मुगल मिनिएचर्स और यूरोपियन रियलिज्म दोनों से अलग है पटना कलम

पटना म्यूजियम में पिछले दिनों प्रदर्शित हुयी  “पटना कलम” के चित्रों की प्रदर्शनी कला इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना को सामने लाने की सार्थक कोशिश रही I अपने लेख के इस भाग में कला समीक्षक अनीश अंकुर  मुगल मिनिएचर्स और पटना कलम के फर्क को रेखांकित कर रहे हैं I

अनीश अंकुर

पटना कलम के छोटे-छोटे लघु चित्रों को देखकर अमूमन लोग इसकी तुलना मुगल मिनिएचर्स (लघुचित्रों) से करने लगते हैं। इसकी एक और बड़ी वजह यह है कि पटना कलम के कलाकार मुगल दरबार से निकलकर आये थे लिहाजा इस किस्म की अवधारणा सहज ही बनती चली गई। मुगल चित्रकला से प्रभावित होने के बावजूद पटना कलम अपनी विषयवस्तु और पद्धति दोनों में उससे भिन्न भी रहा है। मुगल मिनिएचर्स में राजा-महाराजा, देवी-देवताओं और रसूखदार तबकों के दृश्य रहा करते हैं। विषय वहाँ केन्द्रित होता था शाही वैभव और सत्ता के प्रदर्शन पर इस कारण बाग-बगीचे, युद्ध और शिकार आदि के चित्र यहाँ बनाए जाते थे।

जबकि पटना कलम में नज़र आते हैं– बाजार, मेले-ठेले,किसान, कारीगर, संगीतकार, उत्सव, जानवर-पक्षी और साधारण लोगों की जिंदगी। विभिन्न रोजगार से जुड़े वर्ग, जैसे भिश्ती, चौकीदार, दरबान, धोबी, बढ़ई, लुहार, सुनार, मनिहार, जरदोजी करने वाले, जुलाहे आदि चरित्र और फूल-पौधे तथा पशु-पक्षियों का चित्रण पटना कलम के मुख्य विषय रहे हैं।

हुलास लाल के दो चित्र (पटना कलम)

मुगल चित्रों में सजावटीपन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मुगल चित्रों में वास्तु और बड़े-बड़े बॉर्डर रहा करते हैं। मुगल चित्रों में राजसी ऐश्वर्य और धमक के  दिखावे के लिए गहरे, चमकीले और समृद्ध रंग उपयोग में लाए जाते थे जबकि पटना कलम में हल्के और सीमित रंग लाए जाते थे।

मुगल चित्रों में जहां कागज और कपड़ा उपयोग में लाया जाता है वहीं पटना कलम के चित्र कागज के साथ अभ्रक, हाथी दांत आदि पर भी बनाया जाता रहा है ताकि यूरोपियन उसे आसानी से अपने देश भेज या ले जा सकें I

पटना शैली के कलाकारों ने यूरोपीय तकनीक को भी अपने ढंग से अपनाया । पश्चिमी तकनीकों जैसे छायांकन (शेडिंग) जिसे स्टिपलिंग भी कहा जाता है को अपनाया। स्टिपलिंग का मतलब बिंदुओं से नक्काशी जैसा करने का काम है। साथ ही देखने का एक ऐसा तरीका या बुनियादी परिपेक्ष्य जो जीवन के करीब प्रतीत होता हो। इसके लिए त्रिआयामी प्रभाव पैदा करने की कोशिश की जाती है। यह चीज पारंपरिक मुगल मिनिएचर्स के सपाट और सजावटी कला से भिन्न नजर आती है ।

इस वजह से पटना कलम में मुगल कला की नाजुकता + यूरोपीय यथार्थवाद (रियलिज्म, परिप्रेक्ष्य और छाया) का मिश्रण हुआ।

पटना कलम की कला :

‘आम’ होकर भी पटना कलम शैली अपनी तकनीक, विषय वस्तु आदि के कारण कला इतिहास में ‘खास’ बन गयी। पटना कलम शैली के चित्रों में समानुपात एवं सादगी का भरपूर ध्यान रखा गया है। इस शैली के चित्रों को बनाने में खनिज, रासायनिक और वानस्पतिक रंगों का प्रयोग हुआ है। ये चित्र सीधे कूची से बनाए जाते थे। इसे “कजली स्याही” तकनीक कहा जाता है ।

कजली स्याही का मतलब यह हुआ कि बिना पेंसिल से स्केच किए सीधे ब्रश से चित्र बनाना I वास्तव में ऐसे में यह काम अत्यधिक दक्षता की मांग करता है क्योंकि एक बार ब्रश लग जाने पर उसे मिटाया नहीं जा सकता है। इससे  लाइन वर्क बहुत महीन होते हैं और सटीक किनारे बन पाते हैं। कजली स्याही तकनीक के लिए ब्रश, गिलहरी के बालों से बनाई जाती है।

हुलास लाल द्वारा बनाया गया एक अन्य चित्र

यदि रंगों के हिसाब से देखें तो यूरोपियन रुचि के अनुसार अधिकांशतः हल्के,  सादे, मुलायम और मिटटी से जुड़े जैसे रंग भूरे, ग्रे और गेरुआ रंग इस्तेमाल में लाया जाता है। मुगल लघु चित्रों की तरह इसमें चटख रंग कम उपयोग में लाये गए हैं। अधिकांश रंगों को प्राकृतिक चीजों-फूलों, फलों, पत्थरों और मिट्टी से तैयार किया जाता था। यूरोपीय खरीदारों के लिए रंग हल्के और म्यूटेड (सेपिया, लाल मिट्टी) होते थे। यूरोपीय प्रभाव में तिरछे ब्रश स्ट्रोक से छाया दर्शायी जाती है। बैकग्राउंड ज्यादातर सादा हुआ करता है फोकस सिर्फ आकृतियों पर होता है।

चित्र बनाने में वाटरकलर (जलरंग)का अधिक उपयोग होता था। रंग संयोजन कोमल और सौम्य रखने पर बल दिया जाता था। आकृतियों की बाहरी रेखाएँ स्पष्ट और सशक्त होती थीं। सूक्ष्म बारीकियों पर ध्यान दिया जाता था। अधिकतर चित्रों में विस्तृत पृष्ठभूमि नहीं होती या कहें पृष्ठभूमि का अभाव ही रहा करता था केवल मुख्य पात्र या दृश्य पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

जॉर्ज चिनेरी द्वारा चित्रित गाँव का एक दृश्य

इन विशेषताओं को पटना म्यूजियम मे प्रदर्शित चित्रों में थोड़ा गौर से देखने पर पता चल जाता है।

प्रदर्शनी में एक चित्र है ‘अंत्येष्टि चिता’। इसे कागज पर वाटर कलर से बनाया गया है। गंगा किनारे चिता सजी है। बगल में बांस की वह सीढ़ी है जिसपर शव को लाया गया है। मुखाग्नि देने वाले चिता को अग्नि प्रदान कर रहे हैं। जनेऊ, धोती पहने व्यक्ति चिता के चारों ओर परिक्रमा करता दिख रहा है। पास में नजदीकी रिश्तेदार दुःखी और उदास खड़े हैं। चित्र में इन ब्यौरों पर ध्यान दिया गया है। एक व्यक्ति जो जो जमीन पर बैठा है वह थोड़ा अधिक टूटा हुआ प्रतीत हो रहा है। यह व्यक्ति मृतक का सबसे करीबी प्रतीत होता है। अंत्येष्टि में शामिल सभी लोगों ने सफेद वस्त्र पहना हुआ है। उनके चेहरे की लकीरों से उनके दुखी मनोदशा का चित्रण होने के कारण चित्र प्रभावी बन बड़ा है। इस चित्र को देखते हुए प्रेक्षक को श्मशान घाट के प्रचलित दृश्य के एक खास लम्हे का अहसास होता है।

‘अंत्येष्टि चिता’  जहां हिंदू रीति से अंतिम संस्कार को दर्शाता है वहीं ‘ शव को दफनाने का दृश्य’ मुसलमानों द्वारा अंतिम संस्कार किए जाने की प्रक्रिया को चित्रित करता है। चित्र दोनों समुदायों की पद्धति के फर्क को भी सामने लाता है पर कई बातें समान भी है। अपने प्रियजन को दफनाने जाने वालों के समूह पर वैसा ही दुखी मनोभाव, सफेद वस्त्र, शव को कब्र में ले जाते समय तकलीफ भरे चेहरे को लक्षित किया जा सकता है। चित्र में दो तीन चीजें थोड़ी अलग हैं जैसे कब्र खोदने वाला, भिश्ती, बगल में ताबूत, जमीन पर मटका आदि अब देखा जा सकता है। इस चित्र में शामिल लोगों के सफेद कपड़े से पूरा तन ढका है। उनके पैरों में जूतियां हैं। ताबूत देखकर भी उनकी हैसियत का पता चलता है।  चित्र देखते हुए उनकी संपन्नता का अहसास उनके सलीके से अपने कपड़ों को देखकर होता है। इस चित्र में रंगों का उपयोग इसे और विशिष्ट बना देता है। धूसर पृष्ठभूमि में कत्थई मटके, भिश्ती का नीले और लाल रंग का वस्त्र इसे खास बना देता है। ‘शव दफनाने का दृश्य’ संजय लाल के संग्रह से है। यह चित्र भी जलरंग माध्यम से बना है। इन दोनों चित्रों को देखते समय दर्शक ठहरने को विवश होता है।

एक अन्य चित्र है ‘जलवाहक’ जिसे भिश्ती कहा जाता था। इस चित्र में भिश्ती खड़ा है। गहरे हरे रंग का वस्त्र, माथे पर हल्के हरे रंग की पगड़ी, कंधे पर टांगे पीले रंग का हनुमानी झंडा, लाल रंग का कमरबंद और उसके बगल में काले रंग का जल ढोने वाला पात्र । चित्र देखने पर भिश्ती के भव्य व्यक्तित्व का अंदाजा होता है। यदि कमर में काले रंग वाला जल ढोने वाला न हो तो चित्रित व्यक्ति को भिश्ती मानना भी मुश्किल होगा।

प्रदीप जैन के संग्रह से एक कई रंगों के उपयोग वाला बेहद दर्शनीय चित्र ‘मुहर्रम का ताजिया’ है। यह वाटर कलर से बना है। इस चित्र को माइका (अभ्रक) पर पिगमेंट से बने ‘मुहर्रम का जुलूस’ के साथ देखने पर उनकी भव्यता का अंदाजा हो जाता है। दोनों चित्र रंगों से भरे हुए है। ‘मुहर्रम का जुलूस’ धूसर पृष्ठभूमि के बजाए लाल रंग से बना है। इस चित्र में बड़ी संख्या में हर तबके के लोग देखे जा सकते हैं। कंधों  पर लिए ताजिया, उसका झंडा, उसकी रंगीन बनावट, सशस्त्र सैनिकों के चित्र में एक शाही हलचल, सरगर्मी जैसी है। लोगों के हुजूम में वैसे तो पुरुषों की मौजूदगी पर पर कुछ स्त्रियां भी हैं। ताजिए की बनावट और उसकी सजावट देखकर प्रेक्षक ठिठक जा सकता है। चित्रकार ने इन सबको संपूर्णता में चित्रित किया है। दोनों चित्रों में पुराने पटना में मुहर्रम की ताजिया और जुलूस को देखकर मानो दर्शक उस दौर में खो सा जाता है। मुहर्रम पर ही बना एक अन्य चित्र जिसका शीर्षक भी ‘मुहर्रम’ ही  है। इसमें लोग सुखी मुद्रा में चारों ओर बैठे हैं।

सौजन्य फेसबुक

मुहर्रम के साथ छठ पूजा के चित्र भी बनाए गए हैं। अभ्रक पर पिगमेंट से बना यह चित्र प्रदीप जैन के संग्रह का है। चित्र में गंगा किनारे का चित्र है जिनमें  कुछ महिलाएं रंगीन साड़ी बैठी हैं । पर अर्घ्य देने वाली महिलाएं, जैसी की परिपाटी है, सफेद साड़ी पहने हुए हैं। अर्घ्य नदी किनारे के एकदम पास पानी में दिया जा रहा है। एक-दो लोग थोड़ी दूरी पर तैरते नजर आ रहे हैं। नदी का पानी स्वच्छ दिखाई पड़ रहा है इस कारण नीला है आज की तरह मटमैला नहीं। अर्घ्य वाले सूप में केला, नारियल सरीखे फल हैं।

ऐसे ही एक रंगीन चित्र ‘मौसमी उत्सव’ है। जिसमें विभिन्न रंगों की साड़ी पहने लड़कियां, महिलाएं उत्फ़ुल दिख रही हैं। कुछ महिलाएं पेड़ से बने झूले से मस्ती में झुला झूल रही है। काले रंग की पृष्ठभूमि रात्रि पहर का संकेत देती हैं। कई महिलाएं झूला झूलती महिलाओं को देख रही हैं। लेकिन सब एक दूसरे में शामिल भी हैं। यह चित्र संजय लाल के संग्रह का है।

कागज पर वाटरकलर में बना एक चित्र है ‘कुश्ती’। दो लोग कुश्ती लड़ रहे हैं। बगल में कुछ भद्र पुरुष बैठे दिखाई पड़ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे उनके आगे सिक्के रखे हुए हैं। एक पंडाल सा खड़ा किया गया है। चित्र देखते हुए ऐसा लगता है जैसे लड़ने वाले लोगों पर शर्त लगी हो कि कौन जीतेगा। भद्र पुरुषों की मुद्राओं से ऐसा प्रतीत होता है कि वे मानो दांव लगा रहे हों। चित्र वाटरकलर में होने के कारण पृष्ठभूमि नहीं है।

सेवक राम द्वारा चित्रित दुर्गा पूजा

वहीँ ‘दुर्गापूजा’ का चित्र बेहद आकर्षक बन पड़ा है। अभ्रक पर पिगमेंट में बने इस चित्र में दुर्गापूजा के दौरान बनी मूर्ति को लिए जनसमूह नदी के किनारे जा रहा है। स्थानीय भाषा में इसे ‘भंसान’  कहा जाता है। मूर्ति बड़ी बनी है और जैसा कि इस मौके पर बनने वाली मूर्तियों में होता है उसके छोटे-छोटे ब्यौरे तक उभर कर आए हैं। चित्र का एक प्रमुख हिस्सा है लोगों की उपस्थिति। भीड़  में हर किस्म के लोग नजर आ रहे हैं। उनकी वेशभूषा से इनके सामाजिक अवस्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस चित्र में पुराने वस्त्रों और उनके पहनने के तरीकों को देखा जा सकता है। आज वे वस्त्र भले न दिखाई देते हों पर हमारी पारंपरिक वेशभूषा जैसी थी इसे भी इस चित्र में देखा जा सकता है।

दुर्गापूजा पटना का एक प्रमुख पर्व है जिसमें बढ़-चढ़ कर आमलोग भाग लेते हैं। यह चित्र इस बात के तस्दीक करता है कि ऐसा काफी समय से चला आ रहा है। इस चित्र को ‘चैती पूजा’ पर बने चित्र में देखने पर एक समय दिखाई देता है खासकर समूह की मौजूदगी में। ‘चैती पूजा’ में हाथी,  घोड़ा, पालकी है, उस पर बैठे लोग हैं। सभी हवाई करतब दिखाते बच्चे को देखने में तल्लीन से हैं। एक व्यक्ति खाने के समान बेचता दिख रहा है। साथ ही अंग्रेज सिपाही अपनी लाल वर्दी पहने दिखाई दे रहे हैं। कोई अपने घुटने तक धोती बांधे है तो वहीं रईस लोगों को उनके अचकन, पगड़ी आदि से पहचाना जा सकता है। सफेद पगड़ी, लाल पगड़ी। रईसों को उनकी सवारी यानी हाथी के सजे हौदे और घोड़े से भी पहचाना जा सकता है।

‘शादी का समारोह’ शीर्षक चित्र  में पुरानी रीति रिवाजों के हल्के संकेत मिलते हैं। दुल्हा-दुल्हन के साथ विवाह का राग- रंग इसमें महसूसा जा सकता है। रंग- बिरंगे वस्त्रों में महिलाएं, पुरुष, बाजा-गाजा वाले,  ढोल तमाशा वाले,  मटका, दौरी  के साथ सबको देखा जा सकता है। सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला है माथे पर रखकर आगे ले चलते हुए दो डिजायनदार बतख । इसे दो कहार माथे पर रखकर ले चल रहे हैं। इस चित्र का कंपोजिशन देखने लायक है। चित्र वाटर कलर में बना हुआ है।

अभ्रक पर पिगमेंट में ‘जगन्नाथ यात्रा’,  और वाटर कलर में ‘नाई’ का चित्र भी दर्शनीय है। नाई किसी रईस के अगर जाकर उसके बालों पर उस्तरा लगाते दिख रहा है। उसकी रईसी का अंदाजा बगल में उसके हुक्का, ऐनक और कपड़े से हो जाता है। नाई की अपनी सामग्री कैंची, बैग आदि बगल में है। चित्र में  एक खास मोमेंट को पकड़ा गया है यानी दाढ़ी बनाने की प्रक्रिया के बीच चित्र बनाया गया है।

प्रदर्शनी में शबीह चित्र भी खासी संख्या है। हाथीदांत पर पिगमेंट से बने कई चित्र हैं जिनमें प्रमुख है ‘रानी लक्ष्मीबाई’, ‘नवाब’,  ‘लॉर्ड लिट्टन बंगाल के राज्यपाल’,  ‘एक यूरोपीय महिला’ , ‘यूरोपीय पुरुष’ ।

भारतीय महिला का चित्र वाटर कलर और अभ्रक पर पिगमेंट में है। ये शबीह चित्र ज्यादातर पटना संग्रहालय के अपने संग्रह का है जबकि कुछ संजय लाल के हैं। पोट्रेट में एक बात नोटिस करने लायक यह है कि हाथीदांत पर पिगमेंट अमीर, ताकतवर और महत्वपूर्ण लोगों के बने हैं। हाथीदांत पर पिगमेंट से चित्र  बनाना आसान नहीं होता। लिहाजा इसमें ज्यादातर समाज के एलीट कहे जाने वालों के चित्र हैं। सामान्य लोगों के लिए कागज पर वाटरकलर माध्यम से बने चित्र हैं I पटना कलम के पोर्ट्रेट यानी व्यक्ति चित्रों में तीखी नाक और भारी भौंहें दिखाई पड़ती है। स्पष्ट है कि पटना कलम शैली के चित्रकार व्यक्ति चित्रों अर्थात प्रोट्रेट बनाने में भी कुशल थे।

19 वीं सदी के उतरार्द्ध तक आते-आते पटना कलम शैली चित्रकला राज्याश्रय और राजदरबारों से निकलकर आम जनता के बीच भी लोकप्रिय हो चुकी थी।  यह प्रदर्शनी हमें इस बात से अवगत कराती है।

     ( तीसरा भाग – ‘जीवन की विविध छवियां सामने लाता पटना कलम’ )

-अनीश अंकुर

One Reply to “मुगल मिनिएचर्स और यूरोपियन रियलिज्म दोनों से अलग है पटना कलम”

  1. अनीश भाई पटना कलम पर यह लेख अत्यंत सराहनीय और प्रभावशाली है। आपने इस चित्रकला शैली को सरल, सहज और आकर्षक भाषा में प्रस्तुत किया है, जिससे यह विषय आम पाठकों के लिए भी बोधगम्य बन जाता है।
    आपकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जटिल कला-इतिहास को बिना बोझिल बनाए स्पष्ट कर देते हैं। मुगल मिनिएचर्स और पटना कलम के बीच के अंतर को उन्होंने बहुत संतुलित और सटीक ढंग से समझाया है। यह तुलना न केवल जानकारी देती है, बल्कि पाठक की समझ को भी गहरा करती है।
    आपने ने पटना कलम को “आम जीवन की कला” के रूप में जिस संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है, वह विशेष उल्लेखनीय है। आपके लेखन में यह स्पष्ट झलकता है कि वे कला को केवल सौंदर्य के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में भी देखते हैं। ‘अंत्येष्टि चिता’, ‘मुहर्रम’, ‘छठ’ जैसे उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने चित्रों को जीवंत बना दिया है।
    आपकी भाषा में एक सहज प्रवाह है, जो पाठक को अंत तक जोड़े रखता है। साथ ही, तकनीकी पहलुओं—जैसे कजली स्याही और यूरोपीय प्रभाव—को भी उन्होंने सरलता से समझाया है।
    कुल मिलाकर, यह लेख आपकी गहरी समझ, संवेदनशील दृष्टि और प्रभावी अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो पटना कलम की महत्ता को सुंदर ढंग से स्थापित करता है।
    🙏🏼❤

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