ग्लोबल  साउथ: शेयर्ड हिस्ट्री-1

  • तीसरे ‘बिहार म्युजियम बिनाले’ में लगी तीसरी दुनिया के देशों की कला प्रदर्शनी

बिहार म्यूजियम, पटना में इन दिनों तीसरा म्यूजियम बिनाले आयोजित है I इसके तहत ग्लोबल साउथ के देशों की प्रदर्शनी चल रही है I इस वृहत आयोजन की सिलसिलेवार समीक्षा की पहली कड़ी में वरिष्ठ कला समीक्षक अनीश अंकुर बात कर रहे हैं, इथियोपिया के कलाकार एवं कलाकृतियों पर अपने विचार I

अनीश अंकुर

इथियोपिया की कला प्रदर्शनी

बिहार म्युजियम ने एक बार फिर म्युजियम बिनाले का आयोजन किया। अगस्त माह से शुरू हुआ यह बिनाले इस वर्ष के अंत तक चलेगा । 2025 में बिहार म्युजियम बिनाले का तीसरा आयोजन है। परन्तु इस साल पिछले दो वर्षों के मुकाबले अधिक बृहत पैमाने पर आयोजन किया गया है। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी विश्व के कई देशों की कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई गयी। बिहार संग्रहालय की प्राथमिकता में  आजकल तीसरी दुनिया के देश आते जा रहे हैं। इस बार नाम भी दिया गया है ‘ग्लोबल साउथ: शेयर्ड हिस्ट्री’ यानी ‘तीसरी दुनिया के देश: साझा इतिहास’। पिछले वर्ष जी-20 के देशों के कलाकारों की विविधतापूर्ण प्रदर्शनी को पटना के लोगों ने काफी पसंद किया था I

पिछले एक माह से तीसरी दुनिया के कई देशों – इथियोपिया, इंडोनेशिया, मैक्सिको, श्रीलंका, अर्जेंटीना आदि- की प्रदर्शनियां चल रही है। लगभग साढ़े माह तक चलने वाली इन प्रदर्शनियों में सेमिनार, सिम्पोजियम, वृत्तचित्र प्रदर्शन आदि का निरंतर आयोजन किया जा रहा है। पटना के कला संसार में आजकल काफी गहमागहमी है। काफी कुछ घट रहा है।  बिहार म्यूजियम के साथ इस बार पटना म्यूजियम में भी बिनाले का हिस्सा बना है I वहाँ भी बातचीत और संवाद का कार्यक्रम  आयोजित हो रहे हैँ I पटना म्यूजियम का नया बना भाग कलाक़ारों को खूब भा रहा है I

इस महत्वाकांक्षी आयोजन के प्रधान परिकल्पक हैं बिहार संग्रहालय के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह I जबकि क्यूरेशन सहित कई अन्य भूमिकाओं में हैं  दिल्ली के कला जगत की जानी-मानी शख्यिसत अलका पांडे। अलका पांडे का इधर हाल के दिनों में बिहार संग्रहालय की गतिविधियों में आना-जाना बढ़ा है। तीसरे बिनाले में ग्लोबल साउथ के जिन देशों की प्रदर्शनियां लगाई गई हैं उसमें  इथियोपिया भी भागीदार है। इथियोपिया के कई कलाकारों की कृतियां शामिल है।

 इथियोपिया: संभावनाओं का प्रकाश स्तम्भ

इथियोपिया एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी सभ्यता तीन हजार से अधिक वर्षों तक फैली हुई मानी जाती है। अफ्रीकी महादेश में स्थित  इथियोपिया की आबादी लगभग 13 करोड़ है। इस देश को मानवता के पालना घरों में भी गिना जाता है। इस देश में विभिन्न जातियों और धर्मों का निवास स्थान है। जनसंख्या, क्षेत्रफल और अर्थव्यवस्था के हिसाब से पूर्वी अफ्रीका का यह सबसे बड़ा देश भारत की तरह विविधता में एकजुटता का उदाहरण है।

इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा, न्यूयार्क और जिनेवा के बाद, तीसरा सबसे बड़ा राजनयिक केंद्र है। यहां अफ्रीकी संघ और संयुक्त राष्ट्र आर्थिक सहयोग जैसे प्रतिष्ठित संगठन अवस्थित हैं।  ‘मूल की भूमि’ के रूप में जाना जाने वाला इथियोपिया प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध है। इस देश को यूनेस्को के तेरह विश्व धरोहर स्थल होने का गौरव प्राप्त है । पर्यटन की दृष्टि से भी यह देश काफी आगे है. यहाँ सलाना लगभग आठ लाख सैलानी आते हैँ।

मानवता, कॉफी और नील नदी के जन्मस्थान के रूप में व्यापक रूप से जाना जाने वाला इथियोपिया लुभावने परिदृश्य प्रस्तुत करता है। जो उंचे पहाड़ों से लेकर आश्चर्यजनक दानाकिल अवसाद और एर्टा एले के सक्रिय ज्वालामुखी तक फैले हुए हैं। इन्हीं वजहों से इथियोपिया को संभावनाओं के एक प्रकाशस्तंभ के रूप में  माना जाता है। इथियोपिया के चार युवा कलाकारों की कृतियां इस प्रदर्शनी का हिस्सा रहीं।  इनके नाम हैं सुराफेल अमारे सिसाय, मेरान हैलू अबेरा, किरूबेल मिल्के और मिहिरेतु वासी।  युवा डिजाइनर हेवान मेहां द्वारा इथियोपिया के कुछ पारम्पारिक पोशाकों को भी प्रदर्शित किया गया है I

सुराफेल अमारे सिसाय :

सुराफेल अमारे सिसाय द्वारा मुख्यतः मिक्स्ड मीडिया में किए गए कामों को बिनाले में शामिल किया गया है। सुराफेल अमारे की कैनवास पर मिक्स्ड मीडिया में बनी  कई कृतियां जैसे ‘फ्लोटिंग स्टोरीज’ (2023), ‘ ‘फ्यूज्ड स्टोरी’ ( 2023 ), द मॉंक (2023), मोनास्ट्रीऑग्राफी’ सीरीज, ( 2024), द फ्लोटिंग मोनास्ट्री (2025) , विंडोज ऑफ स्टोरीज (2025) आदि प्रमुख हैं।

सुराफेल अमारे के कैनवास पर कई परतें एक साथ मौजूद रहा करती हैं। उसमें कहीं-कहीं बीच में मनुष्य का चेहरा झांकता है, कभी खुली ऑंखों से निहारते,  तो कभी मुंदी ऑंखों से। सुराफेल अमारे के चित्र प्रेक्षक को मेमोरी लेन की ओर ले जाती  है। ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों से जुड़ी कितनी ही कहानियां हैं जिनसे हम अनजान हैं और वे कहानियां सुनी जाने का इंतजार कर रही हैं। वे रियल व वर्चुअल वर्ल्ड में आवाजाही कुछ इस अंदाज में करती प्रतीत होती हैं कि वह वर्तमान  का अतिक्रमण करती प्रतीत होती है।

सुराफेल अमारे बनावट वाली सतहों, धार्मिक बिम्बों और डिटिजल एलीमेंट्स के  सहयोग से रहस्य, अनुष्ठान और अदृश्य चीजों की खोज करते हैं। उनका काम देखने पर ऐसा लगता है मानो अतीत और वर्तमान, परंपरा और आधुनिकता के मध्य एक गुफ़्तगू की कोशिश चल रही हो। सुराफेल अमारे सिसाय अपनी कला में कई परतें, पवित्र चिन्ह और डिजिटल तस्वीरें इस्तेमाल करते हैं ताकि यह दिखा सकें कि हमारे पूर्वजों का ज्ञान, वर्चुअल  ( डिजिटल) समय में भी , हमें रास्ता दिखा सकता है। स्क्रीन और मिट्टी, कंप्यूटर कोड और पुरानी रीतियों, भ्रम और सच्चाई के बीच। यह कला एक ऐसा स्थान बन जाती है जहां हम यह सोच सकते हैं कि हम कहां से आये हैं, किससे जुड़े हैं और समय के लंबे सिलिसिले में क्या सच है ?

इथियोपियाई मॉंक वाला चित्र  को कुछ इस अंदाज में डिस्टॉर्ट किया गया देखने वाले में इन मॉन्क्स के प्रभाव का इथियोपियाई समाज पर लगाया जा सकता है। अपनी कलाकृतियों के जरिए, सिसाय भूली-बिसरी कहानियों को वापस लाते हैं पर कहीं न कहीं एक अकेलेपन की भावना सी छाई रहती है. उनका काम हमें अपने पूर्वजों  से जुड़़ने का न्योता देता है।

मिहिरेतु वासी : लेदर स्क्रैप्स से बनी कृतियां

इथियोपिया के दूसरे कलाकार हैं मिहिरेतुवासी। पेंटिंग के अलावा, मिहिरेतु वासी बटन और चमड़े के टुकड़ों का इस्तेमाल अपनी कला में करते हैं। ऐसा लगता है बटन और चमड़े के रंग, डिजायन और बनावट से उन्हें ख़ास लगाव है.  फैक्ट्री से निकाले गए अलग-अलग आकार के चमड़े के टुकड़े उनकी कला में जादुई प्रभाव ड़ालते हुए एक पहेली की तरह नजर आते हैँ।

रोजमर्रा की छोड़ी गयी चीजों से वे चेहरे और आकृतियां बनाते हैं, जो न सिर्फ देखने  में मनभावन लगता है बल्कि हमारी संस्कृति और सोच से जुड़ी कहानियां भी बयां करती हैं। मिहिरेतुवासी बटन, चमड़े के टुकड़े और रंग-बिरंगे कपड़ों जैसी वैकल्पिक सामग्रियों का इस्तेमाल करते हैं जिनसे वे सांस्कृतिक स्मृतियों को नए रूप में पेश करते हैं। वे कचरे की चीजों को सुंदर कला में बदल देते हैं। उनके कार्यों में रंग, बनावट और प्रतीक चिन्हों के जरिये कहानियां बुनी जाती हैं।

बटनों की सहायता से महात्मा गॉंधी की एक प्रचलित छवि को देख किसी भी सामान्य भारतवासी को अच्छा लगेगा। दो किस्म के बटन से गॉंधी की इतनी जीवंत छवि प्रेक्षक के सामने आती है कि वह बरबस वहां रूकने को मजबूर हो जाता है।  बटनों के इस कोलाज को नाम दिया गया है ‘फेस ऑफ हामेर’। इस कृति को इसी वर्ष बनाया गया है। छोटे-छोटे बटन कैसे एक महानायक की छवि निर्मित करते हैं इसे मिहिरेतु वासी ने दिखाया है।  दो तीन रंगों के बटन से बनी माथे पर बोझ रखे  इथियोपियाई महिला की छवि इतनी जीवन के करीब है कि उसे देखते हुए उसके माथे के सामान के भार तक को महसूस किया जा सकता है I

चमड़े की फैक्ट्री के बाहर फेंके गए अवशेषों व कतरनों  का उपयोग कर मिहिरेतु वासी ने ‘सिंह’, ‘युवती’ आदि की बेहद जीवंत छवि निर्मित करने का प्रयास किया। लेदर स्क्रैप्स के कोलाज से निर्मित यह कोलाज मिहिरेतु वासी ने 2023 में बनाया था। शेर की ऑंख, उसकी पतली मूंछें, चौड़ा माथा, रोबीली मुद्रा इन सबको बेहद प्रभावी अंदाज में बनाया गया है। शेर वाली छवि इतनी जीवंत है मानो प्रेक्षक उसे बेहद करीब से, उसके ठीक नजदीक खड़ा होकर, देख रहा हो ताकि उसके चेहरे के सूक्ष्म भावों को  भी देखा जा सकता है। चमड़े के पतले-पतले टुकड़ों को इस कल्पनाशीलता से सजाया गया है कि कृति सहज और स्वाभाविक नजर आती है। मिहिरेतु वासी ने इस कृति को दिलचस्प नाम दिया है ‘इथियोपियन पोर्टेट’।

इन्हीं स्क्रैप्स से बनी एक अन्य प्रभावी कृति है ‘इथियोपियन गर्ल’ है। यह कृति भी इसी वर्ष की बनी हुई है। मिहिरेतु वासी के चमड़े  की बनी कृतियों में लड़की या शेर की कृति में सबसे आकर्षक हिस्सा है ऑंख। ऑंखें बेहद जीवंत सी  नजर आता है। चमड़े की कतरनें युवती के बिखरे बाल के रूप में बखूबी जंचते हैं। मिहिरेतु वासी द्वारा लेदर स्क्रैप्स से बनी ‘बर्ड एंड फ्लावर’ बरबस ध्यान आकृष्ट करती है । इस कृति में एक पक्षी अपनी चोंच से हरे पत्ते के बीच बैठे एक फतिंगे को पकड़ने का प्रयास कर रहा  सामान्य से लगने वाले यह चित्र जीवन के इतना करीब  कि देखने वाले की ऑंखें ठहर सी जाती  चमड़े की धूसर पृष्ठभूमि में बनी हरे रंग की पत्ती कमाल का प्रभाव छोड़ती हैं। ‘बर्ड एंड फ्लावर’ सबसे अच्छी कृतियों में से  है जो देखने वाले के अंदर जीवन के प्रति राग पैदा करती है।

मिहिरेतु वासी के कुछ चित्र कैनवास पर एक्रीलिक से भी बनाए गए हैं। सामान्य जनजीवन के ऐसे चित्रों में ‘फेस ऑफ इथियोपिया’, ‘फेस ऑफ मर्सी’ प्रमुख हैं। इसमें ग्रामीण महिलाओं की छवि को पूरे इथियोपिया का चेहरा बताया गया है। एक्रीलिक में बने तीनों चित्र में स्त्री छवि है। इन तीनों चित्रों का रंग संयोजन कुछ इस प्रकार है कि कैनवास की पृष्ठभूमि में स्त्री छवि उभर कर आती है। इन चित्रों में इथियोपिया के  ग्रामीण स्त्रियों की पुरानी पोशाकें पहनी छवियाँ हैँ ।

मिहिरेतु वासी द्वारा लेदर स्क्रैप्स और कैनवास पर एक्रीलिक में बने स्त्री छवियों में एक फर्क नजर आता है वह यह है कि  रंगों से बनी स्त्री छवियां पारंपरिक हैं जबकि लेदर स्क्रैप्स में बनी छवि नये जमाने की स्त्री को सामने लाते हैं। वे नये इथियोपिया का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं I इथियोपियाई कलाकारों में मिहिरेतु वासी का काम बहुत प्रभावी बन पड़ा है।

किरूबेल मिल्के : बटन्स ऑन डेनिम

किरूबेल मेल्के डेनिम, बटन आदि के रचनात्मक उपयोग के लिए जाने जाते हैं। एक बिना शीर्षक वाला खूबसूरत काम है जिसे डेनिम पर बटन की सहायता से बनाया गया है  ‘बटन्स ऑन डेनिम’। जींस के कपड़ों और तांबे के बटन  से बनी कृति आपको देर तक ठहरने को विवश करती है। जींस के रंग-बिरंगे कपड़ों के छोटे-छोटे चौकोर टुकड़ों की सहायता से इतनी खूबसूरती से निर्मित किया गया है. रोजमर्रा की सामान्य चीजें कैसे कलाकार अपनी कल्पनाशीलता से एक अनूठी कृति में बदल डालता है, उसकी बानगी प्रस्तुत करती है ‘बटन्स ऑन डेनिम’।

किरूबेल मिल्के की कला उनकी माँ के गारमेंट फैक्ट्री में काम करने से प्रेरित है। वह शहर की लय को दर्शाने के लिए पुराने कपड़ों का उपयोग करके कलाकृतियां बनाती हैं। स्थानीय पोशाकों, रीति-रिवाजों पर वैश्वीकरण के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए भी किरुबेल मिल्के मौलिकता, अनुकूलन का ख्याल रखते हैँ.  कपड़े कैसे बदलते रूझानों को दर्शाते हैं  इसे भी किरुबेल का काम सामने लाता है.

किरूबेल सवाल उठाते हैं कि क्या वैश्विक प्रभाव सांस्कृतिक जड़ों को बाधित करता या उनमें घुल-मिल जाते  कि क्या इथियोपियाई लोग संघर्ष या अराजकता के बिना विदेशी  विचारधाराओं को अपना बनाने का रास्ता खोज सकते हैं। किरुबेल मिल्के अपनी आस-पास की सामान्य चीजों से आम जीवन प्रतीकात्मक और सुंदर कलात्मक भाषा में बदल देते हैं जो हमें संस्कृति और पहचान पर एकता और गहराई से सोचने को मजबूर करती है।

मेरान हाइलु अबेरा: सो क्लोज येट फार अवे

मेरॉन हाइलू अबेरा का बाकी इथियोपियाई कलाकारों से बिल्कुल अलहदा है। इन्होंने फैब्रिक पर पोलियेस्टर फेल्टिंग और फिर हैंड स्टीचिंग कर अपनी कृतियाँ निर्मित की है। इनकी विजुअल दुनियां एकदम भिन्न है. इनकी बनाई कृतियों में एक ऊपर से रंग-बिरंगी चमक दिखाई पड़ती है पर गौर से देखने पर  गर्भ की कल्पना को साकार करने का प्रयास दिखता है. गुलाबी, हरे, पीले, नीले, गुलाबी, आसमानी, कत्थई रंग को बीच-बीच में स्टीच किया हुआ है। मेरान हाइलु अबेरा का काम उनके राजमर्रा के जीवन और उनके आसपास के शहरी माहौल से प्रेरित है। यह कला श्रृंखला मेरान हाइलु अबेरा द्वारा बनायी गयी है। कई संस्कृतियों, धर्मों और सोच के तरीकों में गर्भ केवल एक अंग नहीं बल्कि एक गहरे अर्थ वाला प्रतीक माना जाता है। यह जीवन की शुरूआत का प्रतीक होता है- एक ऐसी जगह जहां जीवन आकार लेता है। गर्भ में जीवन बून्द गिरने से लेकर शिशु के आकार लेने की प्रक्रिया को पकड़ने का प्रयास किया गया है I

2025 में बनी कृति को शीर्षक दिया है ‘मीट मी व्हेयर द वाइल्ड फ्लावर्स आर’ I यह शीर्षक एक श्रृंखला का हिस्सा है। इस  श्रृंखला की कृतियों को चौकोर बनाया गया है। ऐसे ही एक अन्य श्रृंखला है  ‘सो क्लोज येट फार अवे’। इसे भी फैब्रिक पर पौलिएसटर फेल्टिंग कर हाथ से स्टीच किया गया है। इसे निर्मित करने का वर्ष 2023 है।

इथियोपिया की प्रदर्शनी में पारंपरिक इथियोपाई पोशाकों की भी प्रदर्शनी लगाई गयी। कॉटन कपड़े में कलाकार द्वारा डिजायन, सिलाई और कढ़ाई किया हुआ काम काफी आकर्षक बन पड़ा है। एक युवा डिजायनर हेवान मेहां पारंपरिक इथियोपिआई पोशाकें डिजायन करने के लिए जानी जाती हैं। हेवान अपना कार्यशाला भी चलाती है जहां वे युवाओं को प्रशिक्षण भी देती हैं। प्रदर्शनी में पोशाकों के अलावा दुपट्टे और टोपियां भी प्रदर्शित की गयी हैं। इथियोपियाई टोपी काफी आकर्षक नजर आती है।

इथियोपियाई कलाकारों का काम देखने वाले पर गहरा प्रभाव तो छोड़ते ही हैं प्रेक्षक के अंदर इस बात का अहसास कराता है कि चित्रकला ऐसा माध्यम है जो भाषा के बंधनों को तोड़ सही मायने में एक वैश्विक संवाद कायम करता है। अफ्रीका के इस महत्वपूर्ण देश के बहाने पटना के कलाप्रमियों व दर्शकों का नये चाक्षुष अनुभव से गुजरने का मौका प्रदान करती है।

अनीश अंकुर

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