कुर्किहार और चोल धातु मूर्तिशिल्प: तुलनात्मक अध्ययन

भारतीय कला के इतिहास में, मध्यकालीन भारत धातु शिल्प के दो महान केंद्रों के उदय का साक्षी रहा: जहाँ एक तरफ पूर्वी भारत में वर्तमान बिहार के  कुर्किहार (पाल कालीन) और दक्षिण भारत में चोल। यद्यपि ये दोनों कला परंपराएँ लगभग एक ही कालखंड (8वीं से 13वीं शताब्दी) में फली-फूलीं, लेकिन उनका भौगोलिक, धार्मिक और शैलीगत संदर्भ उन्हें विशिष्ट पहचान देता है। इन दोनों के बीच का अंतर्संबंध प्रत्यक्ष प्रभाव से अधिक, एक साझा भारतीय विरासत की दो समानांतर और उत्कृष्ट अभिव्यक्तियों का है।

 समानताओं और भिन्नताओं का विश्लेषण

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समानताएँ (Points of Connection)

कालखंड (Time Period):दोनों कला शैलियाँ मध्यकालीन भारत में अपने चरम पर थीं। पाल वंश (8वीं-12वीं शताब्दी) के संरक्षण में कुर्किहार कला का विकास हुआ, जबकि चोल वंश (9वीं-13वीं शताब्दी) ने दक्षिण में धातु मूर्तिकला को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंचाया।

माध्यम (Medium):दोनों ही परंपराओं का मुख्य माध्यम कांस्य (Bronze) था। यह एक मिश्र धातु है, जिसे बनाने में तांबे का प्रमुखता से उपयोग होता था। दोनों क्षेत्रों के कारीगरों ने इस माध्यम पर असाधारण महारत हासिल की।

तकनीक (Technique):यह दोनों के बीच सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी समानता है। कुर्किहार और चोल, दोनों के शिल्पकार मधूच्छिष्ट विधान (Cire Perdue or Lost-Wax Casting) नामक जटिल और उन्नत तकनीक का प्रयोग करते थे। इस प्रक्रिया में पहले मोम का मॉडल बनाया जाता था, जिस पर मिट्टी का लेप किया जाता था। फिर उसे गर्म करके मोम को पिघलाकर बाहर निकाल दिया जाता था और खाली जगह में पिघली हुई धातु भर दी जाती थी। इस साझा तकनीक के कारण ही दोनों परंपराएँ इतनी जीवंत और विस्तृत मूर्तियाँ बनाने में सफल रहीं।

राजकीय संरक्षण (Royal Patronage):दोनों कला शैलियों को अपने-अपने क्षेत्र के शक्तिशाली राजवंशों का संरक्षण प्राप्त था। पाल शासकों ने बौद्ध धर्म के केंद्रों, विशेषकर नालंदा और कुर्किहार, को संरक्षण दिया, जबकि चोल राजा शैव धर्म के महान अनुयायी थे और उन्होंने भव्य मंदिरों का निर्माण कराया तथा उन्हें उत्कृष्ट कांस्य मूर्तियों से सुशोभित किया। राजकीय संरक्षण ने कला की गुणवत्ता को सुनिश्चित किया।

भिन्नताएँ (Points of Divergence)

विषय-वस्तु और धार्मिक संदर्भ (Subject Matter and Religious Context): 

  • कुर्किहार:यह कला महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म से गहराई से जुड़ी हुई थी। यहाँ की मूर्तियों में मुख्य रूप से बुद्ध, बोधिसत्व (जैसे अवलोकितेश्वर, मैत्रेय) और देवियों (जैसे तारा, मारीचि) का चित्रण मिलता है। ये मूर्तियाँ ध्यान, करुणा और आध्यात्मिक शांति के भाव को दर्शाती हैं।
  • चोल:यह कला मुख्य रूप से हिंदू धर्म, विशेषकर शैव मत, से प्रेरित थी। चोल कांस्य मूर्तियों में शिव के विभिन्न रूप (विशेषकर नटराज), पार्वती, विष्णु, लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं का चित्रण है। ये मूर्तियाँ अक्सर दिव्य लीला, ब्रह्मांडीय ऊर्जा और शक्ति के भाव को प्रकट करती हैं।

कलात्मक शैली और भाव (Artistic Style and Expression):

  • कुर्किहार:कुर्किहार की मूर्तियों पर गुप्तकालीन सारनाथ शैली का प्रभाव स्पष्ट है। इनकी विशेषताएँ हैं: सौम्यता, संतुलन, शांत और ध्यानमग्न भाव, चिकनी सतह और सुडौल, लम्बे शरीर। अलंकरण संयमित होता है और मुख्य ध्यान आकृति के आध्यात्मिक और आंतरिक भाव पर होता है।
  • चोल:चोल मूर्तियाँ अपनी गतिशीलता (Dynamism), ऊर्जा और जीवंतता के लिए प्रसिद्ध हैं। नटराज की मूर्ति इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जो सृजन और विनाश के ब्रह्मांडीय नृत्य का प्रतीक है। इनमें अलंकरण अधिक विस्तृत होता है और शारीरिक मुद्राओं में एक नाटकीयता होती है जो दिव्य शक्ति को दर्शाती है।

कलात्मक प्रेरणा और विरासत (Artistic Inspiration and Legacy):

  • कुर्किहार:यह कला परंपरा गुप्त कला की विरासत को आगे बढ़ाती है। इसका प्रभाव भारत से बाहर नेपाल, तिब्बत, जावा और सुमात्रा जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की बौद्ध कला पर बहुत गहरा पड़ा।
  • चोल:यह पल्लव कला परंपरा से विकसित हुई। चोल साम्राज्य के समुद्री विस्तार के कारण, इस कला का प्रभाव श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी देखा जा सकता है।

तुलनात्मक सारणी (चित्र-आधारित विश्लेषण):

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पक्ष कुर्किहार तारा (पालकालीन) चोल नटराज (चोलकालीन)
धातु तकनीक कांस्य, मोम ढलाई (लॉस्ट वैक्स) पंचधातु, लॉस्ट वैक्स तकनीक
प्रमुख मुद्रा ध्यान मुद्रा, कमलासन तांडव मुद्रा, त्रिभंग भंगिमा
भाव-प्रस्तुति शांति, करुणा, स्त्रीत्व की गरिमा ऊर्जा, लय, ब्रह्मांडीय शक्ति
मुखाकृति अंडाकार, सौम्य, शांत नेत्र चौड़ा चेहरा, तीव्र नेत्र, गतिशील जटा
गहनों का प्रयोग सूक्ष्म, संतुलित विस्तृत, दैविक, भव्य
धार्मिक उद्देश्य ध्यान और बौद्ध साधना हेतु भक्ति, पूजा, मंदिर आराधना
समकालीन संग्रहालय बिहार म्यूज़ियम, पटना चेन्नई म्यूज़ियम, तमिलनाडु

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि कुर्किहार और चोल धातु शिल्प एक-दूसरे से सीधे प्रभावित नहीं थे, बल्कि वे एक ही भारतीय कलात्मक वृक्ष की दो अलग-अलग शाखाओं की तरह थे, जो अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुईं।

  • उनकाअंतर्संबंध एक साझा तकनीकी विरासत (लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग) और मध्यकालीन भारत के कलात्मक उत्कर्ष के समय में निहित है।
  • उनकीभिन्नता उनके अलग-अलग धार्मिक दर्शन (बौद्ध बनाम शैव), सांस्कृतिक परिवेश और कलात्मक भाव (शांत बनाम गतिशील) में है।

संक्षेप में, कुर्किहार और चोल धातु शिल्प दो समानांतर शिखर हैं। एक पूर्वी भारत में बौद्ध दर्शन की शांत और आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है, तो दूसरा दक्षिण भारत में शैव दर्शन की ब्रह्मांडीय ऊर्जा और लय को प्रकट करता है। दोनों मिलकर मध्यकालीन भारतीय कला की समृद्धि और विविधता का एक अद्भुत चित्र प्रस्तुत करते हैं।

प्रस्तुति : सुमन कुमार सिंह 

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