प्रो. राम जैसवाल (1935–2026): कला और साहित्य के सेतु पुरुष को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

बुधवार की शाम एक दुखद समाचार से मन स्तब्ध हो गया। लखनऊ कला एवं शिल्प महाविद्यालय के पूर्व छात्र, वरिष्ठ कलाकार, संवेदनशील शिक्षाविद एवं प्रेरणास्रोत प्रो. राम जैसवाल जी (जन्म : 5 सितंबर 1935, सादाबाद, मथुरा, उत्तर प्रदेश; देहावसान : 7 जनवरी 2026, अजमेर, राजस्थान) का निधन हो गया। वे काफ़ी समय से अस्वस्थ चल रहे थे उनके निधन की सूचना किशनगढ़ से उनके कलाकार शिष्य मुकेश कुमावत जी से प्राप्त हुई। इस दुःखद समाचार से सम्पूर्ण कला-जगत शोकाकुल हो उठा है।

भूपेंद्र कुमार अस्थाना

प्रो. राम जैसवाल जी उत्तर प्रदेश के मथुरा के समीप सादाबाद के मूल निवासी थे। उनका जन्म 5 सितम्बर 1935 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले के एक कस्बे में हुआ। वे बहुआयामी, असाधारण प्रतिभा के धनी चित्रकार होने के साथ-साथ एक संवेदनशील शिक्षक और प्रतिष्ठित साहित्यकार भी थे। उनका ऊर्जावान, जीवंत व्यक्तित्व और कला के प्रति आजीवन समर्पण आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करता रहेगा।

उन्होंने लखनऊ कला एवं शिल्प महाविद्यालय से 1953 से 58 तक ललित कला में डिप्लोमा तथा राजस्थान विश्वविद्यालय से चित्रकला में स्नातकोत्तर (एम.ए.) शिक्षा प्राप्त की। उनका अकादमिक कैरियर अजमेर स्थित डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज में चित्रकला विभाग में व्याख्याता के रूप में आरंभ हुआ, जहाँ आगे चलकर वे प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के पश्चात भी वे निरंतर कला-सृजन में सक्रिय बने रहे।

उनकी कृतियाँ जयपुर, लखनऊ, चंडीगढ़, गोवा, शिमला, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और अजमेर सहित देश के अनेक प्रमुख कला केंद्रों में प्रदर्शित हुईं। वे राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के अनेक कला शिविरों में सक्रिय सहभागी रहे। उन्हें ललित कला परिषद, लखनऊ तथा राजस्थान ललित कला अकादमी की वार्षिक प्रदर्शनियों (1968–1971, 1988) में पुरस्कार प्राप्त हुए।

वर्ष 1997 में राजस्थान ललित कला अकादमी का सर्वोच्च सम्मान ‘कलाविद’, कला रत्न (क्रेयॉन्स राष्ट्रीय कला महोत्सव, टोंक), वयोवृद्ध कलाकार सम्मान (AIFACS, नई दिल्ली—1999), कार्तिक कला मेला सम्मान (2013, पुष्कर), नागरी दास-सम्मान (किशनगढ़) तथा संस्कार-भारती सम्मान (भीलवाड़ा एवं अजमेर) से वे अलंकृत हुए। उनकी पेंटिंग्स उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी, राजस्थान ललित कला अकादमी, जे.के.के. आर्ट गैलरी, केंद्रीय ललित कला अकादमी, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (नई दिल्ली) सहित देश-विदेश की प्रतिष्ठित दीर्घाओं और निजी संग्रहों में संग्रहीत हैं।

वाश शैली से निर्मित कलाकृति

उनकी चित्र-भाषा में सहजता, प्रवाह, जीवंतता और गहन संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से परिलक्षित है। वे अपने विद्यार्थियों को अक्सर यह सलाह देते थे कि एक उम्दा चित्रकार बनने के लिए साहित्य का गहन अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि चित्रकला जहाँ एक क्राफ्ट है, वहीं रचनाधर्मिता और भावनात्मक गहराई के लिए साहित्य का अनुशीलन अनिवार्य है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार साहित्य में रचे-बसे राम जैसवाल जी की सृजन-यात्रा सतत् चलती रही। उनकी पहली कहानी ‘एक कस्बाई कहानी’ वर्ष 1956 में लखनऊ से प्रकाशित पत्रिका ‘युवक वाणी’ में प्रकाशित हुई। इसके संपादक उनके लेखन से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें संयुक्त संपादक बनाया और उन्होंने लगभग एक वर्ष तक पत्रिका का संपादन किया। इसके पश्चात उनकी कहानियाँ और कविताएँ निरंतर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। 1974 में प्रकाशित उनका पहला कहानी संग्रह ‘असुरक्षित’ राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हुआ। इसके बाद ‘उग्रह’ (1977), ‘समय दंश’ (1979), ‘विष जल’ (1984) और ‘अविराम’ (1998) जैसे चर्चित कहानी संग्रह प्रकाशित हुए।

जलरंग माध्यम के दृश्य चित्र

1980 में प्रकाशित कविता संग्रह ‘बिम्ब प्रतिबिम्ब’ को भी राजस्थान साहित्य अकादमी ने प्रकाशित और पुरस्कृत किया। चित्रकार होने के कारण अपने अनेक कहानी-कविता संग्रहों के कलात्मक आवरण उन्होंने स्वयं तैयार किए। राम जैसवाल जी की रचनाएँ कल्पनालोक की उड़ान नहीं, बल्कि हमें जीवन की ज़मीनी सच्चाइयों से रू-बरू कराती हैं—मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक विषमताओं, विवशताओं और आम आदमी के अंतर्मन को गहराई से स्पर्श करती हुई।

बाएं से श्री राम जैसवाल एवं प्रो. जयकृष्ण अग्रवाल

वरिष्ठ कलाकार जय कृष्ण अग्रवाल उन्हे याद करते हुए बताया कि मेरी कला–यात्रा में अनेक पड़ाव आए और अनेक व्यक्तित्वों का सानिध्य मिला, किंतु राम जायसवाल का स्थान सदैव विशेष रहा। लखनऊ के कला महाविद्यालय में वे मुझसे वरिष्ठ छात्र थे, पर उनका साथ मुझे एक बड़े भाई, गुरु और मार्गदर्शक के रूप में प्राप्त हुआ। छोटे शहर से पहली बार महानगर आए एक नवागंतुक छात्र के रूप में छात्रावास के जीवन में स्वयं को ढाल पाना मेरे लिए कठिन था; ऐसे समय में राम भाई के स्नेह और सहारे ने मेरी अनेक मुश्किलें सहज कर दीं। शांत, सहज स्वभाव के राम भाई अत्यंत कर्मठ और सृजनशील थे। यद्यपि 1958 में उनका ललित कला का पाठ्यक्रम पूर्ण हो गया और उनका सानिध्य मुझे केवल एक वर्ष ही मिल सका, फिर भी महाविद्यालय के आरंभिक संघर्षों से उबरने में उनका मार्गदर्शन आज भी स्मृतियों में जीवित है।

जलरंग माध्यम के दृश्य चित्र

राम जैसवाल के बैच में बारह छात्र–छात्राएँ थीं और सभी के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण था। दिनेश प्रताप सिंह (समुद्र मंथन बनाने वाले कलाकार), बिमला सक्सेना (बाद में बिमला बिष्ट), श्री मुनि सिंह जैसे सहपाठी उस दौर की पहचान थे। वाटरकलर वॉश शैली का वह समय था, जब श्रेष्ठ सृजन की होड़ लगी रहती थी; पर इन सबके बीच राम भाई अपनी साहित्यिक अभिरुचियों और संवेदनशील दृष्टि के कारण अलग ही पहचान रखते थे। पाठ्यक्रम पूर्ण करने के बाद कुछ वर्ष लखनऊ में बिताकर एक उपयुक्त कैनवास की तलाश उन्हें राजस्थान ले गई—और वे वहीं के होकर रह गए। राम भाई से संपर्क सहज नहीं रहा; कभी–कभी जयपुर में मुलाकात हो जाती थी, बाद में मोबाइल के आने से संवाद कुछ आसान हुआ।

अंतिम भेंट 2015 में जयपुर में हुई—बड़ी आत्मीयता से मिले। मेरे सफेद बाल देखकर मुस्कराते हुए बोले, “क्या मुझसे प्रतिस्पर्धा कर रहे हो?” मैंने भी तुरंत कहा, “प्रतिस्पर्धा और आपसे! मेरे बाल तो धूप में सफेद हो गए हैं।” और हम दोनों ठहाका मारकर हँस पड़े। आज राम भाई हमारे बीच नहीं हैं। अंतिम मुलाकात की वह हँसी ही स्मृतियों में संजोए हुए हूँ। उम्र के साथ आँखों में आँसू भी जैसे सूख गए हैं। अलविदा राम भाई—आप हमारी यादों में सदैव जीवित रहेंगे।

प्रकाशित्त पुस्तकें

वरिष्ठ कलाकार एवं कला-इतिहासकार अखिलेश निगम जी ने उन्हें स्मरण करते हुए कहा कि— “राम जैसवाल (1935–2026) जी का जाना कला और साहित्य—दोनों क्षेत्रों के लिए अपूरणीय क्षति है। वे जलरंगों के सिद्धहस्त चित्रकार, वॉश शैली के प्रमुख कलाकार तथा हिन्दी साहित्य में एक सशक्त कहानीकार और संवेदनशील कवि थे। स्वभाव से वे अत्यंत सरल और सहज इंसान थे। अपने भरे-पूरे परिवार के साथ-साथ वे शिष्यों की एक लंबी परंपरा छोड़ गए हैं, जो उनकी कला-दृष्टि को आगे बढ़ा रही है।”

उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी से साहब बख्श ने बताया कि पिछले दिनों राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर (RIC) जयपुर एवं राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वाधान में अंतर राज्य विनिमय कला प्रदर्शनी का आयोजन 2 से 6 जनवरी 2026 तक किया गया था। इस प्रदर्शनी में राम जैसवाल जी के द्वारा 1958 में बनाया गया एक जलरंग में एच रॉय चौधरी के पोर्ट्रेट प्रदर्शित किया गया था।

जयपुर से कलाकार अन्नपूर्णा शुक्ला ने बताया कि राम जैसवाल आधुनिक भारतीय जल–रंग चित्रकला के उन विरल कलाकारों में थे, जिन्होंने माध्यम की पारदर्शिता को अपने व्यक्तित्व, दृष्टि और जीवन–दर्शन का अभिन्न अंग बना लिया। वे स्वभाव से उतने ही कोमल, धैर्यशील और संवेदनशील थे, जितनी उनकी वॉश शैली की रेखाएँ—शांत, संयमित और आत्मसात करती हुई। उन्होंने 1953 में लखनऊ फाइन आर्ट कॉलेज में दाखिला लिया और 1958 में कला–शिक्षा पूर्ण की और आगे चलकर लखनऊ मेडिकल कॉलेज, दयानन्द कॉलेज सहित विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में अध्यापन किया, तथा दयानन्द कॉलेज, अजमेर से चित्रकला विभागाध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त हुए। एक शिक्षक के रूप में वे अनुशासन से अधिक संवेदना और भावनात्मक जुड़ाव पर विश्वास रखते थे, जबकि कलाकार के रूप में वे धैर्य, प्रतीक्षा और रिक्तता को जल–रंग माध्यम की मूल शक्ति मानते थे।

उनकी वॉश शैली में रंगों का बहाव स्वयं चित्र की भाषा बन जाता था, जिसमें प्रकाश, कोहरा, वर्षा, धूल और वातावरणीय नमी जैसे सूक्ष्म प्रभाव पारदर्शी जल–रंगों में सहजता से प्रकट होते हैं। राजस्थान के नगर—जयपुर, बूंदी और उदयपुर—की गलियाँ, बाज़ार, चाय की दुकानें तथा अरावली के दृश्य उनके चित्रों में केवल भौगोलिक स्थल नहीं रह जाते, बल्कि जीवंत मानवीय अनुभव का रूप ले लेते हैं। राम जैसवाल केवल चित्रकार ही नहीं, बल्कि संवेदनशील कथाकार और कवि भी थे; जो अनुभूतियाँ रंग और रेखाओं में पूर्णतः अभिव्यक्त न हो सकीं, उन्हें उन्होंने शब्दों में संजोया।

समय दंश, बिंब–प्रतिबिंब, उग्र, समय संदेश, सुरक्षित, विषजल जैसे उनके कहानी–संग्रह तथा अनेक काव्य–संग्रह उनके गहरे सामाजिक सरोकार और मानवीय चेतना को उद्घाटित करते हैं। उनकी तीव्र संवेदनशीलता उन्हें समाज के प्रति सजग बनाती थी, किंतु वही संवेदनशीलता कई बार मानसिक प्रताड़ना का कारण भी बनी, जिसे उन्होंने स्वयं स्वीकारते हुए लिखा—“जब सारी ज़िंदगी ही ऐसी हो जाए कि हर आदमी कहने और सुनने को व्याकुल हो… या फिर उस पर कहने को कुछ बचे ही नहीं… ऐसी ही स्थिति से गुज़रा हूँ और इन कहानियों को लिखने को विवश हो गया हूँ।

वाश शैली के चित्र

” जल–रंग माध्यम को वे साधना मानते थे और युवा कलाकारों को इसके साथ निरंतर जुड़े रहने की प्रेरणा देते थे; उनकी दृष्टि में जल–रंग की सघनता, पारदर्शिता और उसका सहज बहाव ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, जो देखने, सोचने और महसूस करने की क्षमता को विस्तृत करती है। राम जयसवाल की कला–विरासत हमें यह सिखाती है कि सृजन में पारदर्शिता, धैर्य और मानवीय संवेदना ही सबसे बड़े मूल्य हैं—जैसी उनकी कला–शैली थी, वैसी ही उनकी भाषा–शैली और वैसी ही उनकी आत्म–शैली।

अपने विचारों, शिक्षण और समृद्ध कला-साहित्यिक विरासत के माध्यम से प्रो. राम जैसवाल जी सदैव स्मृतियों में जीवित रहेंगे और युवा कलाकारों व रचनाकारों को प्रेरणा देते रहेंगे। उन्हें विनम्र एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

– भूपेंद्र कुमार अस्थाना

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