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यूं तो हर कलाकार को अपने जीवन में संघर्ष करना होता है भले ही वह आर्थिक समाजिक सँघर्ष हो या मानसिक। लेकिन कलाकार इस संघर्ष से तप कर निकलता है और उसकी कला भी निखरती है।
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हुसैन जैसे विश्वविख्यात कलाकार को भी संघर्ष करना पड़ा जब सड़क के किनारे दस रुपए में अपनी पेंटिंग बेचनी पड़ी । वान गॉग का जीवन भी संघर्षों से भरा था लेकिन यह कहांनी है लाल बहादुर की जो लीक से हटकर जीने और पेंटिंग करनेवाला चित्रकार है।
क्या आपने इस आर्टिस्टके चित्र देखे हैं ?अगर नहीं देखे हैं तो जब भी उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगे उसे जरूर देखें। और अगर आप प्रदर्शनी नहीं जा सकते तो कम से कम इंटरनेट पर उनके चित्रों को जरूर देख सकते हैं ।
आपको यह चित्र जे. स्वामीनाथन, गुलाम मोहम्मद शेख, मंजीत बाबा, मनु पारीख आदि के चित्रों से किसी मायने में कम नहीं लगेंगे बल्कि उनके काम में कृष्ण खन्ना जैसी सफाई मिलेगी I लेकिन जब आप लाल बहादुर की सामाजिक स्थिति पारिवारिक हालात और उनकी संघर्ष यात्रा को सुनेंगे तो आप दंग रह जाएंगे कि किस तरह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के जमानिया के एक गरीब परिवार में जन्मे लाल बहादुर सिंह ने अपनी लगन और प्रतिभा से कला की दुनिया में एक नई उम्मीद पैदा की है ,वह अद्भुत है। पिछले दिनों नव्या गैलेरी की ओर से लालबहादुर के चित्रों की एक प्रदर्शनी लगी तो उसमें प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी एवं लेखक अशोक वाजपेयी ने उनके चित्रों को देखा तो वह बड़े प्रभावित हुए और उन्होंने तभी यह किया कि वे आर्ट मैटर प्रोग्राम में लाल बहादुर को जरूर आमंत्रित करेंगे ताकि कला की बौद्धिक एवम एलीट दुनिया लाल बहादुर और उनकी प्रतिभा से रूबरू हो सके और उनकी संघर्ष यात्रा को भी जान सके ।

रज़ा फाउंडेशन द्वारा 16 जुलाई को आयोजित 101वें आर्ट मैटर में लाल बहादुर सिंह के जीवन संघर्ष को जब लोगों ने सुना तो वे दंग रह गए और उनके चित्रों को देखा तो उन्हें आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। इस कार्यक्रम में उंनसे बातचीत की सत्यवती कालेज के पूर्व प्राचार्य इतिहासकार,रंगकर्मी एवम एक्टिविस्ट शम्सुल इसलाम ने।
लाल बहादुर के चित्रों में जो एक परिपक्वता है, रंगों का अद्भुत संयोजन है और अद्भुत कल्पना शीलता है एक प्रति संसार है, एक नए तरह की शैली है, उसे देखकर एक सामान्य दर्शक भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है । लाल बहादुर अपने गांव में जैसे तैसे स्कूली शिक्षा पास कर दिल्ली आए काम की तलाश में। इससे पहले वह अपने गांव में किसी के घर बारात आने पर सजावट आदि का काम करते थे और स्कूल की कॉपी में चित्र आदि बनाते थे I जिसके लिए उन्हें परिवार में ताने सुनने पढ़ते थे तथा उनकी मार पिटाई भी होती थी। ऐसे में लाल बहादुर ने चित्रकला को न केवल जारी रखा बल्कि अपने उस पैशन को आगे बढ़ाया और यह उनके लगन का ही नतीजा है कि वह आज यहां तक पहुंचे ।

जब वह दिल्ली आए तो काम की तलाश में भटकते रहे, किसी तरह उन्हें सिनेमाघर के पोस्टर बनाने का काम मिला जहां उनकी मासिक सैलरी मात्र ₹600 थी। इसी में उनको घर के किराए से लेकर बस से आने जाने और खाने पीने की व्यवस्था करनी पड़ती थी I लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगा कि वह इन ₹600 में अपनी जिंदगी नहीं गुजार सकते, फिर उन्होंने एक स्कूल में नौकरी के लिए प्रयास किया लेकिन उन्हें वह नौकरी इसलिए नहीं मिल सकी क्योंकि उनके पास कला की कोई डिग्री नहीं थी। तब लाल बहादुर बस में घर जाते समय खूब रोये।
उन्हें जनगढ़ सिंह श्याम की तरह कोई स्वामीनाथन तो नहीं मिले लेकिन श्रीकांत दुबे नामक एक कलाकार जरूर मिले और उनकी बड़ी मदद की और उन्हें सलाह दी कि वे आर्ट कालेज से डिग्री हासिल कर ले I ताकि उसकी मदद से उन्हें भविष्य में कोई नौकरी आदि मिल सके। इससे पहले लाल बहादुर का संपर्क एक महिला से हुआ जो उनसे विश्व के महान चित्रकारों की डमी पेंटिंग बनवाती थी और उसके बदले में 45 रुपए वर्गफुट के हिसाब से उन्हें पैसे देती थी, जिससे लाल बहादुर का गुजारा होता था पर वह महिला अमरीका में बस गयी। उस महिला के लिए लालबहादुर ने विश्व प्रसिद्ध चित्रकार रेम्ब्रांट की पेंटिंग बनाई तो वह महिला भी देखकर दंग रह गई। आप उसे पेंटिंग को देखकर नहीं बता सकते कि यह रेम्ब्रांट की असली पेंटिंग नहीं है । लाल बहादुर की पेंटिंग जो भी देखता था वह उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता I इस बीच उनकी मुलाकात निशांत नाट्य मंच के शमशुल भाई से हुई और लालबहादुर नाटक आदि करने लगे तथा सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने लगे । लेकिन इस बीच लाल बहादुर ने दिल्ली आर्ट कालेज से बाकायदा बी.एफ.ए. (बैचलर ऑफ़ फाइन आर्ट्स ) की पढाई पूरी कर ली थी और एम.एफ.ए.(मास्टर ऑफ़ फाइन आर्ट्स) भी किया और वह भी प्रथम श्रेणी के साथ ।

यह कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। गांव का यह लड़का जो ठीक से हिंदी भी नहीं लिख पाता था उसे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ना इतना मुश्किल हुआ कि उन्हें क्लास में अंग्रेजी समझ में नहीं आती थी तो उन्होंने आर्ट कॉलेज में हिंदी की पढ़ाई के लिए दबाव डाला और अंत में प्रशासन की वजह से टीचरों को हिंदी में भी पढ़ाई की व्यवस्था करनी पड़ी। इस तरह लाल बहादुर सिंह ने कला का बकायदा प्रशिक्षण भी लिया और वह एक बकायदा कलाकार बन गए। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कला को और विकसित किया और आज वह एक संपूर्ण कलाकार हैं । वे 40 वर्ष के हो गए।उन्होंने पेंटिंग की कई सिरीज़ बनाई जिसमें गाय , चिड़िया, स्त्री, प्रकृति, महानगर, श्रृंखला की कई तस्वीरें शामिल हैं I जिनमें उनके रंग संयोजन अद्भुत होते थे उनकी कल्पना शक्ति भी बहुत ही विलक्षण है । आप उन चित्रों को देखेंगे तो आपको लगेगा नहीं यह लाल बहादुर की पेंटिंग है। अगर उस पेंटिंग से उनका नाम हटा दिया जाए तो आप हो सकता है उनको देखकर कहें यह तो किसी बड़े कलाकार की तस्वीर लगती है।
लाल बहादुर के पास प्रतिभा तो है ही गहरा सामाजिक सरोकार भी है। उन्होंने कला समीक्षकों को पटाने औऱ अपने ऊपर लिखवाने का काम नहीं किया। उन्होंने किसी को दो पैग पिलाने का इंतज़ाम भी नहीं किया। उनकी प्रतिबद्धता यह है कि उन्होंने फरीदाबाद में अपने मकान की दीवार के पीछे भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद और अशफ़ाकउल्ला की तस्वीर बना रखी है और वह अपने मोहल्ले में इससे बहुत लोकप्रिय हो गए हैं । अगर आप वहां जाएं तो कोई रिक्शा वाला या ई रिक्शा वाला या टेंपो वाला आपको लाल बहादुर के घर तक पहुंचा देगा I क्योंकि वह जानने लगा है कि भगत सिंह और आज़ाद की तस्वीर वाले आर्टिस्ट का घर किधर है। लाल बहादुर की खासियत बस इतनी ही नहीं है। वह दिल्ली के किसान आंदोलन में भी बहुत सक्रिय रहे और वहां धरना स्थल पर जाकर किसानों के आंदोलन पर कई तस्वीर बनाई है । उनका यह भी कहना है की किसान तो एक पुलिंग शब्द है क्योंकि हमने यह मान लिया की खेती बाड़ी का काम केवल पुरुष करते हैं I जबकि सच्चाई यह है कि इस काम में देश की महिला आबादी भी उतनी ही लगी हुई है जितने पुरुष और इस बात को उजागर करने के लिए उन्होंने महिला किसानों की पेंटिंग की सिरीज़ बनाई है। उन्होंने स्त्रियों के श्रम के महत्व को भी समझा है और पहाड़ की स्त्रियों की भी एक सीरीज बनाई है ।

लाल बहादुर केवल तस्वीर नहीं बनाते बल्कि वह गहरे सामाजिक संदेश भी देते हैं। दिल्ली महानगर पर उनके जो कुछ चित्र है वह तो बड़े लाजवाब है। डीटीसी की बसों की भीड़ हो या मेट्रो की भीड़ या फिर पर्यावरण का मुद्दा हो या बड़े-बड़े अपार्टमेंट की संस्कृति हो, इन सब को लाल बहादुर ने अपने सुंदर चित्रों में कैद किया है। कृष्ण खन्ना ने अपनी आंखों के सामने बनती हुई दिल्ली को देखा तो लाल बहादुर ने उस विशालकाय और अमानवीय दिल्ली के आतंक को भी पहचाना है तथा यह संदेश दिया है कैसे दिल्ली में मनुष्य जानवरों से भी बदतर हालत में हैं। उन्होंने विकास के सवाल को भी उठाया है जो मनुष्य के प्रति संवेदना हीन है
लालबहादुर का काम कला की एलीट दुनिया के लिए चुनौती है। वे ब्रांड नहीं बने हैं क्योंकि सच्चे आर्टिस्ट हैं। वे सुबोध गुप्ता की तरह इस बाजार को हथियाना नहीं जानते क्योंकि वे जमीन से जुड़े जनता के चित्रकार है। वे रॉकफेलर फ़ेलोशिप के लिए चित्र नहीं बनाते। लालबहादुर ने अपने घर में जरूरतमंद संघर्षरत चित्रकारों के लिए स्टूडियो भी खोल रखा है। वे यहां आकर मुफ्त रहकर खा पीकर चित्र बना सकते हैं। लालबहादुर चाहते हैं कि इन युवाओं को उनकी तरह मुश्किलों का तकलीफों का सामना न करना पड़े जो उन्होंने झेला।
तो इस लाल बहादुर के चित्र जरूर देखिये।
-विमल कुमार

