प्रेस जन- शिक्षण का बड़ा माध्यम, लोकरुचि का स्तर ऊंचा उठाना जरूरी

  • महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के दो दिवसीय विशेष आमंत्रित व्याख्यान में विद्वान वक्ता जयन्त सिंह तोमर ने कहा

वर्धा, 6 अगस्त। ‘प्रेस जन- शिक्षण के साथ जनमत निर्माण का माध्यम है। यही कारण है कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत के साथ ही उस पर अंकुश लगाने के निरंतर प्रयास हुए हैं। इसका एक लम्बा इतिहास है।‌ भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में प्रेस की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रेस के लिए समय समय पर जो कड़े कानून लाये गये उसके कारण अनेक समाचारपत्रों के संचालक व सम्पादकों को जीवन में अनेक कष्ट उठाने पड़े।’

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के विधि विभाग में विद्यार्थियों के बीच आमंत्रित- विद्वान जयन्त सिंह तोमर ने प्रेस – विधि पर केन्द्रित दो दिवसीय व्याख्यान में यह बात कही। 4 व 5 अगस्त को दो दिन की व्याख्यान श्रृंखला क्रमशः भारत में प्रेस संबंधी कानून, प्रेस की स्वतंत्रता व भारतीय प्रेस परिषद पर केन्द्रित थी। व्याख्यान के अवसर विश्वविद्यालय के विधि- विभाग के डीन प्रोफ़ेसर जनार्दन तिवारी, वरिष्ठ अध्यापक श्री आनन्द भारती, अध्यापिका डॉ. दिव्या शुक्ला, डॉ. परमानन्द राठौर, डॉ. अभिषेक सिंह, सुश्री पूर्वा जैन, सुश्री शताक्षी दीक्षित, शीला खांडेकर, पूजा फूलबंदे की विशेष उपस्थिति रही।

श्री जयंत सिंह तोमर ने भारतीय प्रेस परिषद की रूपरेखा व उद्देश्य पर बोलते हुए कहा कि यह एक आत्म-नियामक तंत्र है। उसका स्वरूप ऐसा बनाया गया है जिससे कोई बाहरी और आंतरिक दबाव काम न कर सकें। महात्मा गांधी चाहते थे कि प्रेस लोकरुचि के स्तर को ऊंचा उठाये। भारतीय प्रेस परिषद का भी यही उद्देश्य है। इस उद्देश्य की प्राप्ति में जनसंचार माध्यमों के पाठक, दर्शक व नागरिकों की सक्रियता की भी बड़ी आवश्यकता है।

स्वतंत्रता से पहले भारत में प्रेस संबंधी कानून व समय समय पर लाये गयी कठोर पाबंदियों के इतिहास पर विस्तार से बोलते हुए जयन्त सिंह तोमर ने कहा औपनिवेशिक काल में भाषाई प्रेस को कुचलने का और अभिव्यक्ति को दमित करने के निरंतर प्रयास हुए लेकिन स्वतंत्रचेता पत्रकार – सम्पादकों ने साहस के साथ अत्याचार और दमन का सामना किया, जेल गये, कालापानी तक की सजा भुगती। लार्ड कार्नवालिस ने सन् 1799  में अखबारों में सम्पादक -प्रकाशक – मुद्रक का नाम देने का नियम शुरू किया वहीं सन् 1823 में एडम एक्ट के जरिए अखबारों को लाइसेंस लेना जरूरी कर दिया गया। राजा राममोहन राय, द्वारकानाथ ठाकुर व गौरचरण बनर्जी ने एडम एक्ट के विरुद्ध जो याचिका कलकत्ता के न्यायालय में दायर की उसकी तुलना जौन मिल्टन की कृति ‘ ऐरोपेजीटिका ‘ के साथ की जाती है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में एक असाधारण दस्तावेज माना जाता है।

श्री तोमर ने आजादी के बाद आपातकाल में प्रेस की आजादी समाप्त करने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेस का काम जनता को जागरुक व शिक्षित करना है तो नागरिकों की भी जिम्मेदारी लोकरुचि के स्तर को ऊंचा उठाने में जरूरी है।
भारतीय प्रेस परिषद जैसी संस्थाएं प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के स्तर को ऊंचा उठाने में तब और सफल हो सकती हैं जब नागरिक समुदाय भी समान रूप से सक्रिय हो।

श्री तोमर ने कहा एक लोक- कल्याणकारी राज्य में सरकार, संसद और प्रेस की भूमिका वंचितों की आवाज को मुखर करना ही है। इसलिए आर्थिक सामाजिक विषमता को दूर करने की दिशा में प्रेस, सरकार और विधायिका के लक्ष्य भी समान ही हैं।

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