आईजीएनसीए और ऑरोविले फांउडेशन मिलकर संस्कृति व अध्यात्म के क्षेत्र में कार्य करेंगे

नई दिल्ली, 26 फरवरी, सोमवार। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और ऑरोविले फाउंडेशन, पुडुचेरी के बीच सोमवार को एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। इस दौरान आईजीएनसीए के समवेत सभागार में आयोजित एक संगोष्ठी में आईजीएनसी के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानन्द जोशी और ऑरोविले फाउंडेशन की सचिव डॉ. जयंती एस रवि के बीच एमओयू की औपचारिक प्रक्रिया संपन्न हुई।

इस क्रम में आईजीएनसीए के समवेत सभागार में आयोजित संगोष्ठी में आईजीएनसीए ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने कहा कि आईजीएनसीए और ऑरोविले के बीच एमओयू करने का दोनों संस्थाओं का निर्णय बहुत ही सराहनीय है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में कार्य होना चाहिए। वहीं डॉ. सच्चिदानन्द जोशी ने कहा कि यह एक बहुत ही ऐतिहासिक क्षण है, जब आईजीएनसीए और ऑरोविले फाउंडेशन के बीच एमओयू पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि आईजीएनसीए भारत में ही नहीं, अपितु समूचे दक्षिण-पूर्व एशिया में कला और संस्कृति का सबसे बड़ा खजाना है। उन्होंने आगे कहा कि हमारा क्षेत्रीय केंद्र पुडुचेरी में भी है, जहां की धरती में एक स्पंदन संचारित होता रहता है। उन्होंने अपने भाषण के अंत में कहा कि हमें अपनी अगली पीढ़ी के लिए आर्ट और कल्चर का वातावरण तैयार करना होगा।

इस दौरान कार्यक्रम में मौजूद ऑरोविले फांउडेशन की सचिव डॉ. जयंती एस. रवि ने कहा कि ऑरोविले आश्रम के सपनों और उसके लक्ष्य के बारे में जानकारी दी। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि हम सभी प्राणी एक जैसे हैं, ना कि एक दूसरे से भिन्न है। जयंती एस. रवि ने आगे कहा कि ऑरोविले आश्रम कला, संस्कृति, अध्यात्म और साहित्य के क्षेत्र में आईजीएनसीए के साथ मिलकर भविष्य में बेहतर कार्य करेगा।

इस अवसर पर अमेरिकी हिंदू विद्वान डेविड फ्रॉले ने कहा कि भारत के पास सर्वाधिक कला है, जो समूचे विश्व में किसी देश के पास भी नहीं है। उन्होंने बताया कि ऑरोविले दुनिया के सभी लोगों को आध्यात्मिक और मानसिक रूप से जोड़ने का कार्य करता है। आईजीएनसीए की निदेशक (प्रशासन) डॉ. प्रियंका मिश्रा ने कहा कि ऑरोविले और महर्षि अरबिन्दो की शिक्षा पर कार्य करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। डॉ. प्रियंका ने कहा कि इस क्षेत्र में कार्य के लिए हम पूरी तरह से सहयोग करने को तैयार रहेंगें।

गौरतलब है कि ऑरोविले की स्थापना श्री अरबिंदो की शिष्या मां मीरा अल्फासा ने श्री अरबिन्दो सोसाइटी की एक परियोजना के रूप में 28 फरवरी 1968 को की थी। आज हम उन्हें श्री मां के रूप में जानते हैं।

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