भारतीय कला इतिहास में बंगाल का पुनर्जागरण एक विशेषअध्याय है I दरअसल भारतीय कला इतिहास का यह एक ऐसा महत्वपूर्ण मोड़ था, जहाँ अवनींद्रनाथ ठाकुर, नंदलाल बोस जैसे कलाकारों ने पश्चिमी प्रभाव से हटकर भारतीय परंपरा, अजंता, मुगल और जापानी कला से प्रेरित एक नयी राष्ट्रीय शैली गढ़ी। इस आंदोलन ने कला को स्वतंत्रता संग्राम की चेतना से जोड़ा। दूसरी ओर, इसका विस्तार जब देश के अन्य हिस्सों में हुआ तब लखनऊ की वाश शैली ने पारंपरिक लघुचित्रण में नयी तकनीकी कोमलता और रंगों की पारदर्शिता विकसित की। यहाँ के कलाकारों ने नज़ाकत, नफ़ासत और सूक्ष्म रंग-लेप से चित्रों को जीवंत बनाया। इस प्रकार बंगाल का पुनर्जागरण और लखनऊ की वाश शैली, दोनों ने भारतीय कला को आधुनिक और स्वदेशी पहचान दी। किन्तु बीसवीं सदी के उत्तरार्ध आते-आते इस शैली को बीता हुआ इतिहास मान लिया गया I जिसका परिणाम यह सामने आया कि उस दौर की युवा पीढ़ी ने वाश शैली को छोड़कर, अपननी कृतियों की रचना के लिए अन्य मध्यम और शैलियों को अपना लिया I किन्तु उस दौर में भी राजेंद्र प्रसाद जैसे गिनती के युवाओं ने अपने आधुनिक शैली के चित्रों की रचना में वाशशैली की प्राथमिकता न केवल बरक़रार रखी, बतौर कलागुरु अपने शिष्यों को भी इस शैली में दीक्षित करना जारी रखा I कलागुरु राजेंद्र प्रसाद की इस अनवरत साधना से उपजी कला को व्याख्यायित कर रहे हैं, उनके छात्र रहे कलाकार /कल समीक्षक भूपेन्द्र कुमार अस्थाना आलेखन डॉट इन के पाठकों के लिए I –संपादक
भूपेन्द्र कुमार अस्थाना
लखनऊ, 27 सितम्बर 2025 – भारतीय चित्रकला में वॉश परंपरा एक सूक्ष्म और पारभासी शैली के रूप में प्रतिष्ठित हुई है, जिसमें पतली रंग-परतों के माध्यम से प्रकाश, गहराई और भावनाओं का अनूठा संप्रेषण किया जाता है। इसकी जड़ें मुग़लकालीन चित्रकला में हैं, जहाँ प्राकृतिक दृश्यों और शाही जीवन के सूक्ष्म चित्रण में इसका विशेष उपयोग हुआ। औपनिवेशिक दौर और आधुनिक युग में यह शैली और परिष्कृत हुई, जिससे ग्रामीण जीवन, लोकसंस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण संभव हुआ।
शनिवार को नगर स्थित कोकोरो आर्ट गैलरी में वॉश शैली के वरिष्ठ चित्रकार राजेंद्र प्रसाद की एकल प्रदर्शनी “लौकिक – अलौकिक” का उद्घाटन किया गया। इस प्रदर्शनी का शुभारंभ रंगमंच, टेलीविजन एवं फिल्म जगत के वरिष्ठ अभिनेता अनिल रस्तोगी ने किया। प्रदर्शनी का क्यूरेशन वंदना सहगल ने किया है। अवसर पर बड़ी संख्या में कलाकार, कला-प्रेमी और छात्र उपस्थित रहे।
दीर्घा का एक दृश्य
क्यूरेटर वंदना सहगल ने बताया कि भारतीय चित्रकला में वॉश तकनीक ने अपनी सूक्ष्मता, पारदर्शिता और भावों की गहराई के कारण विशिष्ट स्थान बनाया है। यह तकनीक टेम्परा और इंक एंड वॉश का अद्भुत संयोजन है, जिसकी उत्पत्ति प्राचीन एशियाई स्याही-चित्र परंपराओं से हुई। चीन और जापान की चित्रकला में बड़े ब्रश और पानी की सहायता से रंगों की हल्की, कोमल और बहुरंगी परतें बनती थीं, जिनसे चित्रों में जीवन्तता और सूक्ष्मता का सुंदर संतुलन आता था।
भारत में 1912 के आसपास अवनीन्द्रनाथ टैगोर, नंदलाल बोस और असित कुमार हलधर सहित अनेक कलाकारों ने इस तकनीक को प्रस्तुत किया। उन्होंने इसे अजंता के भित्तिचित्रों और बंगाल स्कूल की संवेदनाओं के साथ जोड़कर इसे नया आयाम प्रदान किया। इसके बाद लखनऊ कला एवं शिल्प महाविद्यालय इस शैली का प्रमुख केंद्र बना, जिसने वॉश को भारतीय कला में समृद्ध और प्रतिष्ठित किया। इसी परंपरा को बी.एन. आर्य ने अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया और वैश्विक कला परिदृश्य में प्रतिष्ठा दिलाई। आगे चलकर अनेक कलाकारों ने इसे अपनी दृष्टियों और प्रयोगों से और विकसित किया।
वॉश तकनीक की प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म और जटिल है। इसमें चित्र पर जलरंग की पारदर्शी परत चढ़ाकर उसे पानी में डुबोया जाता है, जिससे रंग आंशिक रूप से धुल जाते हैं। इसके बाद एक नई परत डाली जाती है। यह क्रम कई बार दोहराया जाता है। परत-दर-परत रंगों के मेल से चित्रों में स्वप्निल, बहुरंगी और कालातीत वातावरण बनता है। इसी तकनीकी सूक्ष्मता के कारण वॉश चित्र केवल देखने योग्य नहीं, बल्कि अनुभव करने योग्य हो जाते हैं।
इस परंपरा के वर्तमान समय के सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि राजेंद्र प्रसाद हैं। उनकी पेंटिंग्स में धुले-फीके रंगों से झलकती सूक्ष्म रोशनी चित्रों को अद्वितीय गहराई और भावप्रवणता देती है। उनकी विषयवस्तु प्रायः ग्रामीण जीवन और भारतीय लोकजीवन की सहज झलकियों से प्रेरित होती है। किसी महिला का बाल संवारना, सूर्योदय को प्रणाम करना, शरीर पर टैटू गुदवाना या मछुआरों का जाल फेंकना—इन दृश्यावलियों में यथार्थ और भावनात्मक गहनता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। ये चित्र न केवल रोज़मर्रा की गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि जीवन की संवेदनाओं, समय के प्रवाह और मानवीय अनुभवों को भी गहराई से उभारते हैं।
उनकी कला का दूसरा आयाम अध्यात्म और प्रतीकवाद है। कृष्ण-राधा के प्रेम प्रसंगों में रंगों का धुंधलका और कोमल प्रभाव रोमांटिक और अलौकिक भावनाओं को उजागर करता है। वहीं बुद्ध संबंधी चित्रों में आत्मनिरीक्षण, ध्यान, शांति और मोक्ष की गहन अनुभूति होती है। भिक्षापात्र, भगवा वस्त्र, कमल और बोधिवृक्ष जैसे प्रतीक उनके चित्रों में बार-बार प्रकट होते हैं और उनमें दार्शनिक तथा आध्यात्मिक गहराई जोड़ते हैं। ये प्रतीक न केवल चित्रों की दृश्य सुंदरता को बढ़ाते हैं, बल्कि दर्शक को अर्थ और दर्शन के गहरे आयाम में ले जाते हैं।
भारतीय वॉश तकनीक का सफर 1912 से लेकर आज तक अनेक कलाकारों के योगदान से समृद्ध हुआ है। यह तकनीक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि समकालीन कलाकारों के लिए भी निरंतर प्रेरणा का स्रोत रही है। चित्रकार राजेंद्र प्रसाद ने इस परंपरा को नई संवेदनशीलता, गहराई और सौंदर्य के साथ पुनर्संयोजित किया है। उनके चित्रों में लौकिक जीवन की सहजता और अलौकिक आध्यात्मिक गहराई का अद्भुत संगम दृष्टिगत होता है। उनकी कला दर्शक को केवल देखने का अनुभव नहीं कराती, बल्कि एक आत्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक संवाद में ले जाती है। यही कारण है कि उन्हें समकालीन भारतीय वॉश शैली का सबसे प्रभावशाली और प्रामाणिक प्रतिनिधि माना जाता है।
प्रदर्शनी के कोऑर्डिनेटर भूपेंद्र अस्थाना ने बताया कि राजेंद्र प्रसाद (जन्म 1958, उत्तर प्रदेश) वरिष्ठ समकालीन चित्रकार, कला शिक्षक और संरक्षण विशेषज्ञ हैं, जिन्हें विशेष रूप से वॉश तकनीक में निपुणता के लिए जाना जाता है। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स से शिक्षा प्राप्त की और 1996 में क्रिएटिव पेंटिंग में मास्टर ऑफ फाइन आर्ट्स प्रथम श्रेणी में अर्जित किया। उन्होंने मुंबई, नई दिल्ली और बेंगलुरु जैसी प्रमुख गैलरियों में व्यक्तिगत प्रदर्शनियाँ की हैं और लंदन, रोम सहित राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय समूह प्रदर्शनियों में भाग लिया है। उनके कार्य ललित कला अकादमी, नई दिल्ली; उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी; रामकथा संग्रहालय, अयोध्या; तथा अनेक विश्वविद्यालयों और निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं। उन्होंने INTACH के साथ कई हेरिटेज पेंटिंग्स और महत्वपूर्ण चित्रों का संरक्षण भी किया है। डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ में फाइन आर्ट्स विभाग के प्रमुख और एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवा देने के बाद वे कला और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ चुके हैं।
इस प्रदर्शनी में उनकी 15 कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। उद्घाटन अवसर पर नवनीत सहगल, अवधेश मिश्रा, मामून नोमानी, राकेश चंद्रा, सुशील कन्नौजिया, राजेंद्र मिश्रा, रत्नप्रिया, रविकांत पांडेय और आलोक कुमार सहित बड़ी संख्या में कला-जगत से जुड़े लोग उपस्थित रहे। प्रदर्शनी 8 अक्टूबर 2025 तक अवलोकनार्थ खुली रहेगी।