“प्रकृति में प्रकट गजानन : आस्था, आकृति और अनुभूति ”

लखनऊ, 18 फ़रवरी 2026। इन दिनों लखनऊ की कला स्रोत आर्ट गैलरी में छायाकार पुनीत कात्यायन की ‘गजानन’ प्रदर्शनी आयोजित की गई है, जिसमें गजानन के प्राकृतिक स्वरूप के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है। इन छायाचित्रों में प्रकृति की साधारण-सी दिखने वाली वृक्ष-छाल, गाँठें और उभार जब कैमरे की दृष्टि से गुजरते हैं, तो वे केवल बनावट नहीं रह जाते, बल्कि एक आध्यात्मिक संकेत में रूपांतरित हो उठते हैं। छायाकार की दृष्टि यहाँ दृश्य को खोजती नहीं, उसे पहचानती है—और यही पहचान गणेश के गजानन स्वरूप को एक सहज, स्वाभाविक और अलौकिक आयाम प्रदान करती है।

इन चित्रों का सबसे बड़ा सौंदर्य उनकी अनायास सृजित प्रतीकात्मकता है। कहीं वृक्ष की मुड़ी हुई जड़ सूंड का आभास देती है, तो कहीं छाल की दरारें नेत्र, ललाट और मुखाकृति का सूक्ष्म संकेत रचती हैं। यह रचना किसी कृत्रिम हस्तक्षेप का परिणाम नहीं लगती, बल्कि प्रकृति और कलाकार के मध्य एक मौन संवाद का साक्ष्य प्रतीत होती है।

रंगों का संयमित प्रयोग—मिट्टी के भूरे, गेरुए और धूसर टोन—चित्रों को भव्यता के बजाय धैर्य और ध्यान की अनुभूति प्रदान करता है। प्रकाश और छाया का संतुलन आकृतियों को उभारते हुए भी रहस्य बनाए रखता है, जिससे दर्शक की कल्पना सक्रिय बनी रहती है। यही सक्रिय सहभागिता इन छवियों को स्थिर फ्रेम से आगे बढ़ाकर एक जीवंत अनुभूति में परिवर्तित कर देती है।

आज इस प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए लखनऊ दूरदर्शन के कार्यक्रम प्रमुख आत्म प्रकाश मिश्र और वरिष्ठ कलाकार मोहम्मद शकील ने भी अत्यंत सुंदर भाव व्यक्त किए। आत्म प्रकाश मिश्र ने कहा कि गणेश के विभिन्न रूपों के दर्शन ने उनकी आत्मा को भीतर तक भिगो दिया। उनका मानना था कि गणेश के प्राकृतिक स्वरूप को विशाल वृक्षों के तनों और जड़ों में देख पाना तथा उन आकृतियों में गजानन की कल्पना करना अपने-आप में एक अद्भुत अनुभव है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि पुनीत कात्यायन की यह दृष्टि केवल फोटोग्राफी नहीं, बल्कि संवेदनशील अवलोकन और कल्पनाशील चेतना का परिणाम है, जिसकी सराहना अवश्य की जानी चाहिए।

इसी क्रम में लखनऊ के कलाकार, क्यूरेटर एवं कला समीक्षक भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि पुनीत ने नगरवासियों को प्रकृति के भीतर गणेश के दर्शन कराए—वह भी एक या दो नहीं, बल्कि 38 विभिन्न स्वरूपों में। उनके अनुसार कलाकार का वास्तविक गुरु स्वयं प्रकृति ही होती है; वही उसे आकार, भाव और लय सिखाती है, और कलाकार उन्हीं अनुभूतियों को अपने सृजन में अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है।

समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो ये छायाचित्र केवल धार्मिक प्रतीक का पुनरावर्तन नहीं हैं, बल्कि प्रकृति में निहित आध्यात्मिक संरचनाओं की खोज हैं। यहाँ गणेश प्रत्यक्ष मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि संकेत, आभास और अनुभूति के रूप में उपस्थित हैं—जो दर्शाता है कि आस्था का मूल रूप बाह्य आकार में नहीं, बल्कि अंतर्मन की दृष्टि में निहित है।

इस प्रकार ये चित्र सौंदर्य, प्रतीक और संवेदना का ऐसा त्रिवेणी संगम प्रस्तुत करते हैं, जहाँ कला केवल दृश्य आनंद नहीं देती, बल्कि मन में एक शांत, पवित्र और चिंतनशील स्पंदन भी जगाती है। यही इनकी वास्तविक कलात्मक उपलब्धि है। इस अवसर पर पुनीता अवस्थी, सुची दिनेश, अमित तांगड़ी, अविनाश लिटिल, उमेंद्र प्रताप सिंह और अनुराग डीडवानिया उपस्थित रहे।

-भूपेन्द्र कुमार अस्थाना 

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