बिहार राज्य ललित कला अकादमी, पटना की दीर्घा में 18 अप्रैल से 8 मई तक चली प्रदर्शनी
बिहार सरकार द्वारा पिछले दिनों आयोजित द्वितीय राज्य स्तरीय कला प्रदर्शनी पर कला समीक्षक अनीश अंकुर का यह विस्तृत आलेख राज्य की समकालीन कला के वर्तमान को रेखांकित करता है I इस उम्मीद के साथ की राज्य स्तरीय प्रदर्शनी का यह सिलसिला आगे नियमित तौर पर चलता रहे, आलेखन डॉट इन के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है लेख I- संपादक
Anish Ankur
लगभग दस वर्षों के बाद बिहार ललित कला अकादमी ने पटना में कोई कला प्रदर्शनी का आयोजन किया। 18 अप्रैल से 8 मई तक चली प्रदर्शनी में राज्य के बाहर रह रहे कलाकारों ने भी हिस्सा लिया। अकादमी की कला गैलरी में आयोजित इस प्रदर्शनी में चित्रकला, मूर्तिकला, छापाकला, लोककला और फोटोग्राफी के साथ रेखांकन को भी शामिल किया गया था। इस प्रदर्शनी को क्यूरेट किया था वरिष्ठ चित्रकार अर्चना सिन्हा और जितेंद्र मोहन ने ।
प्रदर्शनी में शामिल कलाकृतियों का चयन, झारखंड में रहने वाले चुना राम हेम्ब्रम, लखनउ के उमेन्द्र सिंह तथा बिहार के राजेश राम ने संयुक्त रूप से किया था । चयनित कलाकृतियों को पुरस्कृत करने हेतु अजीत दूबे (झारखंड), पाण्डेय राजीव नयन (उत्तरप्रदेश) और पद्मश्री सम्मान प्राप्त दुलारी देवी (मधुबनी ) को आमंत्रित किया गया था। ललित कला अकादमी की ओर से, इस मौके पर, एक स्मारिका का भी प्रकाशन किया गया।
दस सालों के अंतराल पर किसी कला प्रदर्शनी का आयोजन बिहार में ललित कला अकादमी की दुरवस्था से हमें भलीभांति परिचित करा देता है।
यह प्रदर्शनी दो कला दीर्घाओं में आयोजित थी जो प्रेक्षक को कलाकारों के समृद्ध रचनात्मक संसार से वाकिफ कराता है। पूरी प्रदर्शनी में एक से बढ़कर एक कृतियां शामिल थीं। कला की कई विधाओं और अनुशासनों को एक छत के नीचे देखना प्रेक्षक के लिए सुखद अनुभूति की तरह है।
चित्रकला :
चित्रकला खंड में पच्चीस कलाकार शामिल थे। इन कलाकारों ने कैनवास पर जलरंग, तैलरंग , एक्रीलिक एवं मिक्सड मीडिया में अपनी भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया था । चित्रकला में एक प्रेक्षक इतनी विविधता और इतने किस्म के रंगों से गुजरता है कि उसे जीवन के विभिन्न आयामों का अहसास होता है। मिक्स्ड मीडिया में प्रमोद प्रकाश का ‘अनटचेबल गॉड’ तथा सुल्ताना प्रवीण का ‘फॉरगोटन फेसेस’ विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट करती है। प्रमोद प्रकाश द्वारा 36X41 इंच में निर्मित कृति को अवार्ड भी प्राप्त हुआ ।
सुल्ताना प्रवीण का काम खासतौर पर उल्लेखनीय है कि उसने हमारे समाज के उन चेहरों को कैनवास पर लाने का प्रयास किया है जिसे अमूमन आजकल सार्वजनिक स्पेस से विस्मृत कर दिया गया है। गरीबों, मजलूमों की बेघरबार दुनिया को सुल्ताना प्रवीण ने बोरे के भूरे रंग के माध्यम से इतनी दक्षता से सामने लाया है कि प्रेक्षक एकबारगी ठिठकने पर मज़बूर हो जाता है। अभाव के मारे एक दंपत्ति और उसके बच्चों की भटकती जिंदगी के कठिन यथार्थ को पकड़ने की कोशिश चित्रकार द्वारा की गयी है।
सुल्ताना प्रवीण की कृति
आजकल चित्रकला में आम आदमी के दुःख-दर्द मानो गायब से हो गए है। जिन्हें देश, समाज के साथ-साथ चित्रकला की दुनिया से भी बहिष्कृत कर दिया गया हो उसे वापस कैनवास पर लाया गया है। सुल्ताना प्रवीण द्वारा इस काम के लिए सामग्री और रंगों का चुनाव काफी सतर्कता से किया गया है। जहालत की जिंदगी को उसकी पूरी विडंबना और त्रासदी से उकेरा गया है। टाट और बोरे का उपयोग कर चित्रकार ने भटकते परिवार और बच्चों की दयनीयता को प्रदर्शित किया है। एक ओर शहर में भटकते परिवार की छवि हैं वहीं पृष्ठभूमि में शहर की आलीशान बनावट दिखाई देती है। चित्र का अग्र भाग अपने पृष्ठ भाग से उलट है। फॉरगोटेन फेसेस के नाम से दो चित्र हैं। इन दोनों में धूसर प्रभाव प्रेक्षक के मन में उस उत्पीड़ित परिवार के लिए मन में तीव्र भावना पैदा करता है।
कंचन प्रकाश द्वारा 36X48 इंच में बनी बज्जिका आर्ट जिसे उन्होंने दिलचस्प नाम ‘फोक कंटेम्पररी’ दिया है, ध्यान आकृष्ट करती है। कैनवास पर ब्लैक एंड व्हाइट सी मछलियों के बहुतायत के बीच रंगीन मछलियों को कुछ इस प्रकार उधर्वाकार चित्रित किया गया है कि प्रेक्षक को ठहरने पर मजबूर करती है।
चित्रकला खंड में कई चित्र अलग से उल्लेखनीय है। अमित कुमार ने धीरे-धीरे अपना एक खास तरीका विकसित कर लिया है। कैनवास पर एक्रीलिक से बनी 120X120 से.मी. आकार की ‘टार्न कौरूगेटेड’ में कूट का प्रभाव लिये कैनवास का उपरी कोना फटा हुआ है जिसमें से महात्मा गाँधी झाँकते दिख रहे हैं। अमित कुमार के प्रत्येक चित्र में भूरे रंग के कूट वाले कैनवास को देखा जा सकता है। इस खंड में अमित द्वारा चित्रित गाँधी समकालीन भारत में गाँधी को लेकर छिड़ी बहसों के बीच मानो थाह लेने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं। कैनवास का रंग और गाँधी के गंजे माथे के रंग का साम्य नजर आता है।
अमित कुमार की कृति
आलोक भूषण का ‘श्रीनगर’, आलिया मरियम का ‘मेमोरी स्पेस’, अनामिका का ‘लाइफ इन नेचर’ अपनी खास रंग परियोजना के कारण दर्शनीय है। वहीं अनिल शर्मा का काम विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। अनिल शर्मा ने ‘इकोज ऑफ द अर्थ’ में अपने कंपोजिशन, कलर-स्कीम, रेखाओं के सृजनशील उपयोग से विशिष्ट बना डाला है। अमूर्त प्रभाव वाला यह चित्र इतनी दक्षता से कैनवास पर चित्रित किया गया है कि देखने वाले के मन पर कई किस्म की भावनाओं को उद्वेलित करता प्रतीत होता है।
शिल्पा कुमारी के “ड्रीम ऑफ गर्ल” में एक किशोर वय की लड़की के धनी बनने के उन ख्वाबों को चित्रित किया है जो हर मध्यवर्गीय लड़की के मन में रहा करते हैं। शिल्पा ने लड़की के कत्थई प्रभावों वाले लाल फ्रॉक और उसकी ब्लैक-व्हाइट अनुकृति को बखूबी चित्रित किया है।
संजू दास के चित्रों को देखते ही पहचाना जा सकता है। इस दिशा में उन्होंने अपनी एक खास शैली भी विकसित कर ली है। उनके चित्रों में अमूमन ग्राम्य जीवन की छवियां छायी रहा करती हैं। इस प्रदर्शनी में शामिल ‘माई विलेज’ ऐसी ही रचना है। नीले कैनवास पर अब लगभग विलुप्त होते जा रहे गांवों के संसार को विभिन्न पात्रों व परिवेश के साथ चित्रित किया है। संजू दास इस बात में प्रवीण हैँ कि ढे़र सारे स्त्री-पुरूषों, पशुओं, बसावटों, पेड़ों, जानवरों सहित जिन चीजों से भी ग्रामीण घरों की पहचान रहा करती है उन सबों को ऐसी संगति में प्रस्तुत करती हैं कि कैनवास पर इतनी भीड़-भाड़ रहते हुए भी एक स्पष्टता उभर कर आती है। संजू दास ने रंगों के चयन में ग्रामीण परिवेश का पूरा ख्याल रखा है।
शिवशंकर सिंह का ‘बनारस ड्रीम्स’ एक्रीलिक से बना है। काफी गाढ़े रंगों का उपयोग कर बनारस की धार्मिक बिंब कैनवास से अधिक झांकते हैं। अमूमन बनारस को केंद्र में रखकर बने चित्रों में पता नहीं क्यों चित्रकार उसके धार्मिक और आनुष्ठानिक स्वरूपों पर ही अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। शिवशंकर सिंह ने काले,लाल,पीले और हल्के ब्लू रंगों की सहायता से कैनवास को इस प्रकार चित्रित किया है कि कई छवियां एक साथ झांकती नजर आती हैं।
सुमित ठाकुर कृत ‘गोल्डन लेडी’ एक्रीलिक में बनी 105X120 से.मी. आकार की कृति है। लाल और सुनहरे रंग की सहायता से सुमित ठाकुर ने एक ऐसी स्त्री को कैनवास पर उतारा है जिसके अंदर हलचल है। वैसे तो स्त्री बैठी हुई मुद्रा में है पर उसकी उंगलियों की भंगिमा से उसके अंदरूनी उथल-पुथल को लक्ष्य किया जा सकता है। सुमित ठाकुर ने कैनवास पर लालिमा की आभा के साथ स्त्री के सुनहरे रंग की ओढ़नी को कुछ इस अंदाज उसके कांधे पर गतिशील अवस्था में रखा है जो स्त्री के मन के के भीतर के तूफान का अहसास कराता है। स्त्री एक ओर झुकर तिरछी निगाह से देखने की अदा चित्र को विशिष्ट बना देती है। चित्र देखते हुए स्त्री के भावनात्मक स्थिरता के हिले होने का आभास होता है।
पूर्व में कार्टूनिस्ट के रूप में चर्चित रहे विकास कुमार का एक्रीलिक में बना चित्र ‘स्टैंप ऑफ साइलेंस’ अपनी रंगपरियोजना, रेखाओं के बरताव तथा विभिन्न रंगों के संयोजन के कारण अलग से आकृष्ट करती है। वैसे तो शीर्षक विकास कुमार ने साइलेंस यानी मौन दिया है पर इस चित्र में उलझे तारों, कबूतर के जोड़े जैसे मूर्त छवि को छोड़ दें तो मन के भीतर के अमूर्त भावों को, उनकी अस्थिरता को व्यक्त करने के लिए कई किस्म के रंगों का उपयोग किया है। समकालीन समय में शांति की खोज किस प्रकार उलझनों व आलोड़नों के मध्य होकर आती है कूछ-कुछ उसकी ओर इशारा करता है यह चित्र। लाल, ब्लू, सफेद, पीला, क्रीम कलर का सृजनात्मक उपयोग विकास कुमार ने ‘स्टैंप ऑफ साइलेंस’ में किया है। विकास कुमार के पूर्व में किये कामों को जिन लोगों का परिचय रहा है उनके लिए विकास कुमार का यह चित्र सुखद आश्चर्य से कम नहीं है।
प्रदर्शनी में मुकेश साना द्वारा वाटरकलर में चित्र ‘द ट्रुथ’, वैसे तो धार्मिक छवि है पर साड़ी में लिपटी स्त्री, नरकंकाल पर उसका पैर और पीछे से सूरज की मौजूदगी के कारण ध्यान आकृष्ट करती है। वहीं मनीष कुमार सिंह का एक्रीलिक माध्यम का ‘नेचर: ए सीरिज फ्रैग्मेंटिंग-2’ अस्त-व्यस्त , टूटी-बिखरी मूर्तियों के चित्र अपनी रंगसंयोजन के कारण दर्शनीय बन पड़े हैं।
मनोज कुमार साहनी ने ‘जनसंख्या विस्फोट’ नाम से एक प्रचलित विषय को अपनी कृति का आधार बनाया है I मिक्स मीडियम में मनोज कुमार साहनी ने ग्लोब पर चारों ओर से लटके लोगों की भीड़ के माध्यम से इस विषय को पकड़ा है I पृथ्वी कैसे बढ़ती जनसंख्या के दबाव में है इसके लिए चित्रकार ने सफ़ेद और उभरे हुए लोगों के बीच से झांकते ग्लोब को दिखाया है I
नरेन्द्र कुमार ‘नेचर’ का काम है ‘बौंड ऑफ नेचर’, अपने नाम के आगे रखी उपाधि के अनुकूल चित्रकार ने पीले रंग से पेड़, पक्षी, और मनुष्यों की भीड़ के माध्यम से मनुष्य और प्रकृति के मध्य खत्म होते राग को अभिव्यक्त किया हैI
संजय कुमार सिँह का काम ‘द ट्रुथ-A’ का वाटर कलर में चर्चित काम रहा हैI पटना की दूसरी कला प्रदर्शनियों का यह चित्र हिस्सा रह चुका है I घर जिन सामानों और सामग्रियों से बनता है उसको तार और हुक से हवा में टांगने, दूर तक नीले व ब्लू रंग से बना विस्तार, उनके बीच से सफ़ेद बाउंड्री, उसके बीच का अशोक स्तम्भ, लाल इंटों वाली टूटी दीवार, उसके इर्द- गिर्द बकरियां यह मन में कई किस्म के बिखरे भावों को जन्म देते है I संजय कुमार सिँह का यह चित्र ख़ास है I वाटर कलर में बनी सभी चित्रों में सबसे अलग I
प्रवीण कुमार की कृति
प्रवीण कुमार के चित्र का नाम है ‘स्ट्रगलिंग फैमिली-1’ जिसमें सफ़ेद बिल्ली, उसके नीचे छोटी-छोटी बिल्ली, उसके ऊपर बिल्ली की काली छाया, बाईं ओर ऊपर में ब्लू रंग के उपग्रह का राकेट से छोड़े जाने की प्रक्रिया, एक परिवार का हाथ बाँध कर खड़ा होना, सबसे नीचे दाई ओर कानून की किताब और अधिवक्ता द्वारा माथे पर पहने जाने वाली काली उपाधि यह सब मिलकर इस चित्र को हमारे समय के अंतर्विरोधी भावनाओं को प्रकट करने वाला बनाता हैँ I कई रंगों का एक साथ संयोजन प्रवीण कुमार ने अच्छे ढंग से किया है I
निशि सिँह का काम ‘सूजनी’ एक्रीलिक में बनी है I सूजनी की छटा और वैभव को अलग-अलग रंगों की सहायता से सामने लाया गया है I निशि सिँह ने सूजनी में गहरे रंग का इस्तेमाल किया है I घर में सूजनी अलग-अलग कपड़ों के टुकड़े और पैबंदों से बना है इसे खुबसूरती से चित्र में सामने लाया गया है I
मनीष मंजुल उपाध्याय का काम ‘डेमोक्रेटिक इण्डिया’ पूर्व में कई प्रदर्शनियों में लग चुका है I गहरे ब्लू रंग का सूअर और उसके सामने प्लेट में लाल, पीले, हरे सेब, केला और अंगूर रखे हैँ I ऐसे ही भैंस चराते बच्चे उसकी पीठ पर खड़े हो सेल्फी ले रहे हैं I मनीष मंजुल ने गहरे और गाढ़े रंग का उपयोग किया है I
दीपांशु कुमार का बिना शीर्षक वाला चित्र एक्रीलिक में बड़े शहर और नयी बनती सभ्यता में एक युवक की तकलीफ और त्रासदी को पकड़ने की कोशिश की गई है I दीपांशु ने कमर के पास कटे हिस्से से बहते रक्त के माध्यम से हिंसा के पूरे कुचक्र को पकड़ने की कोशिश की है I काले रंग से अच्छादित बैकग्राउंड में हरे रंग की नई इलेक्ट्रोनिक सामानों ने उसे पकड़ रखा है, इस तरह से एक अलग चित्रभाषा प्रदान किया गया है I
भोला सिँह का ‘कृटिक’ जिसे मिक्स मीडिया से बनाया गया है अपने कैनवास पर रंग, मनुष्य का चेहरा, उसकी आँखों के पास कालापन, अक्षर, सफ़ेद, पीले और काले रंग इन सबसे मानों समकालीन समय की एक आलोचनात्मक अभिव्यक्ति हो I रंगों का उपयोग सतर्कता और सृजनात्मकता के साथ किया गया है I
ड्राइंग:
इस खंड में मात्र चार कलाकारों ने हिस्सा लिया था। ‘डिवाइन फेमिनाइन एंड सेक्रेड बिस्ट्स’ की रचयिता अनिता कुमारी को इस खण्ड में अवार्ड प्राप्त हुआ। पिंक और पेपर की सहायता से अनिता ने ब्लैक एंड व्हाइट रेखांकन में स्त्री, पशुता के मिले-जुले भाव वाली एक जटिल संरचना निर्मित करने का प्रयास किया है।
अनीता कुमारी का रेखांकन
मोहम्मद सुलेमान का पेपर में मिक्स्ड मीडिया में बना रेखांकन ‘बुल’ है। ब्लैक-एंड व्हाइट के सामान्य से लगते रेखांकन में सींग का लाल रंग से रंगा जाना इसे खास बना देता है। चित्र का कंपोजिशन और स्पेस का उपयोग आपको आकृष्ट करता है।
रीना सिंह का ‘उड़ने की आस’ एक विशिष्ट ड्राइंग है जिसे मिक्स्ड मीडिया में बनाया गया है। महानगरों की अट्टालिकाओं के प्रति जो आकर्षण छोटे शहरों या ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों को रहा करता है उसे रीना सिंह ने पकड़ने का प्रयास किया है। गगनचुंबी इमारतों के उपर पंख बनाकर इस उड़ने की आस को अभिव्यक्त किया गया है। इमारतों में हल्के पीले रंग का इस्तेमाल उस उड़ान की आकांक्षा को और तीव्र बनाता है। यह रेखांकन कैनवास पर अपेक्षाकृत कम स्पेस लेकर अपेक्षित प्रभाव दर्शक पर डालने में सफल हो जाता है।
संजय कुमार राय के ‘नारी अस्मिता’ शीर्षक वाले रेखांकन को एक्रीलिक इंक से बनाया गया है। प्रचलित से लगने वाले शीर्षक के लिए संजय कुमार राय ने कैनवास के निचले हिस्से में भूरे रंग से घरों से जोड़ा है I साथ ही पीले रंग के फीते का उपयोग कर स्त्रियों की असीमित संभावनाओं की ओर हल्का इशारा जैसा सा किया है। यह चित्र आपको ठहर कर विचार करने को प्रेरित करती है।
ग्राफिक्स :
दिव्या सिंह का छापा चित्र
इस खंड में छह कलाकारों की कृतियां शामिल हैं। अवार्ड पटना कॉलेज की प्रभारी प्राचार्य डॉ. राखी कुमारी को प्राप्त हुआ है। वुड प्रिंट और एक्वाटिंट में बनी कृति को ‘सिटी ऑफ जॉय’ का नाम दिया गया है। राखी कुमारी ने शहर के स्वप्न को सृजित करने की कोशिश की है। कार में बैठा परिवार, इमारतें, कमल के फूल, मछली, स्त्री, जल, चेहरा और उसके उपर उग आए पौधे, स्त्री रूपी उड़ती वायुयान ये सब छवियां मिलकर फैंटेसी रचते हैं। राखी ने इन सबको संयोजित करने का सफल प्रयास किया है।
अवार्ड पाने वालों में संध्या यादव भी हैं। ‘इंटाग्लियो’ में बिना शीर्षक की बनी कृति में तीन अलग-अलग छवि उकेरने का प्रयास किया गया है। तीनों के केंद्र में अलग-अलग मूड्स में स्त्री छवि है। तीनों एक ही रंग में हैं । पहली में जहां नरमुंडो, गमले में लगे फूल, हाथ में गेंद वहीं दूसरी में दो स्त्रियां अपने हाथों की मुद्रा के कारण कुछ चिंतित सी जबकि तीसरी में बंद आँखें वाली स्त्री छवि ध्यानमग्न सी है। तीनों स्त्री छवि के माथे के उपर अलग-अलग संकेत हैं मानों मन में चलने वाली उथल-पुथल को चित्रित कर रहे हों।
प्रदीप कुमार झा ने पेपर पर वुड प्रिंट माध्यम से ‘बुद्धम शरणम गच्छामि’ उकेरा है। बुद्ध की शांत मुद्रा लेटी हुयी अवस्था में सर और उसके नीचे की अमूर्त सी लगने वाली छवियां विषय को अभिव्यक्त करती है। प्रदीप झा ने कत्थई और हल्के पीले रंग के माध्यम से इससे जुड़े भाव को पकड़ने का प्रयास किया है।