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मुखौटे: पवित्र प्रतीक, अनुष्ठानिक सामग्री और रंगमंचीय यात्राएँ
क्यूरेटोरियल नोट : प्राचीन समय से ही मुखौटे स्वयं और दूसरों के बीच, साथ ही मानव और देवताओं के बीच की सीमाओं को पार करते आए हैं। मास्क चेहरा छिपाने का माध्यम नहीं, बल्कि इंद्रियों के ज़रिए अदृश्य दुनिया को सामने लाने का एक तरीका हैं — चाहे वे धार्मिक हों, रीतियों से जुड़े हों या प्रदर्शनीय हों।
यह प्रदर्शनी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा पेश की गई है और इसमें समकालीन भारतीय कलाकारों का योगदान शामिल है। इसमें ग्लोबल साउथ — यानी अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका से आए विविध प्रकार के मुखौटों को भी शामिल किया गया है। ये क्षेत्र ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के स्रोत रहे हैं, जहाँ मुखौटों का उपयोग शमन परंपराओं, पौराणिक कथाओं और धार्मिक उत्सवों जैसे अनुष्ठानों में किया जाता रहा है।
यह मुखौटे अनोखे और हस्तनिर्मित होने के कारण सिर्फ सुंदर ही नहीं हैं बल्कि अपने पूर्वजों से जुड़ी भावनात्मक एवं गहरे सांस्कृतिक प्रतीकों को भी अपने भीतर समेटे हुए हैं। ये ग्लोबल साउथ की विशिष्ट संस्कृतियों और परंपराओं को दर्शाते हैं तथा अतीत व वर्तमान के बीच एक सेतु का काम करते हैं।

कहा गया है “हर चेहरे पे मुखौटा है, हकीकत कोई नहीं जानता।” बहरहाल यह तो हुयी कविता की भाषा में मुखौटे पर तंज I लेकिन सच तो यह है कि इन्सान ने हजारों साल पहले से मुखौटे बनाने से लेकर इसके उपयोग की शुरुआत कर दी थी I इतिहास के पन्ने हमें बताते है कि मुखौटों का इतिहास बेहद पुराना और बहुआयामी है, अलबत्ता यह मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ बदलता और विकसित होता रहा है। इनका प्रयोग अलग-अलग संस्कृतियों में रक्षा, अनुष्ठान, कला, पहचान और शक्ति के प्रतीक के रूप में हुआ है। पुरातत्वविदों को पत्थर, हड्डी और लकड़ी से बने ऐसे मुखौटे मिले हैं, जिनकी उम्र लगभग 9,000 साल मानी जाती है (जैसे इज़राइल में पाए गए नवपाषाण मुखौटे)। मान्यता है कि शुरुआती मुखौटे आत्माओं, पूर्वजों या जानवरों की नकल करने के लिए पहने जाते थे। यह भी माना जाता है कि मुखौटा पहनकर व्यक्ति उस आत्मा या प्राणी की शक्ति और गुणों को धारण कर लेता है। वहीँ शिकार और युद्ध में कभी-कभी जानवर के चेहरे जैसे मुखौटे पहने जाते थे, ताकि शिकार को भ्रमित किया जा सके या डराया जा सके।
बिहार म्यूजियम, पटना में इन दिनों “बिहार म्यूजियम बिनाले-2025” का आयोजन किया गया है I जिसका उद्घाटन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा 7 अगस्त को किया गया I विदित हो कि म्यूजियम बिनाले की यह अवधारणा और इसके क्रियान्वयन की शुरुआत 2021 में की गयी थी I किन्तु दुनिया भर में उस दौरान कोविड जैसी महामारी का आतंक छाया हुआ था I ऐसे में यह आयोजन आभासी स्वरुप में ही हो पाया था I किन्तु उसके बाद 2023 में इसका आयोजन हुआ और 2025 में आयोजित यह द्विवार्षिकी, इस कड़ी का तीसरा आयोजन है I इस बार के बिनाले (द्विवार्षिकी) का विषय है “वैश्विक दक्षिण : साझा इतिहास ” I इसके तहत आयोजित विभिन्न प्रदर्शनियों में एक प्रदर्शनी का शीर्षक है “आध्यात्मिक दिव्य मुखौटे, अनुष्ठानिक सामग्री और रंगमंचीय यात्रा” I ऐसे में जैसा कि नाम से ही जाहिर है यहाँ प्रदर्शित मुखौटे ग्लोबल साउथ में शामिल देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं I

ग्लोबल साउथ यानी एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ओशिनिया के कई देशों में मुखौटों का इतिहास और महत्व बेहद गहरा है, और यह पश्चिमी दुनिया के “मुखौटा: सिर्फ नाटक या कार्निवाल” वाली अवधारणा से बिल्कुल अलग है। क्योंकि यहाँ मुखौटे अक्सर जीवित परंपरा का हिस्सा होते हैं, न कि सिर्फ संग्रहालय की वस्तु। इसीलिए ग्लोबल साउथ में प्रचलित मुखौटे विशेष अनुष्ठानिक और आध्यात्मिक महत्व रखते हैं I देखा गया है कि यहाँ के कई समुदायों में मुखौटे अब भी धार्मिक या सामुदायिक रस्मों का हिस्सा हैं — इनका उद्देश्य देवताओं, पूर्वजों या आत्माओं से संवाद करना है। साथ ही ये मुखौटे उस समाज, समुदाय या क्षेत्र विशेष के सामुदायिक स्मृति और पहचान को भी उजागर करते हैं I जाहिर है ऐसे में ये मुखौटे सिर्फ कला नहीं, बल्कि “हम कौन हैं” का सांस्कृतिक बयान भी होते हैं और इस तरह से ये इतिहास, मिथक, और लोककथाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी ज़िंदा रखते हैं। इन मुखौटों के लिए अक्सर प्राकृतिक रंगों (गेरुआ, कोयला, पौधों के रंग) और प्रतीकों का प्रयोग होता है, जो स्थानीय मान्यताओं से जुड़े होते हैं। इतना ही नहीं अधिकांश मामलों में ये मुखौटे अपने क्षेत्र की सतत हस्तकला परंपरा के वाहक भी होते हैं I क्योंकि इसका निर्माण लकड़ी, बांस, मिट्टी, धातु जैसी स्थानीय सामग्रियों की मदद से हाथ से बनाए जाते हैं, और इसे बनाने वाला कारीगर एक तरह से इस परंपरा का “संरक्षक” होता है।
कुछ क्षेत्रीय उदाहरण की बात करें तो पश्चिम अफ्रीकी देश नाइजीरिया, माली और घाना में अनुष्ठानों, फसल और पूर्वज-पूजन में; मुखौटा पहनने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक दूत माना जाता है। वहीँ लैटिन अमेरिकी देश मेक्सिको, बोलिविया एवं पेरू में शैतान नृत्य जैसे आयोजनों में पूर्व-कोलंबियाई देवताओं और औपनिवेशिक काल के धार्मिक तत्वों के मिश्रण वाले मुखौटे इस्तेमाल किये जाते हैं । दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया यानी भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया जैसे देशों में कथकली, तेय्यम, टोपेंग, बरोंग जैसे धार्मिक नाटक और अनुष्ठान में पात्रों को जीवंत करने के लिए; इस स्थिति में इन्हें देवता की “जीवित मूर्ति” माना जाता है I वहीँ ओशिनिया (पापुआ न्यू गिनी, मेलानेशिया) में युद्ध और दीक्षा संस्कार में मुखौटों का प्रयोग होता है, जो विशिष्ट जनजातीय डिज़ाइन लिए हुए वहां की पौराणिक कथाओं पर आधारित रहते हैं I
वैसे जब हम ग्लोबल साउथ की बात करते हैं तो हमें इन मुखौटों और उपनिवेशवाद का इतिहास उस औपनिवेशिक लूट को भी उजागर करता है, जिसके तहत यूरोपीय उपनिवेशवादी काल में अफ्रीकी और एशियाई मुखौटे बड़े पैमाने पर पश्चिमी संग्रहालयों में ले जाए गए, जहाँ उन्हें महज़ “कलाकृति” के बतौर देखा गया, जबकि अपनी मूल संस्कृति में ये मुखौटे पवित्र और जीवंत प्रतीक के तौर पर व्यवहृत थे। आज देखा जा रहा है कि सांस्कृतिक पुनःअधिग्रहण के तहत इन देशों में कई समुदाय अपने मुखौटा-नृत्यों और अनुष्ठानों को पुनर्जीवित कर रहे हैं, ताकि अपनी सांस्कृतिक पहचान को उजागर रखते हुए अपनी आत्मनिर्भरता की भावना को मजबूती प्रदान कर सकें I वहीँ बतौर राजनीतिक प्रतीक कुछ देशों में मुखौटे आधुनिक विरोध आंदोलनों और स्ट्रीट थिएटर में भी इस्तेमाल होते हैं, जैसे लातिन अमेरिका में कार्निवाल की राजनीतिक पैरोडी के साथ ।
देखा गया है कि मुखौटों की इस परंपरा ने वैश्विक कला और पर्यटन को भी कुछ मामलों में प्रभावित किया है I ऐसे में ग्लोबल साउथ के मुखौटे अब वैश्विक कला-बाज़ार के लिए भी महत्वपूर्ण हो चले हैं किन्तु यहाँ एक विरोधाभास भी दृष्टिगत है I क्योंकि ऐसे में जहाँ इसका सकारात्मक पक्ष इस रूप में सामने आता है कि इससे उस क्षेत्र विशेष की कला और संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान तो मिलता ही है यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण जरिया भी बन जाता है। किन्तु दूसरी तरफ इसका एक नकारात्मक पक्ष भी है, क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में ये मुखौटे अपने मूल सांस्कृतिक संदर्भ से कटकर सिर्फ “सजावटी” वस्तु बनकर रह जाते हैं।

बिहार म्यूजियम बिनाले में प्रदर्शित मुखौटों में सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक मुखौटा है टेराकोटा माध्यम से निर्मित वह मुखौटा जिसका प्राप्ति स्थल है चिरांद I इस स्थल के बारे में जो ज्ञात जानकारी है वह यह कि यह कि बिहार के छपरा शहर से 11 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में डोरीगंज बाजार के निकट स्थित चिरांद सारण जिले का ही नहीं देश का एक महत्वपूर्ण पुरास्थल है। यहाँ घाघरा नदी के किनारे बने स्तूपनुमा भराव को हिंदू, बौद्ध तथा मुस्लिम प्रभाव एवं उतार-चढाव से जोड़कर देखा जाता है। भारत में यह नव पाषाण काल का पहला ज्ञात स्थल है। यहाँ हुए खुदाई से यह पता चला है कि यह स्थान नव-पाषाण काल यानी 2500-1345 ईसा पूर्व तथा ताम्र युग में आबाद था। इस तरह से इस मुखौटे का काल लगभग पहली या दूसरी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। इसे इस क्षेत्र के सबसे प्रारंभिक ज्ञात मुखौटों में से इसे एक माना जाता है। यह मुखौटा टेराकोटा माध्यम से बनी है I इसी वजह से इसे भारत में पाए गए शुरुआती मुखौटों के उदाहरणों में गिना जाता है। इसमें एक मानवीय चेहरा है जिसकी नाक कुछ ज्यादा उभरी हुयी है I विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका उपयोग संभवतः रक्षात्मक या अलौकिक उद्देश्यों वाले अनुष्ठानों में किया जाता था।

इसी प्रदर्शनी के एक कोने में प्रदर्शित है एक आदमकद मुखौटा भी, जो भारत के असम राज्य का एक पारंपरिक मुखौटा है, जिसे स्थानीय भाषा में “मुखा” या “सत्रिया मुखौटा” कहा जाता है। ये मुखौटे असम की वैष्णव संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं, जो यहाँ के माजुली द्वीप के सत्रों (मठों) में प्रचलित है I जहाँ मुखौटा-निर्माण की यह कला सदियों से संरक्षित है। ये मुखौटे हिंदू महाकाव्यों के पौराणिक पात्रों पर आधारित होते हैं और इनका उपयोग “मुखा भाओना” नामक प्रदर्शन में किया जाता है, जो सत्रिया परंपरा के अंतर्गत एक पारंपरिक नाट्य-रूप है। यहाँ प्रदर्शित यह मुखौटा भगवन विष्णु के नरसिंह अवतार से संबंधित है I जानकारी मिलती है कि इन मुखौटों को एक अनोखी तकनीक से बनाया जाता है I जिसके तहत सबसे पहले बांस का ढांचा तैयार किया जाता है, फिर उस पर मिट्टी में भिगोई गयी कपड़े की परतें चढ़ाई जाती हैं, और अंत में मिट्टी व गोबर के मिश्रण का लेप लगाया जाता है I इस वजह से ये मुखौटे अत्यंत हल्के और टिकाऊ बनते हैं। इसको रंगने के लिए पत्तियों, जड़ों और छाल से प्राप्त प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी सत्रिया भक्तों (पुरोहितों) के माध्यम से आगे बढ़ी है। हेम चंद्र गोस्वामी जैसे प्रमुख कलाकारों ने इसके पुनर्जीवन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्पष्ट है कि इस समाज के लिए ये मुखौटे केवल धार्मिक या औपचारिक वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि एक जीवंत धरोहर का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो असम के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराई से जुड़ी है।

यहाँ प्रदर्शित मुखौटों में कुछ ऐसे मुखौटे भी हैं जिन्हें लकड़ी में कार्विंग करके तैयार किया गया है I जाहिर है लकड़ी से बने मुखौटों को देखना हम जैसों के लिए एक विशेष अनुभव था I इससे संबंधित जो विवरण उपलब्ध हैं उसके अनुसार – यह एपा हेलमेट मुखौटा नाइजीरिया के योरूबा समुदाय द्वारा एपा मुखौटा नृत्य में उपयोग किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण अनुष्ठानिक वस्तु है। इन मुखौटों को यहाँ हर वर्ष होने वाले एपा सोसाइटी के उत्सव के दौरान पहना जाता है, जिसका उद्देश्य समुदाय के पूर्वजों को स्मरण करना और उनके उस योगदान का सम्मान करना है, जिसने उनके शहर या गाँव को स्थिर और समृद्ध बनाया। ये विशालकाय मुखौटे अक्सर जटिल ऊपरी संरचनाओं से सुसज्जित होते हैं, जिनमें समुदाय के विभिन्न महत्वपूर्ण व्यक्तियों — जैसे पुरोहित, शिकारी, किसान, राजा और माताओं की नक्काशी की जाती है। यहाँ प्रदर्शित यह मुखौटा भी इसी श्रेणी का दिखता है I जब इनका प्रदर्शन में उपयोग नहीं होता, तो ऐसी स्थिति में इन एपा मुखौटों को मंदिर-जैसे स्थलों पर रखा जाता है और समुदाय के बुजुर्ग इनके समक्ष प्रार्थना और अर्पण करते हैं।

लकड़ी से बने मुखौटों में एक अन्य पारंपरिक अफ्रीकी मुखौटा भी है। इसमें नीचे एकमानवीय चेहरा है और उसके ऊपर के हिस्से में पक्षियों को उत्कीर्णित किया गया है । ऐसे मुखौटे कई अफ्रीकी संस्कृतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जहाँ इनका उपयोग समारोहों, अनुष्ठानों और प्रदर्शनों में किया जाता है — जैसे फसल उत्सव, दीक्षा संस्कार और पूर्वज-पूजन इत्यादि। यहाँ प्रदर्शित यह मुखौटा हालाँकि लकड़ी से निर्मित है, किन्तु यह भी जानकारी मिलती है कि इन्हें ताँबे के मिश्रधातु, लौह, हाथीदाँत या मिट्टी से भी बनाया जाता है। आमतौर पर इन्हें हाथों से ही तराशा जाता है और इनमें सींग, कांटे, या विशेष रंगद्रव्य (जैसे काओलिन) जैसी सजावटी सामग्री भी जोड़ी जाती है। दुनिया भर के अन्य जनजातीय समुदाय की तरह यहाँ भी इन मुखौटों के निर्माण का उद्देश्य — सुरक्षा, छद्मावरण, नाटकीय प्रदर्शन और मनोरंजन के लिए करने के साथ-साथ अनुष्ठानों में इन्हें आत्माओं या पूर्वजों के प्रतीक के तौर पर प्रदर्शित किया जाता है I

लकड़ी वाले मुखौटों में कुछ मुखौटे ऐसे भी हैं जिनमें मानवीय चेहरे के साथ सींग जैसी आकृति है I इन अफ्रीकी सींग वाले मुखौटों का चलन पश्चिमी अफ्रीका की इग्बो या बाम्बारा/बामाना समुदाय में है I यहाँ भी ऐसे मुखौटों का उपयोग मुखौटा-नृत्य और धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है, ताकि आत्माओं और पूर्वजों से संपर्क स्थापित किया जा सके। इन मुखौटों में पशुओं की तरह का सींग और मानव जैसा चेहरा होता है , विदित हो कि यह जो अफ्रीकी मुखौटा परंपराओं के आम तत्व हैं।
प्रदर्शनी में एकसाथ कई ऐसे मुखौटे भी प्रदर्शित हैं जो भारत के हिमालयी क्षेत्र और तिब्बत जैसे क्षेत्र में प्रचलित हैं I इनका उपयोग हिमालयी क्षेत्रों में निवास करने वाले बौद्ध धर्मावलम्बियों एवं तिब्बती बौद्धों द्वारा पारंपरिक तौर पर नृत्य अनुष्ठानों में होता है। इस तरह से यह प्रदर्शनी यहाँ इन मुखौटों के आध्यात्मिक महत्व को उजागर करती है, जो “पवित्र क्षेत्र” और “प्रार्थना” से जुड़ा है। तिब्बती बौद्ध नृत्य अनुष्ठानों में इसे “छम नृत्य” के दौरान उपयोग में लाते हैं I दरअसल इस समाज में ये नृत्य आध्यात्मिक साधना का एक रूप हैं जिसे अक्सर धार्मिक कथाओं को प्रस्तुत करने के लिए किए जाते हैं। इसलिए सामान्यतया इन नृत्यों का प्रदर्शन आमतौर पर भिक्षुओं या लामा द्वारा दर्शकों के सामने किया जाता है, जिनका उद्देश्य दुष्ट आत्माओं को दूर करना या देवताओं और आध्यात्मिक प्राणियों का प्रतिनिधित्व करना होता है। चूँकि इन मुखौटों को पवित्र वस्तु माना जाता है इसलिए प्रदर्शभीन समाप्त होने के बाद इन्हें मठ में सावधानीपूर्वक संरक्षित किया जाता है, जहाँ इनके पवित्र स्वरूप पर विशेष बल दिया जाता है।

इस प्रदर्शनी के अवलोकन के बाद जो बात समझ में आती हैं, उसका सार-संक्षेप यह कि मानव सभ्यता में मुखौटे केवल कलात्मक वस्तुएँ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक पहचान के वाहक रहे हैं। चिराँद का टेराकोटा मुखौटा (1–2 शताब्दी ई.) भारत के सबसे प्राचीन मुखौटों में है, जिसका मानवीय चेहरा अनुष्ठानों में संरक्षण या अलौकिक शक्ति का प्रतीक रहा होगा। वहीँ असम के सत्रिया मुखौटे वैष्णव परंपरा से जुड़े हैं, जहाँ बाँस, कपड़े और मिट्टी से बने हल्के मुखौटे ‘मुखा-भाओना’ नाट्यरूप में पौराणिक पात्रों को जीवंत करते हैं। अपने देश से बाहर ग्लोबल साउथ की बात करें तो नाइजीरिया के एपा हेलमेट मुखौटे योरूबा संस्कृति में पूर्वजों और सामुदायिक नायकों का स्मरण कराते हैं, जिनमें विस्तृत मूर्तिकला और बहु-आकृति संरचनाएँ होती हैं। वहीँ पश्चिम अफ्रीका के सींग वाले मुखौटे (इग्बो या बामाना) बड़े सींग और मानव-सदृश चेहरे के साथ आध्यात्मिक संपर्क, दीक्षा संस्कार और रक्षा से जुडाव को दर्शाते हैं। तो हिमालयी तिब्बती ‘छम’ मुखौटे मठों में नृत्य-नाट्य द्वारा देवताओं और धार्मिक आख्यानों को प्रस्तुत करते हैं, और अनुष्ठान के बाद पवित्र वस्तु की तरह सुरक्षित रखे जाते हैं।
स्पष्ट है कि इन विविध परंपराओं में अंतर—सामग्री, शैली, और धार्मिक प्रसंग—होने के बावजूद, सभी मुखौटे एक साझा मानवीय प्रयास को दर्शाते हैं: जिसके तहत विभिन्न मुखौटा परंपरा का प्रमुख उद्देश्य अदृश्य को दृश्य बनाना, सामाजिक स्मृति को जीवित रखना, और समुदाय को आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ना प्रतीत होता है। ऐसे में अनुरोध है कि अगर आप पटना में हों या हाल के दिनों में जाने की सोच रहे हों तो अपने कार्यक्रम में इस प्रदर्शनी के अवलोकन को अवश्य शामिल करें I
-सुमन कुमार सिंह
कलाकार/ कला लेखक
