओं ने विचार प्रकट किए। जुअन मैनुएल गरीबे लोपेज (राष्ट्रीय समन्वयक, आइ.एन.ए.एच., मेक्सिको), भारत की बहुविषयी कलाकार सीमा कोहली और श्रीलंका से आए जगत रवीन्द्र ने नारी शक्ति के विविध रूपों को कलाकृतियों के माध्यम से व्याख्यायित किया। जुआन मन्युअल गरीबे लोपेज ने अपने व्याख्यान में बताया कि स्त्री-ऊर्जा प्रकृति के हर रूप में विद्यमान है। नदी, झरने आदि किसी भी प्राकृतिक कृति में स्त्री-ऊर्जा निश्चित रूप से मौजूद रहती है। आगे बताते हुए उन्होंने कहा कि स्त्री-ऊर्जा और उसकी उपस्थिति मैक्सिको की पूरे सिटी में देखी जा सकती है। पौराणिक सभ्यता के पत्थर की मूर्तियों में गहरी सांस्कृतिक अर्थ छिपे हुए हैं जो भारतीय संस्कृति से काफी मेल रखते हैं। उन्होंने बताया कि हिंदू पौराणिक साहित्य में नारी शक्ति के रूप में माँ काली, माँ दुर्गा, माँ गंगा यहाँ तक कि धरती माँ का भी वर्णन किया गया है। इनमें मां काली निर्माण और विध्वंस की देवी हैं।

उक्त विषय पर प्रतिष्ठित कलाकार कोहली ने अपने वक्तव्य की शुरुआत The Golden womb; hrinayagarbha नामक कहानी सुनाकर की। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने नारी शक्ति के अर्र्द्धनारीश्वर एवं अन्य रूपों पर कुछ गहरी बातों का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि धरती एक जीवंत स्त्री-ऊर्जा है जो सभी जीव-जंतुओं का पालन-पोषण करती है। भारत की जितनी भी उर्जा है वह सभी किसी न किसी दैवीय शक्ति के रूप में विद्यमान है जिसका वर्णन हमारी पौराणिक साहित्य में मिलता है। अर्धनारीश्वर की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि यह जीवन की पूर्णता का प्रतीक है। इसके बिना जीवन अपूर्ण है। वक्तव्य के अंत में सीमा कोहली ने एक स्वरचित कविता सुनाई जिसमें नारी शक्ति की आवाज़ से गुंजायमान थी। उनका काव्य-पाठ इतना नाटकीय था कि थोड़ी देर के लिए श्रोता उमंग से भर उठे थे।
सत्र के तीसरे वक्ता श्रीलंका के जगत रवीन्द्र ने देवी वल्ली का सचित्र उदाहरण देते हुए उनकी महान शक्तियों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि श्रीलंका इंडियन ओसियन का एक टापू है जिसपर 2050 इसापूर्व से ही सैकड़ों भारतीय आक्रमण हुए, इसके बावजूद यह देश देवी वल्ली की महिमा के कारण आज भी मौजूद है। उन्होंने भारतीय हिंदू और श्रीलंका की मान्यताओं को समानांतर बताते हुए शिव और पार्वती से उत्पन्न गणेश और कातिर्केय का उल्लेख किया साथ ही अनेक देवियों एवं दैविक शक्तियों का वर्णन किया जो पूरी तरह से भारतीय संस्कृति से मेल खाता है।
संगोष्ठी के तीसरे सत्र का विषय था- “विरासत और मिथकीय आख्यानों के आलोक में दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थापत्य की सांस्कृतिक भाषा”। इस सत्र में भी तीन वक्ताओं को आमंत्रित किया गया था जिनमें डॉ. पोनरट दमरहुङ् नाट्य कला विभाग, चुलालॉन्गकॉर्न विश्वविद्यालय, थाइलैंड के प्रध्यापक है, दूसरे वक्ता डॉ. पारुल पांड्या धर इतिहास विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक है और तीसरे वक्ता डॉ. अगुस विद्यात्मोको इंडोनेशिया के संस्कृति मंत्रालय में मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक है। डॉ. अगुस विद्यात्मोको ने मौराजांबी साइट की विस्तृत जानकारी देते हुए नालंदा साइट से उसकी तुलना की और बताया कि अब तक जो इनसे संबंधित शोध हुए हैं उसके साक्ष्य इन दोनों जगहों पर मौजूद हैं। मौराजांबी साइट के अवशेष तथा नालंदा के अवशेष में ऐतिहासिकता की स्पष्ट झलक मिलती है। मौराजांबी के लोगों के सशक्तीकरण के बारे में बताते हुए डॉ. अगुस ने कहा कि बौद्ध धर्म के अनुगमन से यहाँ के लोगों का पर्याप्त विकास हुआ है।

अंतिम सत्र के दूसरे वक्ता डॉ. पारुल पांड्या धर ने मॉन्यूमेंट्स, मिथ एंड मॉबिलिटी विषय पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि एशियन सभ्यता और भुजंग घाटी का गहरा संबंध है। ग्लोबल साउथ की सभ्यता, संस्कृति विकास पर चर्चा करने के क्रम में दक्षिणी वियतनाम के बौद्धिक प्रतीकों, अवशेषों का भी वर्णन भी किया और ईसा.पूर्व निर्मित मंदिर, प्रतीक चिह्नों एवं ऐतिहासिक धरोहरों के विषय में विस्तृत चर्चा की। डॉ. पारुल पांड्या ने बुद्ध के जीवन पर आधारित टेराकोटा कलाकृतियों का चित्र दिखाते हुए बताया कि ये चित्र बुद्ध के जीवन की आठ महान घटनाएँ हैं जिन्हें इन कलाकृतियों मं उतारा गया है। डॉ. पारुल पांड्या धर न्यूयार्क, कंबोडिया, वियतनाम तथा संग्रहालयों में मौजूद बुद्ध मूर्तियों एवं प्रतीकों पर संक्षिप्त चर्चा की तथा यह भी बताया कि विभिन्न देशों में रामायण कैसे फैला।
डॉ. पोनरट दमरहुङ् अंतिम सत्र के अंतिम वक्ता थे। इन्होंने समकालीन दौर में राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिप्रेक्ष्य में रामायण की भूमिका का वर्णन किया। साउथ इस्ट एशिया में रामायण का पर्याप्त प्रभाव है जो वहाँ की कलाकृतियों में साफ दिखाई देता है। रामायण एक ऐसा ग्रंथ है जो धार्मिक, सांस्कृतिक महत्व के साथ-साथ शोध एवं विज्ञान के लिए भी महत्वपूर्ण हो चुका है। इससे जुड़े अनेक रोचक तथ्य हैं, जिन्हें सुलझाने के लिए शोधकर्ताओं की रुचि बढ़ी है।

विदित है कि बिहार म्यूजियम बिएनाले के तीसरे दिन के आयोजनों में संगोष्ठी के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया था। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत किलकारी बाल भवन, पटना के बच्चों ने ‘भारत के लोकरंग’ नामक नाट्य प्रस्तुति दी। यह एक बाल नाट्य प्रस्तुति थी, इसके बावजूद इसमें अभिनय की परिपक्वता देखने को मिली। बच्चों ने बड़े ही आकर्षक ढंग से नृत्य नाटिका के माध्यम से भारत के विविध प्रांतों की लोकसंस्कृति और उसकी झलक के साथ उत्सवधर्मी जीवन शैली को दर्शाया। प्रस्तुति में केरल, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मणिपुर, असम, ओडिशा और बिहार प्रदेश के लोकनृत्य एवं गीत शामिल थे। किलकारी के छोटे-छोटे बच्चों ने भारत के विभिन्न प्रांतों की वेश-भूषा धारण की थी जिससे संपूर्ण भारत की संस्कृति व परंपरा की झलक एक ही जगह मिल रही थी। बच्चों की भावपूर्ण और चपल प्रस्तुति से बिहार संग्रहालय का वातावरण ताजगी से भर उठा था।
किलकारी के बच्चों ने कुल आठ प्रस्तुतियाँ दीं जिसमें केरल का कलरी पट्टू, उड़ीसा का संबलपुरी,असम का बिहू, बिहार का सामा चकेवा, मणिपुर का लाई हराओबा, हरियाण का घूमर, पंजाब का का गिद्दा और गुजरात का डडिया शामिल था। ये सभी प्रस्तुतियाँ भारतीय संस्कृति की राज्यवार प्रतिनिधित्व करती हैं। नृत्य प्रस्तुति का निर्देशन अमरनाथ एवं दीपक तुषार ने किया और पार्श्व स्वर एवं स्क्रिप्ट सुदीपा घोष का था। रूप सज्जा सुदामा पांडेय और वेश-भूषा मो. इम्त्याज का था। आकाश कुमार इन सबके सहयोगी रहे। दर्शकों ने उसका भरपूर आनंद लिया।
स्रोत : प्रेस विज्ञप्ति
