मौजूदा समय में सूत्रधार शब्द का प्रयोग अमूमन नाटकों में देखा जाता है I यहाँ सूत्रधार का आशय उस व्यक्ति से है जो नाटक का निर्देशक, प्रबंधक और अक्सर मुख्य अभिनेता होता है I परम्परागत शैली के नाटकों में यही व्यक्ति दर्शकों को नाटक के विषय-वस्तु की जानकारी के साथ सभी पात्रों का परिचय भी कराता है और पूरे मंच प्रदर्शन के संचालन का ज़िम्मा भी संभालता है । किन्तु भारतीय कला एवं वास्तु के विशाल वाङ्मय में ‘सूत्रधार’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय चरित्र है। यह शब्द केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और नेतृत्व का प्रतीक है, जो किसी भी कलात्मक या वास्तुकला परियोजना के सृजन और सफल निष्पादन के लिए अनिवार्य था। सूत्रधार वह धुरी था जिसके चारों ओर संपूर्ण निर्माण प्रक्रिया घूमती थी।
‘सूत्रधार’ का शाब्दिक अर्थ : ‘सूत्रधार’ शब्द दो संस्कृत शब्दों के मेल से बना है: ‘सूत्र’ (धागा) और ‘धार’ (धारण करने वाला)। इस प्रकार, इसका शाब्दिक अर्थ है “सूत्र को धारण करने वाला”। प्राचीन भारत में, किसी भी निर्माण या रचना का खाका तैयार करने के लिए धागे या रस्सी (सूत्र) का उपयोग ज्यामितीय माप और रेखांकन के लिए किया जाता था। सूत्रधार वह व्यक्ति था जो इस धागे का उपयोग करके भूमि पर पूरी योजना को रेखांकित करता था। यह भूमिका उसकी गणितीय और ज्यामितीय सटीकता के ज्ञान को दर्शाती है।
समरांगणसूत्रधार के अनुसार भूमिका : राजा भोज द्वारा रचित 11वीं सदी के प्रसिद्ध वास्तुशिल्प ग्रंथ ‘समरांगणसूत्रधार’ में सूत्रधार की भूमिका और गुणों का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह ग्रंथ स्वयं अपने शीर्षक में ‘सूत्रधार’ शब्द को महत्व देता है, जो दर्शाता है कि वास्तुशिल्प का पूरा ज्ञान उसी में निहित है। इस ग्रंथ के अनुसार, सूत्रधार केवल एक डिजाइनर या वास्तुकार नहीं था, बल्कि एक व्यापक परियोजना प्रबंधक था।
सूत्रधार के गुण और उत्तरदायित्व:
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सर्वशास्त्रज्ञाता: एक आदर्श सूत्रधार को केवल वास्तुशास्त्र और शिल्पशास्त्र का ही नहीं, बल्कि गणित, ज्योतिष, ज्यामिति, भूगर्भ विज्ञान, चित्रकला और यहां तक कि काव्य और व्याकरण का भी ज्ञान होना आवश्यक था। उसे शुभ और अशुभ मुहूर्तों की गणना करने में निपुण होना पड़ता था।
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प्रधान वास्तुकार (स्थपति): सूत्रधार ही मुख्य वास्तुकार या ‘स्थपति’ होता था, जो पूरी परियोजना की अवधारणा तैयार करता था। वह मंदिर, महल, नगर या किसी अन्य संरचना की डिजाइन और योजना के लिए जिम्मेदार था।
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माप और रेखांकन में निपुण: उसे भूमि के चयन से लेकर, उसकी शुद्धता का परीक्षण करने और फिर ‘सूत्र’ का उपयोग करके पूरी संरचना की नींव को जमीन पर उतारने में महारत हासिल थी।
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टीम लीडर और प्रबंधक: सूत्रधार विभिन्न कारीगरों और शिल्पकारों की एक टीम का नेतृत्व करता था। इस टीम में तक्षक (लकड़ी का काम करने वाला), वर्धकि (बढ़ई और चित्रकार), और अन्य पत्थर तराशने वाले और मजदूर शामिल होते थे। वह इन सभी के बीच समन्वय स्थापित करता था और यह सुनिश्चित करता था कि निर्माण कार्य योजना के अनुसार हो।
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कलात्मक निर्देशक: वह केवल तकनीकी प्रमुख ही नहीं, बल्कि कलात्मक निर्देशक भी था। मूर्तियों और नक्काशी का विषय क्या होगा, उनका स्थान कहाँ होगा, और उनका कलात्मक स्वरूप कैसा होगा, यह सब सूत्रधार के निर्देशन में ही तय होता था।
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नैतिक और सैद्धांतिक ज्ञान: एक अच्छे सूत्रधार से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह ईमानदार, मेहनती, अपने काम के प्रति समर्पित और ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त हो। उसे अपने अधीन काम करने वाले कारीगरों के प्रति स्नेही और देखभाल करने वाला होना चाहिए ।
नाट्यशास्त्र में सूत्रधार : वास्तु के अतिरिक्त, भरत मुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में भी सूत्रधार की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख है। यहाँ सूत्रधार नाटक का निर्देशक, प्रबंधक और मुख्य अभिनेता होता है जो दर्शकों से नाटक का परिचय कराता है और पूरे मंच प्रदर्शन का संचालन करता है । दरअसल उसकी यह भूमिका भी वास्तु के सूत्रधार की तरह ही नेतृत्व और समन्वय की है, जो दर्शाती है कि ‘सूत्रधार’ भारतीय परंपरा में किसी भी रचनात्मक परियोजना का मुख्य संचालक होता था।
निष्कर्षतः, भारतीय कला और वास्तु वाङ्मय में सूत्रधार एक दूरदर्शी वास्तुकार, एक कुशल इंजीनियर, एक सक्षम परियोजना प्रबंधक और एक कलात्मक निर्देशक का एकीकरण है। वह ज्ञान और क्रिया के बीच का ऐसा सेतु होता है, जो सैद्धांतिक योजनाओं को एक भौतिक और कलात्मक यथार्थ में बदल देता है। प्राचीन भारत के भव्य मंदिरों और वास्तुशिल्प के अजूबों का श्रेय इन गुमनाम लेकिन प्रतिभाशाली सूत्रधारों को ही जाता है।
_सुमन कुमार सिंह
