दिल्ली में नेपाल के “मंडला की गूँज”

आप सभी समारोह में सादर आमंत्रित हैं। नेपाल कला परिषद द्वारा प्रस्तुत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली की दूसरी मंजिल स्थित कमलादेवी चट्टोपाध्याय ब्लॉक की गैलरी में आयोजित नेपाली कलाकारों की विशिष्ट कला प्रदर्शनी “मंडला की गूँज” केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत और नेपाल की साझा आध्यात्मिक विरासत का सजीव उत्सव है। यह प्रदर्शनी पूर्वीय संस्कृति में मंडल की गहन अवधारणा को केंद्र में रखकर विविध कलात्मक अभिव्यक्तियों के माध्यम से एक व्यापक सांस्कृतिक संवाद प्रस्तुत करती है।

‘मंडल’ संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है—वृत्त, चक्र अथवा पूर्णता। यह सृष्टि की एकता, संतुलन और समग्रता का प्रतीक है। भारतीय और नेपाली आध्यात्मिक परंपराओं में मंडल केवल एक ज्यामितीय आकृति नहीं, बल्कि ध्यान, साधना और आत्मबोध का माध्यम रहा है। मंदिरों, स्तूपों, यंत्रों और प्राचीन ग्रंथों में इसकी उपस्थिति ब्रह्मांडीय संरचना तथा जीवन के चिरंतन चक्र का बोध कराती है।

प्रमुख अतिथि माननीय डॉ. कर्ण सिंह, विशिष्ट अतिथि महामहिम डॉ. शंकर प्रसाद शर्मा (नेपाल दूतावास), राजदूत श्याम शरण, अध्यक्ष आईआईसी, महामहिम मुनु महावर, अतिरिक्त सचिव (उत्तर), विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, तथा नेपाल कला परिषद के अध्यक्ष सागर शमशेर राणा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

परिषद के अध्यक्ष सागर शमशेर राणा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी नेपाल की समृद्ध कला एवं सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करने के लिए एक सजीव मंच प्रदान करती है तथा नेपाल और भारत के मध्य प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं के आदान-प्रदान के लिए अनुकूल वातावरण का सृजन करती है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आयात-कर तथा अन्य व्यवस्थागत जटिलताओं से संबंधित विधिक बाधाएँ संपूर्ण प्रक्रिया को कठिन बना देती हैं। अतः उन्होंने संबंधित प्राधिकारियों से इन प्रक्रियाओं को सरल बनाने का आग्रह किया, ताकि इस प्रकार की प्रदर्शनियाँ पारस्परिक हित में निर्बाध रूप से निरंतर आयोजित होती रहें।

प्रदर्शनी में सैंतीस कलाकारों की अठहत्तर कृतियाँ सम्मिलित हैं, जो नेपाल और भारत की प्राचीन सभ्यताओं के मध्य अविच्छिन्न संबंध को सशक्त रूप में अभिव्यक्त करती हैं। इन कलाकृतियों में साझा इतिहास, पौराणिक परंपराओं और आध्यात्मिक वंशपरंपराओं की अनुगूँज स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। नेपाली पौभा चित्रकला की सूक्ष्म रेखांकन परंपरा, भारतीय रंगोली और यंत्रों की ज्यामितीय संरचनाएँ, मिथिला के अरिपन की सांस्कृतिक छवियाँ तथा बौद्ध मंडलों की आध्यात्मिक प्रतीकात्मकता—इन सभी का सामंजस्य इस प्रदर्शनी को विशिष्ट आयाम प्रदान करता है।

डॉ. कर्ण सिंह ने अपने संबोधन में भारत–नेपाल संबंधों की आत्मीयता को अत्यंत मार्मिक शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा, “मैं नेपाल का दामाद हूँ।” इस संक्षिप्त किन्तु भावपूर्ण वक्तव्य के माध्यम से उन्होंने दोनों देशों के मध्य विद्यमान पारिवारिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक निकटता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल का संबंध मात्र दो राष्ट्रों के बीच का राजनयिक या राजनीतिक संबंध नहीं है, बल्कि यह जन-जन के हृदयों को जोड़ने वाला जीवंत और आत्मीय बंधन है।

प्रदर्शनी की क्यूरेटर स्वस्ति राजभंडारी कायस्थ ने कहा कि साझा सांस्कृतिक विरासत की समानताएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं। नेपाल और भारत आज भी गहन सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों से परस्पर जुड़े हुए हैं, जैसे समान भाषाएँ, उत्सवधर्मी पर्व-परंपराएँ तथा परस्पर गुंथी हुई जीवन-परंपराएँ। साथ ही वे समकालीन सामाजिक विषयों, विशेषतः पर्यावरणीय चुनौतियों, के संदर्भ में भी संयुक्त रूप से विचार एवं प्रयासरत हैं। प्रदर्शित कलाकृतियाँ इन्हीं विचार-प्रक्रियाओं का सजीव प्रतिबिंब प्रस्तुत करती हैं।

“चिन्तामणि लोकेश्वर सैंड मंडल, 2026” में करुणामय स्वरूप चिन्तामणि लोकेश्वर विराजमान हैं, जो बोधिसत्त्व अवलोकितेश्वर के करुणा-प्रकाशित रूप तथा अनंत दया के प्रतीक माने जाते हैं। उनके चारों ओर अष्टमंगल के आठ शुभ प्रतीक, सहचर देवताएँ तथा ज्ञान और करुणा का बोध कराने वाले विविध अलंकरण अंकित हैं। कमल की निर्मलता तथा उनके करकमलों में धारण किया गया कामनापूर्ति करने वाला ‘रत्न मणि’ आध्यात्मिक अभिलाषाओं की पूर्ति और दुःखों के निवारण का प्रतीक है। इस मंडल की संकल्पना कलाकार प्रचण्ड शाक्य और उजय बज्राचार्य के साथ स्थानीय कला प्रतिष्ठानों के विद्यार्थियों ने मिलकर साकार की है।

काठमांडू घाटी की नेवार बौद्ध कला परंपरा में यह सूक्ष्म एवं जटिल रचना ध्यान और अनुष्ठान का एक पवित्र मानचित्र मानी जाती है। साधक इसकी परतों का मनोमय चिंतन करते हुए पुण्य संचय करते हैं, करुणा को गहन बनाते हैं और आत्मबोध की ओर अग्रसर होते हैं—मानो किसी दैवीय रूपरेखा के पथ पर चलकर अपने अंतर्निहित प्रकाश और संभावनाओं का जागरण कर रहे हों।

समग्र रूप से यह प्रदर्शनी एक बहुस्तरीय सांस्कृतिक ताना-बाना रचती है, जो परंपरा की स्थायी उपस्थिति और समकालीन कला की सृजनात्मक ऊर्जा के मध्य सेतु का कार्य करती है। यह केवल दृश्य अनुभव नहीं, बल्कि एक मननशील यात्रा है, जो दर्शकों को विरासत और आधुनिकता के मध्य प्रवाही सीमाओं पर पुनर्विचार करने तथा साझा सांस्कृतिक स्मृतियों की अनवरत प्रेरणा को पहचानने के लिए आमंत्रित करती है।

इस प्रकार “मंडला की गूँज” एक विचार बनकर उभरती है, जो भारत और नेपाल से आरंभ होकर संपूर्ण विश्व को एक सूत्र में बाँधने का संदेश देती है। जैसे वृत्त का कोई अंत नहीं होता, वैसे ही मानवता और समन्वय की भावना भी अनंत है। जब यह चेतना जागृत होती है, तब मंडल की गूँज सचमुच विश्वव्यापी हो जाती है। “मंडला की गूँज” निश्चित रूप से आगंतुकों को रोमांचित करेगी। यह प्रदर्शनी 22 फरवरी तक जारी रहेगी। अवश्य अवलोकन करें।

एस.सी. सुमन

sdaskayastha@gmail.com

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