नयी दिल्ली, 17 सितम्बर I कल्पना कीजिए कि आप किसी कला दीर्घा में प्रदर्शित कलाकृतियों को निहारने में मगन हों और अचानक वहां बाघ आ जाये ? जाहिर है यह दृश्य किसी के लिए भी चौंकाने से ज्यादा डराने वाला होगा I वैसे ऐसा ही कुछ साकार होने जा रहा है नयी दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटैट सेंटर स्थित “ओपन पाम कोर्ट गैलरी” में I जहाँ चित्रकार कान्हा बेहरा की एकल प्रदर्शनी का आयोजन दिनांक 19 से 25 सितम्बर तक के लिए होने जा रहा है I इस प्रदर्शनी का शीर्षक है ‘Thy Fearful Symmetry’I और प्रदर्शनी के क्यूरेटर हैं ख्यात कला इतिहासकार और समीक्षक जोनी एम.एल. I कान्हा इन दिनों दिल्ली में निवास कर रहे हैं किन्तु वे मूलतः ओडिशा के गंजाम ज़िले के निवासी हैं I बेहरा अपने क्षेत्र की एक अनुष्ठानिक कला शैली ‘बाघा नाच’ (जिसे बाघा नटा भी कहा जाता है) के प्रति स्कूली दिनों में ही आकृष्ट हुए I इस प्रदर्शनात्मक अनुष्ठान में भक्त बाघ का वेश धारण करते हैं और असली बाघों की तरह नाचते हुए गाँव के चारों ओर घूमते हैं। इस प्रक्रिया में कलाकार एक तरह की तंद्रा (ट्रांस) में चले जाते हैं और इस दौरान समाज में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा पर कहर बरपाने से उन्हें रोकना बहुत कठिन होता है।

अंततः यह नृत्य अनुष्ठान गाँव के देवस्थान में स्थित देवी के चरणों पर आकर पूर्ण होता है। कान्हा बेहरा ने अपने हाईस्कूल के दिनों में बाघ नर्तक के रूप में भाग लिया और इस दौरान उनकी ऊर्जा इतनी प्रबल हो जाती थी कि उनके उन्मुक्त नृत्य को नियंत्रित करने के लिए कई लोगों की आवश्यकता पड़ती थी। ऐसे ही एक दिन, बेहरा बाघ के वेश में जंगल की ओर दौड़ गए और कई दिनों तक लोगों की दृष्टि से ओझल रहे। बाद में लोगों ने उन्हें मंदिर के प्रांगण में तंद्रा की अवस्था में पाया। भक्तों, परिवारजनों और मित्रों के विनयपूर्ण निवेदन से उन्हें चेतना में वापस लाया गया। तभी बेहरा ने यह संकल्प लिया कि जीवन में वे कुछ भी करें, बाघ की आत्मा को कभी नहीं त्यागेंगे।
ओडिशा के खल्लिकोट फाइन आर्ट्स कॉलेज से चित्रकला में स्नातक करने के बाद, बेहरा ने चित्रकला में स्नातकोत्तर के लिए खैरागढ़ विश्वविद्यालय का रुख किया। सन् 2018 में वह दिल्ली आए और तब से लगातार चित्र रचना कर रहे हैं तथा सौंदर्यशास्त्र और बाज़ार—दोनों ही स्तरों पर उन्होंने कम समय में अच्छी सफलता प्राप्त की है। बाघ नृत्य बेहरा के लिए एक सौंदर्यात्मक रूपक है। वहीँ बाघ नृत्य और नर्तक उनकी कलाकृतियों की प्रमुख पृष्ठभूमि का निर्माण करते हैं।

उनके चित्रों के अग्रभाग में अन्य सांसारिक गतिविधियों का अंकन रहता है। क्यूरेटर जोनी एम.एल. के अनुसार, यह कलाकार के अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने और उसे दर्शाने का एक तरीका है। ये जड़ें उन व्यापक जनसमुदायों को भी जोड़ने का कार्य करती हैं, जो समान अनुष्ठानिक परंपराओं की आत्मा से जुड़े हुए हैं। “बाघ नृत्य का उद्गम शिकार की आरंभिक स्मृतियों से हुआ है। बाघ वर्जनाओं से जुड़े रहे और विभिन्न सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के द्वारा पवित्र प्राणी बन गए।”
वास्तविक शिकार की रक्तरंजित हिंसा यहाँ रूपांतरित होकर अनुष्ठानिक प्रदर्शन का रूप ले लेती है। “वे न केवल सौंदर्यशास्त्र के विकास को बल्कि शिकारी जनजातियों के इतिहास और उनके धीरे-धीरे कृषक जीवन में बसने की प्रक्रिया को भी मूर्त रूप देते हैं,” ऐसा कहना है जोनी एम.एल. का। बेहरा को अपने पिछले कुछ वर्षों में रचित दृश्यात्मक सौंदर्यशास्त्र पर गहरा विश्वास है।

बेहरा की मानवाकृति प्रधान छवियाँ इस बात पर बल देती हैं कि मनुष्यों को अन्य जीवन रूपों, जिनमें पशु भी शामिल हैं, के साथ सह-अस्तित्व में रहना चाहिए। इस तरह से अपनी कलाकृतियों के माध्यम से बेहरा प्राचीन संस्कृतियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता-उन्मुख नई शहरी समाजों के बीच सेतु का निर्माण करते हैं। उनकी चित्रकृतियाँ आधुनिक मानवों की सामूहिक सांस्कृतिक चेतना के स्मारक बन जाती हैं। बेहरा अपनी सृजनात्मकता को प्रिंटमेकिंग (छापा चित्रण) तक भी विस्तृत करते हैं। प्रिंटमेकिंग में उनका प्रिय माध्यम वुडकट है, किन्तु उन्होंने एचिंग प्रिंट (अम्लांकन प्रक्रिया से छापा चित्र) भी बनाए हैं। उनकी इस रचनात्मक दुनिया में बाघ केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। उन्होंने ओडिशा में पारंपरिक बाघ नृत्य प्रदर्शनों का विस्तृत छायांकन और वीडियो दस्तावेजीकरण भी किया है; जिसका एक हिस्सा इस एकल प्रदर्शनी में भी प्रदर्शित किया जायेगा I प्रदर्शनी के हिस्से के रूप में, ओडिशा के प्रामाणिक नर्तकों द्वारा पारंपरिक बाघा नाच/टाइगर डांस का प्रदर्शन होगा, जिसमें गाँव के वाद्ययंत्र वादक भी साथ होंगे। डॉ. दिलीप त्रिपाठी, जिन्होंने बाघ नृत्य पर शोध किया है, एक सत्र में इस पारंपरिक कला रूप के इतिहास पर वक्तव्य देंगे। प्रदर्शनी के अंतिम दिन बेहरा और क्यूरेटर के बीच एक संवाद होगा।
नोट: “Thy Fearful Symmetry” शीर्षक विलियम ब्लेक की कविता “The Tyger” से लिया गया है, जहाँ बाघ की विस्मयकारी और भयावह सुंदरता को दिव्यता से जोड़ा गया है। कन्हा बेहरा की कला में यह अर्थ ओडिशा के बाघ नाच से पुनर्जीवित होता है, जिसमें मनुष्य बाघ का रूप लेकर नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करता है। यहाँ यह सममिति केवल शरीर की नहीं, बल्कि मनुष्य–पशु, भय–सौंदर्य और परंपरा–आधुनिकता के बीच संतुलन है। बेहरा की चित्रकला और प्रदर्शन इस संतुलन को मूर्त करते हुए प्राचीन लोक संस्कृति और समकालीन वैश्विक कला जगत के बीच एक सेतु का कार्य करती है। –संपादक
