भारतीय पौराणिक ग्रंथों में चित्रकला: एक सांस्कृतिक और सौंदर्यशास्त्रीय अनुशीलन

भारतीय संस्कृति में चित्रकला केवल एक दृश्य कला नहीं है, बल्कि यह धर्म, दर्शन, आध्यात्म और समाज की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है। भारत के पौराणिक ग्रंथों — जैसे वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण और विशिष्ट ग्रंथ चित्रसूत्र, विष्णु धर्मोत्तर पुराण, सामराङ्गण सूत्रधार आदि में चित्रकला के वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि इस कला को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त था। इन ग्रंथों में चित्रकला के शास्त्र, उसकी विधियाँ, उसका धार्मिक-सांस्कृतिक महत्त्व तथा उसकी सामाजिक भूमिका पर गहन चर्चा की गई है।

वेदों और उपनिषदों में कला की भूमिका: यद्यपि ऋग्वेद और अन्य संहिताएँ मुख्यतः यज्ञ और ब्रह्मविद्या पर केंद्रित हैं, फिर भी उनमें “चित्र” शब्द और “चित्रकार” के रूप में रचनात्मकता की चर्चा मिलती है। ऋग्वेद में “विश्वकर्मा” को सृष्टि का चित्रकार कहा गया है —

“विश्वकर्माणं समवर्तयेत”,
अर्थात वह परम देवता है जो ब्रह्मांड रूपी चित्र को रचता है। उपनिषदों में आत्मा की सृजनात्मक कल्पना, रूप, रंग और दृष्टि से संबंधित उपमाएँ दी गई हैं, जो चित्रकला के दार्शनिक आयामों की ओर संकेत करती हैं।

रामायण और महाभारत में चित्रकला: रामायण में अनेक स्थलों पर दीवार चित्रों (भित्तिचित्र) का वर्णन मिलता है। सीता-स्वयंवर का दृश्य, अयोध्या के महलों के चित्रण तथा विभिन्न देवी-देवताओं की छवियों का उल्लेख इन चित्रों की सामाजिक उपस्थिति को दर्शाता है। वहीँ महाभारत में चित्रकला का प्रयोग शिक्षा और अभिव्यक्ति के साधन के रूप में हुआ है। द्रौपदी स्वयंवर का वर्णन, मायसभा की चित्र-युक्त दीवारें, तथा अर्जुन और कृष्ण द्वारा रची गई रूपात्मकता इस कला की श्रेष्ठता को प्रमाणित करती है।

 पुराणों में चित्रकला: अग्नि पुराण, वायुपुराण, गरुड़ पुराण, लिंग पुराण आदि में मूर्ति एवं चित्रकला की विस्तृत विधियाँ दी गई हैं। विशेषतः विष्णु धर्मोत्तर पुराण में “चित्रसूत्र” नामक अध्याय में चित्रकला को “दिव्य विद्या” कहा गया है। इसमें चित्र के लक्षण, भाव-भंगिमा, रंग-नियोजन, पृष्ठभूमि, छाया-प्रकाश, अनुपात आदि का अत्यंत वैज्ञानिक और सौंदर्यशास्त्रीय ढंग से वर्णन किया गया है। यह ग्रंथ बताता है कि कलाकार को शास्त्र, दृष्टि, श्रवण, कल्पना और साधना में पारंगत होना चाहिए।

उदाहरण –
“चित्रं धर्मार्थ काम मोक्षानामुपदेशकम्”
अर्थात चित्र केवल सजावटी कला नहीं, अपितु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेश का साधन भी है।

सामराङ्गण सूत्रधार और वास्तुशास्त्रों में चित्रकला: राजा भोज रचित सामराङ्गण सूत्रधार एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो स्थापत्य, मूर्तिकला और चित्रकला का समन्वित ग्रंथ है। इसके विशेष अध्यायों में चित्रकला के 64 लक्षण, भंगिमा विज्ञान, रंग योजना, नायिका भेद, भूमि पर चित्रांकन की विधियाँ, मंदिरों में चित्रों का नियोजन, तथा दिव्य और लौकिक चित्रण के भेदों का उल्लेख मिलता है।

चित्रसूत्र: शास्त्रीय चित्रकला का बुनियादी ग्रंथ: “चित्रसूत्र”, जिसे कभी-कभी “शिल्पसूत्र” का भाग माना जाता है, में चित्र के छह लक्षण वर्णित हैं —

  1. रूपभेद: आकृति का विविधता से निर्माण।

  2. प्रमाण: अंगों के अनुपात की वैज्ञानिकता।

  3. भाव: चरित्र के अंतर्मन की अभिव्यक्ति।

  4. लावण्ययोजना: चित्र में सौंदर्य योजना।

  5. सादृश्य: यथार्थता और सजीवता।

  6. वर्णिकाभंग: रंगों का संयोजन और छाया-प्रकाश।

यह षडंग सिद्धांत भारतीय चित्रकला के आधारभूत नियम हैं और इनका प्रभाव आगे की सभी परंपराओं पर पड़ा — जैसे अजंता-एलोरा की भित्तिचित्र परंपरा, पाल कालीन पांडुलिपि चित्र, और राजस्थान-मुगल-राजकीय चित्रशैली।

धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण: भारतीय समाज में चित्रकला केवल सौंदर्य या मनोरंजन नहीं थी, बल्कि यह धर्म का अभिन्न अंग थी। मंदिरों की दीवारों पर देवी-देवताओं के चित्र, उपाख्यानों का दृश्यांकन, और ध्यान-साधना के लिए बनाई गई यंत्र-चित्र, मण्डल आदि इस बात के प्रमाण हैं कि चित्रकला आत्मानुभूति और ब्रह्मानुभूति का भी माध्यम थी।

जैसे – तंत्र परंपरा में “श्रीचक्र” या “मण्डल” ध्यान के साधन हैं, जो चित्रकला के अत्यंत विकसित रूप हैं।

लोककला और पौराणिक प्रभाव: पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथाएँ आज भी मधुबनी, पटचित्र, वारली, कलमकारी, पट्टचित्र, कांगड़ा, बावन बुटी आदि लोक चित्रकलाओं का आधार हैं। इन चित्रों में रामायण, महाभारत, भागवत आदि की कथाएँ चित्रित होती हैं, जो यह दर्शाती हैं कि पौराणिक ग्रंथों की छवियाँ जनमानस और ग्रामीण संस्कृति में कितनी गहराई से रची-बसी हैं।

चित्रकला और सौंदर्यदर्शन: भारतीय चित्रकला में ‘रस’ और ‘ध्वनि’ का उपयोग केवल साहित्य तक सीमित नहीं है। चित्रकला में भाव और रसों की अभिव्यक्ति को भी अनिवार्य तत्व माना गया है। उदाहरणतः — “श्रृंगार रस” को नायिका भंगिमा के चित्रण में, “वीर रस” को युद्ध दृश्यों में, और “शांत रस” को तपस्वी या योगी चित्रण में व्यक्त किया गया।

वस्तुतः भारतीय पौराणिक ग्रंथों में चित्रकला केवल एक दृश्य कला नहीं, बल्कि एक दार्शनिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक साधना रही है। यह धर्म, इतिहास, समाज और भावजगत का दृश्य रूपांतरण है। इन ग्रंथों से यह भी स्पष्ट होता है कि चित्रकला को केवल ‘हाथ की कला’ नहीं, बल्कि ‘मन की साधना’ के रूप में देखा गया। पौराणिक ग्रंथों का यह चित्रात्मक लोक आज भी भारतीय कला परंपरा की आत्मा बना हुआ है।

यहाँ भारतीय पौराणिक ग्रंथों में चित्रकला से संबंधित प्रमुख संस्कृत श्लोकों का एक संकलन प्रस्तुत है, उनके संदर्भ, पदच्छेद, हिन्दी अनुवाद और सौंदर्यशास्त्रीय विश्लेषण सहित। यह संग्रह विष्णु धर्मोत्तर पुराण, सामराङ्गण सूत्रधार, और चित्रसूत्र जैसे ग्रंथों से लिया गया है।

विष्णु धर्मोत्तर पुराण (चित्रसूत्र) से — षडंग सूत्र

श्लोक:

“रूपभेदः प्रमाणं च भावः लावण्ययोजना।
सादृश्यं वर्णिकाभंग इत्येतानि चित्रशास्त्रकम्॥”

पदच्छेद: रूपभेदः + प्रमाणम् + च + भावः + लावण्य-योजना + सादृश्यम् + वर्णिका-भंगः + इति + एतानि + चित्र-शास्त्र-कम्।

हिन्दी अनुवाद: रूप भेद, अंगों का अनुपात, भाव की अभिव्यक्ति, सौंदर्य की योजना, सादृश्य और रंग-रेखा का संयोजन — ये छह चित्रकला के अंग माने गए हैं।

विश्लेषण: यह चित्रकला के “षडंग” सिद्धांत का मूल श्लोक है, जो भारतीय चित्रकला के लिए वही स्थान रखता है जो “रस सिद्धांत” काव्य के लिए। इसमें चित्र को केवल सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि सजीव अभिव्यक्ति के रूप में समझा गया है।

समराङ्गण सूत्रधार से — चित्र के गुण

श्लोक:

“यथा रूपं तथा चित्रं, यथा चित्रं तथा पुनः।
चित्रकारस्य चित्तं स्यात्, तन्मात्रं सादृशं भवेत्॥”

हिन्दी अनुवाद: जैसा रूप होता है, वैसा चित्र बनता है; और जैसा चित्र बनता है, वैसा ही चित्रकार का चित्त होता है। चित्र वस्तुतः कलाकार के मन का प्रतिबिंब है।

विश्लेषण: यह श्लोक चित्रकला को एक मनोवैज्ञानिक और आत्मबोध की क्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। कलाकार के अंतर्मन की संवेदना चित्र में प्रतिबिंबित होती है — यह विचार आधुनिक कला सिद्धांतों से भी मेल खाता है।

विष्णु धर्मोत्तर पुराण – चित्र की सामाजिक उपयोगिता

श्लोक:

“चित्रं धर्मार्थकामानां साधनं मोक्षहेतुकम्।
यः पश्यति स विज्ञेयो नान्यथा तत्वदर्शिनः॥”

हिन्दी अनुवाद: चित्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन है। जो उसे इस दृष्टि से देखता है, वही तत्वदर्शी कहा जा सकता है।

विश्लेषण: यहाँ चित्रकला को ‘चतुर्वर्ग’ की पूर्ति का साधन बताया गया है, जो उसे एक पवित्र, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्रिया बनाता है। यह विचार लोक चित्रकला और मंदिर चित्रों में स्पष्ट दिखता है।

चित्रसूत्र से – चित्रकार की योग्यता

श्लोक:

“शास्त्रज्ञः कलावान् दृष्टिमान् श्रुतिसंयुतः।
कल्पनायुक्तचित्तः स्यात् चित्रकारः प्रयत्नतः॥”

हिन्दी अनुवाद: एक उत्तम चित्रकार वह होता है जो शास्त्रों को जानता हो, कला-कौशल में निपुण हो, दृष्टि सम्पन्न हो, श्रुति से संपन्न हो और कल्पनाशील चित्त वाला हो।

विश्लेषण: यहाँ चित्रकार की योग्यताओं को बहुआयामी बताया गया है — वह केवल तकनीकी दक्ष नहीं, बल्कि शास्त्र, दर्शन और कल्पना में भी पारंगत होना चाहिए।

ललितोपाख्यान (महाभारत में) – चित्र और लावण्य

श्लोक:

“चित्रं तु सौंदर्यसारं विभाति,
भावैः सहितं लावण्ययुक्तम्।”

हिन्दी अनुवाद: चित्र सौंदर्य का सार होता है; जब उसमें भाव समाहित हो और लावण्य हो, तब वह दीप्तिमान् होता है।

विश्लेषण: यह श्लोक सौंदर्य और भाव की समन्वित उपस्थिति को चित्र की आत्मा मानता है। यह “भावात्मक यथार्थ” की अवधारणा का समर्थन करता है।

शिल्पशास्त्र से – यंत्र और मण्डल

श्लोक:

“मण्डलं ध्यानहेतुष्च, चित्रं ब्रह्मस्वरूपकम्।
यत्र दृष्टे मनः शान्तं, सः चित्रकर्मणः फलम्॥”

हिन्दी अनुवाद: मण्डल ध्यान का साधन है, और चित्र ब्रह्म का स्वरूप है। जब किसी चित्र को देखकर मन शांत हो जाए, वही चित्रकला का सर्वोत्तम फल है।

विश्लेषण: यह चित्र को ‘आत्मिक अनुशासन’ और ‘ध्यान-साधना’ का साधन मानता है। इस अवधारणा का प्रयोग तंत्र, बौद्ध और जैन चित्रकला में अत्यंत विकसित रूप में मिलता है।

प्रस्तुति : सुमन कुमार सिंह 

आवरण चित्र google AI से

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