ऋषि-परंपरा से राष्ट्रग्रंथ तक: भारतीय संविधान की कलात्मक आत्मा

डॉ. अन्नपूर्णा शुक्ला समकालीन भारतीय कला जगत की एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ चित्रकार हैं, जिन्होंने न केवल अपने चित्रों के माध्यम से बल्कि अपनी लेखनी द्वारा भी कला विमर्श को समृद्ध किया है। वे वनस्थली विद्यापीठ में प्राध्यापक पद पर लंबे समय तक कार्यरत रहीं और अपने शैक्षणिक अनुभव के साथ अनेक विद्यार्थियों को कला की गहन समझ प्रदान की। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने अपने सृजनात्मक कार्य को और अधिक विस्तार दिया है, जहाँ उनकी चित्रकला में अनुभव, संवेदना और परिपक्वता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। डॉ. शुक्ला का लेखन न केवल कला की व्याख्या करता है, बल्कि उसे व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से भी जोड़ता है। इस प्रकार, वे एक कलाकार और विचारक—दोनों रूपों में भारतीय कला जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

डॉ. अन्नपुर्णा शुक्ला

भारत का संविधान केवल कानूनों का संकलन नहीं,वो लालित्य से पूर्ण एक ऐसी जीवित पांडुलिपि है जिसमें अक्षरों की लय, रंगों की गहराई और रेखाओं की सजीवता मिलकर राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्त करती हैं। जिस देश की सांस्कृतिक चेतना वेदों की रचना करने वाले ऋषियों की परंपरा से निर्मित हुई हो, जहाँ ज्ञान को लिखना एक तपस्या माना गया हो, वहाँ संविधान जैसे राष्ट्रग्रंथ का रूखा-सूखा और यांत्रिक होना संभव ही नहीं था।

शब्दों की शक्ति बहुत गहरी होती है ।इसी लिए भारतीय सभ्यता में शब्दों को केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि मंत्र माना गया है। वेदों की रचना, उपनिषदों की सूक्ष्म भाषा और प्राचीन ग्रंथों की अलंकृत पांडुलिपियाँ इस बात की साक्षी हैं कि भारत में ज्ञान और सौंदर्य हमेशा साथ-साथ चले हैं। इसी सांस्कृतिक वातावरण में निर्मित संविधान का कलात्मक होना स्वाभाविक था, क्योंकि वह उसी परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है।

प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा द्वारा लिखित संविधान की मूल कैलीग्राफी।

भारतीय संविधान की मूल प्रति जब सुलेखक प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा के हाथों से लिखी जा रही थी, तब वह केवल अक्षरों को कागज़ पर उतारने का कार्य नहीं कर रहे थे , वह एक प्रकार की साधना में लीन थे। प्रत्येक अक्षर को उन्होंने उसी धैर्य और संतुलन के साथ अंकित किया, जैसे कोई साधक अपने मंत्रों का उच्चारण करता है। उनकी लेखनी में प्रवाह, अनुशासन और सौंदर्य का जो संगम दिखाई देता है, वह भारतीय सुलेख परंपरा की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है।

भारतीय संविधान की मूल प्रति को सुलेखक प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने लगभग छह महीनों के सतत श्रम से अंग्रेज़ी की सुंदर flowing italic कैलीग्राफी शैली में हाथ से लिखा था। इस शैली में अक्षर हल्के झुके हुए और लयात्मक होते हैं, जिससे पूरा पाठ अत्यंत संतुलित और आकर्षक दिखाई देता है। लेखन के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया उच्च-गुणवत्ता वाला हस्तनिर्मित कागज़ उपयोग में लाया गया, ताकि यह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ दीर्घकाल तक सुरक्षित रह सके। कैलीग्राफी का कार्य पूर्ण होने के पश्चात यही पांडुलिपि कलाकार नंदलाल बोस और उनके शिष्यों को चित्रांकन के लिए सौंपी गई, जिन्होंने प्रत्येक पृष्ठ के किनारों पर भारतीय इतिहास और संस्कृति से प्रेरित अत्यंत सुंदर और सूक्ष्म चित्रकारी की।जब पृष्ठों पर शब्द अंकित हो गए, तब महान कलाकार नंदलाल बोस और उनकी टीम ने उन पृष्ठों को चित्रों और अलंकरणों से सजाया। संविधान के प्रत्येक भाग के आरंभ में एक चित्र रखा गया, जो भारत की ऐतिहासिक यात्रा—सिंधु घाटी से स्वतंत्रता संग्राम तक—को क्रमबद्ध रूप में दर्शाता है।

इन चित्रों की शैली पर अजंता और बाघ की भित्ति चित्रण परंपरा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है, जबकि बॉडर में मुगल और राजस्थानी लघुचित्र शैली की झलक मिलती है। कुल 22 चित्र बनाए हुए इन 22 चित्रों में इतिहास के वो प्रभावशाली कथाओं को बिंबित किया गया है जिनसे जनमानस परिचित है ।कितना सोच समझ कर 5000 वर्ष के इतिहास को संविधान के 22 चित्रों में प्रस्तुत किया । यह दृष्टि प्रख्यात कलाकार नंदलाल बोस और उनके शिष्यों की ही हो सकती है जिन्होंने संविधान की लंबी उम्र के लिए अर्थ कलर्स , हस्तनिर्मित पेपर और विभिन्न शैलियों को जैसे अजंता ,मुगल और राजस्थानी शैलियों का प्रयोग करके एक सुंदर रणनीति के अनुरूप ही कार्य किया । ये सुनने में सामान्य सा लगता है किंतु ये ललित भाव से पूर्ण वैज्ञानिक दृष्टि का प्रतिफलन ही है ।

यह निर्णय भी उस समय के राष्ट्रनिर्माताओं की सांस्कृतिक चेतना और संवेदना के प्रवाह को दर्शाता है। नंदलाल बोस केवल चित्रकार नहीं थे; वे भारतीय कला परंपरा के गहरे अध्येता और साधक थे। उनकी दृष्टि में कला केवल सजावट नहीं, बल्कि संस्कृति की जीवित अभिव्यक्ति थी। यह अभिव्यक्ति जैसे कोई ऐतिहासिक लघु फिल्म हो, जो पृष्ठ पलटते ही दृश्य बदलजाता है संविधान की गरिमा के साथ।

कैप्शन: नंदलाल बोस और उनके शिष्यों द्वारा चित्रित संविधान का सज्जित पृष्ठ।

इन चित्रों में अजंता की भित्ति चित्र शैली की कोमलता, राजस्थानी और मुगल लघुचित्रों की सूक्ष्मता और भारतीय लोककला की सहजता—सभी का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। यह समन्वय इस बात का प्रतीक है कि भारत ने अपने आधुनिक लोकतंत्र को अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों से ही शक्ति प्रदान की।

संविधान के बॉर्डर और चित्रों में अजंता तथा भारतीय लघुचित्र शैली का प्रभाव।

यदि उस समय के नेता चाहते, तो संविधान को साधारण टाइपराइटर से टाइप कराकर सरकारी दस्तावेज़ की तरह सुरक्षित रख सकते थे , परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने यह समझा कि संविधान केवल प्रशासनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का लिखित रूप और संवेदना भाव होता है । इसलिए उसे उसी सम्मान और सौंदर्य के साथ प्रस्तुत किया गया, जैसा प्राचीन भारत अपने धर्मग्रंथों और ज्ञानग्रंथों को देता था।

भारतीय परंपरा में कलाकार को सदा ऋषि के समान सम्मान दिया गया है, क्योंकि दोनों ही सृजन करते हैं—एक शब्दों से, दूसरा रंगों और रेखाओं से। संविधान की रचना में भी यही ऋषि-परंपरा दिखाई देती है। प्रेम बिहारी की लेखनी और नंदलाल बोस के चित्र दोनों मिलकर यह प्रमाणित करते हैं कि भारत में राष्ट्रनिर्माण केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं थी, वह एक सांस्कृतिक साधना भी थी।

संविधान की धाराएँ सामान्यतः जटिल और शुष्क मानी जाती हैं, परंतु भारतीय संविधान को जिस प्रकार कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया, उसने इस शुष्कता को दूर कर कलाओं के लालित्य से इस तरह भरा गया कि संविधान की शब्दशक्ति और अर्थगर्भित को जरासा भी बेरंग नहीं होने दिया। जब कोई उसके पृष्ठ पलटता है, तो उसे केवल अनुच्छेदों की पंक्तियाँ नहीं, बल्कि रंगों की जीवंतता और इतिहास की झलक दिखाई देती है। इस प्रकार एक नीरस विषय को भी सौंदर्य और संवेदना से भर दिया गया।

आज भारतीय संसद में सुरक्षित मूल संविधान केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और कलात्मक चेतना का जीवित प्रतीक है। उसकी पंक्तियों में लिखे शब्द और उनके चारों ओर बने चित्र यह बताते हैं कि भारत ने अपने भविष्य को गढ़ते समय अपने अतीत को विस्मृत नहीं किया।

मनुष्य का सृजन उसके अंतरमन और उसके वातावरण से आकार ग्रहण करता है। जिस समय भारत अपना संविधान रच रहा था, उस समय राष्ट्र स्वतंत्रता, आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भावनाओं से भरा हुआ था। स्वाभाविक है कि उस वातावरण में निर्मित दस्तावेज़ केवल औपचारिक और कठोर नहीं हो सकता था; उसमें उस युग की संवेदनाएँ और सौंदर्य-बोध अनायास ही प्रतिबिंबित हो गए। कलाकार और ऋषि दोनों ही अपने भीतर के अनुभवों को अभिव्यक्त करते हैं, और यही कारण है कि प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा की कलम तथा नंदलाल बोस की तूलिका ने उस राष्ट्रीय चेतना को रूप दिया, जो उस समय पूरे देश में स्पंदित हो रही थी। यह मनोवैज्ञानिकों ने भी स्पष्ट किया है कि जो हमारे आसपास तना बाना होता है उसी से अद्भुत बनावट होती है उसी अद्भुत बनावट का ही परिणाम यह संविधान है ।इस प्रकार संविधान केवल लिखा नहीं गया—वह रचा गया।

आज का युवा वर्ग प्रायः संविधान को केवल कानूनों और परीक्षाओं से जुड़ा हुआ विषय मानता है परिणामस्वरूप उसमें उसके प्रति भावनात्मक जुड़ाव और जिज्ञासा का अभाव दिखाई देता है। इस लेख से युवाओं को यह स्पष्ट होगा कि उनका संविधान किसी मशीन का उत्पाद नहीं, बल्कि कलाकारों, विद्वानों और दूरदर्शी नेताओं की सामूहिक साधना का परिणाम है, तो उनकी दृष्टि स्वतः बदल सकती है। संविधान को उसकी कलात्मकता, उसकी रचना-प्रक्रिया और उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ समझना युवाओं में न केवल ज्ञानवृद्धि करेगा, बल्कि उनमें अपने राष्ट्र के प्रति गर्व और संवेदनशीलता भी उत्पन्न करेगा।

अंततः भारतीय संविधान यह सिखाता है कि महान राष्ट्र केवल कानूनों से नहीं बनते; वे संवेदनशील मन, सृजनशील दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना से निर्मित होते हैं। शब्द, रंग और रेखाओं का यह अद्भुत संगम हमें यह याद दिलाता है कि जब सृजन में सौंदर्य और आत्मा का समावेश होता है, तब वह केवल दस्तावेज़ नहीं रहता—वह युगों तक जीवित रहने वाली विरासत बन जाता है।

-डॉ. अन्नपुर्णा शुक्ला 

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