भारतीय वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला परंपरा में समरांगण सूत्रधार (Samarāṅgaṇa Sūtradhāra) एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना परमार वंश के प्रतापी राजा भोजराज (11वीं शताब्दी) ने की थी। यह ग्रंथ न केवल वास्तुशास्त्र का उत्कृष्ट दार्शनिक और तकनीकी ग्रंथ है, बल्कि इसमें चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य, यंत्रविद्या, मुद्रा विज्ञान आदि ललित कलाओं की विस्तृत व्याख्या भी मिलती है। समरांगण सूत्रधार की रचना संस्कृत में हुई है और यह लगभग 83 अध्यायों में विभाजित है, जिसमें 7500 से अधिक श्लोक हैं।
यह आलेख समरांगण सूत्रधार में कला की व्याख्या को विशेष रूप से चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य और यंत्रविद्या के आलोक में विश्लेषित करता है।
समरांगण सूत्रधार: रचनात्मक संदर्भ : राजा भोज बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे — वे राजा, दार्शनिक, कवि, शास्त्रज्ञ और कला के महान संरक्षक थे। उन्होंने सरस्वतीकंठाभरणम्, राजमार्तण्ड, भोजप्रबन्ध, युक्तिकल्पतरु, और समरांगण सूत्रधार जैसे ग्रंथों की रचना की। ‘समरांगण सूत्रधार’ में वे न केवल एक वास्तुविद् की दृष्टि से बल्कि एक सौंदर्यशास्त्री और तांत्रिक साधक की दृष्टि से भी कला को परिभाषित करते हैं।
कला का व्यापक दृष्टिकोण : समरांगण सूत्रधार में कला को केवल एक दृश्य माध्यम या सजावटी परंपरा नहीं माना गया, बल्कि उसे धर्म, ब्रह्मज्ञान, यंत्रविज्ञान और लौकिक-परलौकिक जीवन के साधन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
“सर्वशिल्पं मयोज्ज्ञं तन्मूलं ललितं कला।”
अर्थात समस्त शिल्प-परंपराओं की मूलभूत शक्ति ललित कला में है I उपरोक्त उद्धरण यह स्पष्ट करता है कि कला केवल तकनीक नहीं, लालित्य, संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता का समुच्चय है।
स्थापत्य और वास्तु-कला: समरांगण सूत्रधार का मूल केंद्र वास्तुकला है। इसमें नगर-रचना, मंदिर-निर्माण, गृह-योजना, प्रवेशद्वार, स्तंभ, वेदी, मंडप, रथ आदि के निर्माण की विस्तृत वैज्ञानिक और शास्त्रीय प्रणाली दी गई है।
प्रमुख स्थापत्य सिद्धांत:
- मंडल योजना (grid-based planning): समरांगण में वास्तु-निर्माण हेतु मंडल या योजनाचक्र का प्रयोग बताया गया है।
- आयामों की शुद्धि: ऊंचाई, चौड़ाई, गहराई आदि में अनुपात (प्रमाण) का विशेष महत्व है।
- दिशा और पर्यावरण: उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम की दिशा के अनुरूप वास्तु और मूर्ति की स्थापना के निर्देश।
भोज की स्थापत्य कला में ‘रूप-गंभीरता’ और ‘ध्वनि-संवेदन’ का समन्वय भी मिलता है।
चित्रकला: रेखा, भाव और रस की साधना : समरांगण सूत्रधार के कुछ अध्यायों में चित्रकला का विशेष उल्लेख है। भोज चित्र को केवल ‘रूप की अनुकृति’ नहीं, बल्कि प्रभा-युक्त सजीव प्रस्तुति मानते हैं।
चित्र के तत्व:
- रेखा (Line) — चित्र की आत्मा।
- वर्ण (Colour) — रस-संवेदन का आधार।
- रूप (Form) — विषय की स्पष्टता।
- भाव (Emotion) — चित्र का जीवन।
- प्रसंग (Context) — चित्र का उद्देश्य।
भोज के अनुसार: “रेखा संजीवनीया चित्रस्य जीवधारिका।” यानी रेखा चित्र की प्राणवायु है I
चित्रों में देवचित्र, गृहचित्र, नृचित्र, प्राकृतिक चित्र, और रूपक चित्र का उल्लेख किया गया है। रंगों के लिए भोज ने वनस्पति, खनिज और जीव से प्राप्त प्राकृतिक रंगों को सर्वोत्तम माना है।
मूर्तिकला: प्रतिमा-विज्ञान और प्रतीकवाद : समरांगण सूत्रधार में मूर्तिकला का गहन दार्शनिक और तकनीकी वर्णन है। यह स्पष्ट किया गया है कि मूर्ति केवल पत्थर की आकृति नहीं, चैतन्य और तत्त्व की अभिव्यक्ति है।
मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया:
- आकार योजना: मुद्रा, आयुध, आसन, और अभिव्यक्ति।
- शिल्पकार की योग्यता: तप, ध्यान, रेखा ज्ञान, आभा-बोध।
- प्रतिष्ठा पूर्व अनुष्ठान: मूर्ति निर्माण के पूर्व विशेष काल और दिशा की गणना।
- रस-आधारित अभिव्यक्ति: श्रृंगार, करुण, रौद्र, शांत आदि रसों को मूर्ति में व्यक्त करना।
भोज के अनुसार, यदि मूर्ति में भाव नहीं है, तो वह जड़ पत्थर के अतिरिक्त कुछ नहीं।
यंत्रविद्या और यांत्रिक कला: समरांगण सूत्रधार का एक अत्यंत अद्भुत पक्ष है — यंत्रों का वर्णन। इसमें स्वचालित मूर्तियाँ, चलने-फिरने वाले रथ, विमान, यंत्रमानव आदि का वर्णन मिलता है।
कुछ उल्लेखनीय यंत्र:
- चलद्वीप यंत्र — जल पर तैरता हुआ कृत्रिम द्वीप
- नृत्य यंत्रिका — यंत्र के सहारे चलने वाली नर्तकी की मूर्ति
- स्वयंभू दीप — स्वयं जलने और बुझने वाला दीप
- स्वचालित द्वार — यंत्र से खुलने-बंद होने वाला दरवाजा
यह हमें यह समझने में सहायता करता है कि भोज की कला दृष्टि केवल धार्मिक या अलंकारिक नहीं थी, बल्कि उसमें यांत्रिक और वैज्ञानिक कल्पना भी अंतर्निहित थी।
मुद्रा और अभिनय कला : भोज ने नाट्यशास्त्र की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ‘मुद्रा’ को कला का केंद्रीय तत्व माना। हाथ, नेत्र, ग्रीवा, भृकुटि, अधर आदि की मुद्राएँ न केवल नाट्य, बल्कि चित्र और मूर्ति में भी भाव-संप्रेषण का माध्यम हैं। उदाहरण:
- पतितांजलि मुद्रा → करुण रस
- त्रिभंगी मुद्रा → श्रृंगार रस
- अर्धनारी मुद्रा → समत्व भाव
समरांगण सूत्रधार और समकालीनता : समरांगण सूत्रधार की दृष्टि भारतीय कला के समग्र दर्शन की प्रतीक है। यह न केवल एक स्थापत्य-ग्रंथ है, बल्कि उसमें इंटरडिसिप्लिनरी दृष्टिकोण स्पष्ट है — चित्र, मूर्ति, वास्तु, यंत्र, संगीत और नाट्य सभी कलाएँ एक सूत्र में बंधी हैं। आधुनिक संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता:
- परंपरागत डिज़ाइन और टिकाऊ निर्माण के लिए इसकी स्थापत्य योजनाएँ उपयोगी हैं।
- लोक और मंदिर चित्रकला में वर्णित रंग-मूल्य आज भी प्रयुक्त होते हैं।
- स्मार्ट यंत्र और ऑटोमेशन की कल्पना का पूर्वरूप यंत्रविद्या में मिलता है।
समरांगण सूत्रधार भारतीय कला परंपरा का एक अद्वितीय ग्रंथ है जो कला को शिल्प, दर्शन, विज्ञान और अध्यात्म से जोड़ता है। भोज की दृष्टि में कला केवल सौंदर्य का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन का शुद्धिकरण है। यह ग्रंथ हमें याद दिलाता है कि भारतीय कला परंपरा केवल “दर्शनीय” नहीं थी, बल्कि वह “अनुभवनीय” और “उपयोगी” भी थी।
स्रोत: chatgpt
