कला और चिकित्सा—पहली नज़र में ये दोनों संसार भिन्न प्रतीत होते हैं। एक संवेदना और सौंदर्य का क्षेत्र है, दूसरा विज्ञान और तर्क का। किंतु जब हम गहराई में जाते हैं, तो पाते हैं कि इन दोनों का रिश्ता अत्यंत गहरा और ऐतिहासिक है। सर्जन का स्केलपेल और कलाकार का ब्रश—दोनों ही मानवीय शरीर की जटिलताओं को समझने और उन्हें रूप देने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि कला और चिकित्सा के मेल पर अनेक कलाकारों, विद्वानों और चिकित्सकों ने विचार किया और उसे अपनी कृतियों में उतारा। शल्य चिकित्सा कला का एक अत्यंत विशिष्ट रूप है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक विज्ञान है, लेकिन केवल शल्य चिकित्सा विज्ञान का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है । शल्य चिकित्सक को मानवीय स्थिति की गहरी समझ होनी चाहिए। हम जो करते हैं उसमें केवल वैज्ञानिक विश्वसनीयता ही नहीं, बल्कि सूक्ष्मता, सूक्ष्मता, अंतर्ज्ञान, चिंतन और जुनून भी होता है।
रक्त और कैनवास का मिलन :
19वीं सदी के अमेरिकी कलाकार थॉमस एकिन्स की प्रसिद्ध पेंटिंग द ग्रॉस क्लिनिक इसका सशक्त उदाहरण है। उन्होंने शल्य चिकित्सा को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया—रक्त सना स्केलपेल, गंभीर मुद्रा में खड़े डॉक्टर और भयभीत परिजन। यह चित्र उस यथार्थ को सामने लाता है जिसे समाज प्रायः छुपाना चाहता था।

इससे पहले 18वीं सदी के डच कलाकार कॉर्नेलिस ट्रूस्ट ने शव विच्छेदन कक्ष के दृश्य चित्रित किए, जहाँ विद्वान मृत्यु के वातावरण को लगभग उत्सव जैसा बना देते हैं। सबसे उल्लेखनीय योगदान लियोनार्डो दा विंची का है। उन्होंने तीस से अधिक शवों का विच्छेदन कर मानव शरीर की संरचना का अद्भुत दस्तावेज तैयार किया। उनकी रेखाएँ वैज्ञानिक सटीकता और कलात्मक सौंदर्य का अद्वितीय संगम हैं।
भारतीय परंपरा : सुश्रुत से आधुनिक सर्जन तक
भारतीय चिकित्सा परंपरा में भी यह संबंध उतना ही पुराना है। सुश्रुत संहिता (लगभग 500 ई.पू.) को विश्व का सबसे प्राचीन शल्य चिकित्सा ग्रंथ माना जाता है। सुश्रुत ने सर्जन को एक मूर्तिकार की भांति देखा—जो केवल चीरा नहीं लगाता, बल्कि शरीर का पुनर्निर्माण करता है। नाक की पुनर्निर्माण शल्यक्रिया (राइनोप्लास्टी), मोतियाबिंद ऑपरेशन और हड्डी जोड़ने की तकनीक का उन्होंने अद्भुत विवरण दिया।

18वीं सदी में जब ब्रिटिश चिकित्सकों ने भारत में नाक पुनर्निर्माण की परंपरा देखी, तो वे चकित रह गए और जेंटलमैन मैगज़ीन में इसका उल्लेख किया। इस प्रकार पश्चिम को भारत की उन्नत शल्य परंपरा का पता चला। आज के भारत में एम्स, पीजीआई जैसे संस्थान सुश्रुत की परंपरा को आधुनिक तकनीक—रोबोटिक सर्जरी, अंग प्रत्यारोपण—के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
कला की दृष्टि से अस्पताल और ऑपरेशन थिएटर
अस्पताल भी कलाकारों के लिए प्रेरणा के स्थल रहे हैं। ब्रिटिश मूर्तिकार बारबरा हेपवर्थ ने 1940 के दशक में हॉस्पिटल ड्रॉइंग्स बनाए, जहाँ उन्होंने सर्जनों की गति और मूर्तिकार के हाथों के बीच समानता देखी। भारतीय समकालीन कलाकारों ने भी मेडिकल इमेजिंग (एक्स-रे, स्कैन) को प्रतीकात्मक रूप में चित्रित किया है। अस्पताल के अनुभव, दवा की शीशियाँ और चिकित्सा उपकरण कई कलाकृतियों के विषय बने हैं। यह प्रयोग आधुनिक चिकित्सा और कला को एक नए सामाजिक-दार्शनिक दृष्टिकोण से जोड़ते हैं।

कठिन डगर और सामाजिक प्रतिरोध
किन्तु यह सबकुछ इतना आसान भी नहीं रहा है , क्योंकि सामाजिक और क़ानूनी जटिलताओं की वजह से शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन कभी आसान नहीं रहा। यूरोप में शव चोरी और जनता के सामने एनाटॉमी लेक्चर ने समाज और विज्ञान के बीच तनाव उत्पन्न किया। भारत में भी लंबे समय तक शव विच्छेदन धार्मिक प्रतिरोध का विषय रहा। किंतु धीरे-धीरे यह समझ विकसित हुई कि यह ज्ञान मानव जीवन की रक्षा के लिए आवश्यक है।
भारतीय समकालीन कलाकारों ने भी शरीर, चिकित्सा और मृत्यु के अनुभवों को अपने कला-माध्यम से गहराई दी है।
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सुबोध गुप्ता की इंस्टॉलेशन कला में स्टील के बर्तन और रसोई उपकरण प्रायः शरीर और जीवन-निर्वाह से जुड़े रूपकों की तरह सामने आते हैं। उनकी कुछ कृतियों में अस्पताल की निर्जीव धातु-चमक और मानव शरीर की नाजुकता का टकराव स्पष्ट दिखाई देता है।
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जितिश कल्लट ने Public Notice जैसी श्रृंखलाओं के अलावा अपने कई कार्यों में अस्थि-पंजर, एक्स-रे जैसी इमेजरी का प्रयोग किया है। उनके कार्यों में शरीर अक्सर इतिहास, बीमारी और मृत्यु की स्मृति से जुड़ा मिलता है।
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अनीश कपूर के विशाल लाल वैक्यूम-फॉर्म इंस्टॉलेशन शरीर के भीतरूनी हिस्सों (मांस, रक्त, आंतरिक गुहा) की स्मृति जगाते हैं। दर्शक इन कृतियों को देखते हुए खुद को किसी जीवित अंग के भीतर पाते हैं—यह अनुभव सर्जरी के अंदर-बाहर दृष्टिकोण की तरह है।
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नलिनी मलानी की वीडियो-इंस्टॉलेशन और चित्रणों में शरीर का विखंडन, दर्द और पुनर्जन्म जैसे विषय दिखाई देते हैं, जो रोग और उपचार दोनों के रूपक बन जाते हैं।
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भूपेन खखर ने अपने चित्रों में आम आदमी और रोगी का यथार्थ दिखाया। कैंसर से जूझते समय उन्होंने खुद अपने शरीर को कला का विषय बनाया, और बीमारी को कलात्मक दस्तावेज़ का हिस्सा बना दिया।

साझा लक्ष्य
चाहे लियोनार्डो दा विंची हों, सुश्रुत हों या बारबरा हेपवर्थ—सभी का मानना था कि सर्जन और कलाकार का लक्ष्य समान है: जीवन की गहराइयों को समझना और उसका सम्मान करना। सर्जन का स्केलपेल जीवन को पुनः आकार देता है, जबकि कलाकार का ब्रश अस्तित्व को नया अर्थ देता है।
भारतीय दृष्टिकोण में कला और चिकित्सा दोनों साधना माने गए। आयुर्वेद ने शरीर को पंचमहाभूतों का स्वरूप बताया, तो मूर्तिकला ने उसे दैवीय अनुपातों में गढ़ा।
ऐसे में आज जब ऑपरेशन की वीडियो रिकॉर्डिंग संभव है, तो तकनीकी स्तर पर कला की भूमिका बदल गई है। परंतु प्रेरणा और दृष्टिकोण के स्तर पर कलाकार अब भी अस्पताल और ऑपरेशन थिएटर से जुड़ते हैं, क्योंकि यहाँ जीवन और मृत्यु दोनों एक साथ उपस्थित होते हैं। सर्जन का नश्तर और कलाकार की तूलिका—दोनों मानवीय अस्तित्व की गहराइयों को छूते हैं। एक जीवन बचाता है और दूसरा जीवन को अर्थ देता है। विज्ञान और कला वास्तव में अलग नहीं, बल्कि एक ही वृक्ष की दो शाखाएँ हैं।
स्रोत : सोशल मीडिया
