भारतीय कला परंपरा में पुराणों का एक विशिष्ट स्थान रहा है। जहां एक ओर ये ग्रंथ धार्मिक आख्यानों और नैतिक शिक्षाओं के वाहक हैं, वहीं दूसरी ओर इनमें वास्तु, संगीत, नाट्य और चित्रकला जैसे ललित कलाओं का भी गूढ़ वर्णन मिलता है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण, जो कि एक उपपुराण है, में चित्रकला को लेकर अत्यंत महत्वपूर्ण चित्रसूत्र का उल्लेख मिलता है। यह न केवल भारतीय चित्रकला की तकनीकी और सौंदर्यशास्त्रीय परंपरा को दर्शाता है, बल्कि इसे एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक साधना के रूप में भी प्रस्तुत करता है। यह लेख विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वर्णित चित्रसूत्र के प्रमुख पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
चित्रकला का दार्शनिक आधार: विष्णु धर्मोत्तर पुराण में चित्रकला को सृष्टि के समान माना गया है। इसमें कहा गया है कि जैसे ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, वैसे ही चित्रकार भी अपनी कल्पना और कौशल से एक नयी सृष्टि की रचना करता है। चित्र न केवल दृश्य जगत की पुनर्रचना है, बल्कि वह आत्मा, भाव और विचार का भी प्रतिरूप है। इस ग्रंथ में कहा गया है:
“चित्रं भवति धर्मज्ञं, साक्षात् ब्रह्मरूपधृक्”
(चित्र धर्म को जानने वाला होता है और स्वयं ब्रह्म के समान होता है।)
इससे स्पष्ट होता है कि चित्रकला केवल सजावटी या यांत्रिक कार्य नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मा की रचना-शक्ति का अनुकरण है — एक प्रकार की सृजनात्मक तपस्या।
चित्रकला का उद्देश्य: चित्रसूत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि चित्रकला का उद्देश्य केवल सौंदर्य नहीं, अपितु श्रद्धा, भक्ति, और धर्म की अभिव्यक्ति है। धार्मिक ग्रंथों, देवताओं, ऋषियों, पौराणिक प्रसंगों, और नैतिक आदर्शों को चित्रों के माध्यम से दृश्य रूप देना, लोगों में श्रद्धा और नीति-बोध जगाना इसका प्रमुख कार्य है। अतः चित्रकला को एक धार्मिक अनुशासन माना गया।
चित्रकार की योग्यता और प्रशिक्षण : विष्णु धर्मोत्तर पुराण में चित्रकार की योग्यताओं का बड़ा विस्तृत वर्णन है। कहा गया है कि एक चित्रकार में निम्न गुण आवश्यक हैं:
- रेखा का ज्ञान (रेखाज्ञानम्)
- अनुपात और सममिति की समझ (प्रमाणज्ञानम्)
- रंगों की संगति और भिन्नता की पहचान
- प्राकृतिक पर्यवेक्षण की क्षमता
- मनोविज्ञान और भावों की अभिव्यक्ति का कौशल
चित्रकार को संगीत, नाट्य, व्याकरण, गणित और यौगिक साधना में भी प्रशिक्षित होना चाहिए, क्योंकि ये सब कलाएँ चित्रकला को समृद्ध करती हैं।
चित्र के प्रकार: चित्रसूत्र में चित्रों को उनके विषय और तकनीक के अनुसार विभाजित किया गया है। प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं:
- देवचित्र: देवताओं और धार्मिक प्रसंगों के चित्र
- गृहचित्र: दीवारों, खंभों और आंतरिक सज्जा हेतु चित्र
- नृचित्र: मनुष्यों की गतिविधियों और घटनाओं पर आधारित चित्र
- मृगचित्र: पशु-पक्षियों और वन्य जीवन से संबंधित चित्र
- आकृति चित्र: अलंकारिक या प्रतीकात्मक चित्र जैसे यक्ष, गंधर्व, नाग आदि
प्रत्येक चित्र की विषयवस्तु, भाव, रंग और रचना में विशिष्ट नियम निर्धारित किए गए हैं।
चित्र निर्माण की प्रक्रिया : विष्णु धर्मोत्तर पुराण में चित्र निर्माण के लिए चरणबद्ध विधि बताई गई है:
- भूमि की तैयारी: चित्र हेतु दीवार, कपड़ा, ताम्रपत्र आदि सतह को विशेष विधि से तैयार किया जाता है।
- रेखांकन (रेखाचित्र): पहले कोयले या सिन्दूर से रेखाचित्र बनाया जाता है।
- रंग भरना: रंगों को विशेष रसों, जड़ी-बूटियों और खनिजों से तैयार किया जाता है।
- श्रृंगार और विवरण: चित्र में वस्त्र, आभूषण, भाव, मुद्रा आदि का सूक्ष्म विवरण दिया जाता है।
- पूजन और अनुष्ठान: चित्र निर्माण से पूर्व और पश्चात् देवताओं का आह्वान कर चित्रकला को एक यज्ञ के रूप में सम्पन्न किया जाता है।
रंगों का महत्व और मनोविज्ञान: विष्णु धर्मोत्तर पुराण में रंगों के प्रतीकात्मक अर्थ दिए गए हैं:
- श्वेत – शांति और ज्ञान
- लाल – शक्ति और ऊर्जा
- नीला – आकाश और अनंतता
- पीला – बुद्धि और उर्वरता
- काला – रहस्य और मृत्यु
रंगों का चयन पात्र के स्वभाव, भाव, और संदर्भ के अनुरूप किया जाना चाहिए। उदाहरणस्वरूप, विष्णु को श्यामवर्ण में और लक्ष्मी को गौर वर्ण में चित्रित करना उपयुक्त माना गया।
चित्र में भाव और रस की प्रस्तुति: चित्रकला को रस सिद्धांत से भी जोड़ा गया है। प्रत्येक चित्र में नव रसों — श्रृंगार, वीर, करुण, हास्य, रौद्र, अद्भुत, भयानक, वीभत्स, शांत — का प्रयोग किया जा सकता है। विशेष ध्यान दिया जाता है कि चित्र केवल आकृति नहीं, अपितु भावनाओं का प्रतीक हो। उदाहरणतः – राधा-कृष्ण के चित्र में श्रृंगार और शांत रस का समन्वय होता है।
स्थान और दिशा के नियम : चित्रसूत्र में दिशाओं का विशेष महत्व बताया गया है। उत्तर दिशा में विष्णु, पूर्व में इंद्र, दक्षिण में यम, और पश्चिम में वरुण के चित्र बनाए जाने चाहिए। घर या मंदिर में चित्रों को इस दिशा-ज्ञान के अनुसार ही स्थापित करने से शुभफल की प्राप्ति होती है।
समय और काल-विधान: चित्र निर्माण के लिए उचित मास, तिथि, नक्षत्र आदि की गणना की जाती है। कुछ विशेष पर्वों पर बनाए गए चित्र विशेष फलदायक माने गए हैं। साथ ही, चित्र निर्माण में ‘शुभ मुहूर्त’ और ‘प्राण प्रतिष्ठा’ जैसे वैदिक अनुष्ठानों का समावेश चित्रकला को धार्मिक अनुष्ठान बना देता है।
चित्र और मोक्ष संबंध: अंततः, चित्रकला को केवल लौकिक अभिव्यक्ति नहीं, अपितु आत्मा की मुक्ति का एक साधन माना गया है। एक उत्तम चित्र, जो सच्चे भाव, उचित शिल्प और धर्मपूर्ण उद्देश्य से बना हो, दर्शक के अंतःकरण को छूता है और उसे आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वर्णित चित्रसूत्र न केवल भारत की प्राचीन चित्रकला परंपरा का आद्यदस्तावेज है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक दृष्टिकोण को भी उजागर करता है जिसमें कला जीवन से, धर्म से और अध्यात्म से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। आज जब हम भारतीय कला के आधुनिक स्वरूपों की बात करते हैं, तब इन प्राचीन सूत्रों की ओर लौटना हमारी सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध कर सकता है।
“चित्रसूत्र का सार-संक्षेप, विश्लेषणात्मक विवेचन एवं आधुनिक भारतीय चित्रकला से तुलनात्मक संबंध”
चित्रसूत्र की मुख्य बातें:
- चित्रकला की परिभाषा: सृष्टि के समान रचना; ब्रह्मा के कार्य की मानवीय पुनरावृत्ति।
- चित्र का उद्देश्य: धार्मिक, नैतिक और आध्यात्मिक संप्रेषण।
- चित्रकार की योग्यता: रेखा, रंग, भाव, अनुपात और संगीत-नाट्य में प्रवीणता।
- चित्र निर्माण प्रक्रिया: भूमि तैयार करना → रेखांकन → रंग → विवरण → पूजन।
- रंग और रस: प्रतीकात्मक रंग-व्यवस्था और नव रसों की चित्रात्मक अभिव्यक्ति।
- दिशा, स्थान और काल: दिशाओं, ऋतुओं और तिथियों का महत्व।
- आध्यात्मिक लक्ष्य: चित्रकला को मोक्ष का माध्यम मानना।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
कलावाद की दृष्टि से: चित्रसूत्र कला को केवल रूपाकार नहीं, भाव और धर्म से युक्त जीवंत प्रतीक मानता है। इसमें “आर्ट फॉर लाइफ” (जीवन हेतु कला) की संकल्पना विद्यमान है, जो पश्चिमी “Art for Art’s Sake” से भिन्न है।
सौंदर्यशास्त्रीय विश्लेषण:
- रूप-लावण्य से अधिक भाव-गंभीरता: चित्र में भंगिमा, मुद्राएँ, दृष्टि, रंग का मेल, और भाव का यथार्थ चित्रण अधिक महत्त्वपूर्ण है।
- सामंजस्य (Harmony): अनुपात (प्रमाण), लय और रंग संयोजन में सौंदर्य का मूल तत्व है।
धार्मिक-आध्यात्मिक विमर्श: चित्रसूत्र चित्रकला को यज्ञोपम प्रक्रिया मानता है — आरंभ में शुद्धि, मध्य में एकाग्रता, अंत में देवपूजन। यह कलात्मक क्रिया को आध्यात्मिक अनुशासन बनाता है।
आधुनिक भारतीय चित्रकला से तुलनात्मक संबंध
नंदलाल बोस, अवनींद्रनाथ टैगोर और शांतिनिकेतन की परंपरा : इन कलाकारों ने परंपरागत चित्रसूत्र की भावनाओं को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ा —
- नंदलाल बोस की ‘सती’ या ‘श्रृंगार’ शृंखला में भावाभिव्यक्ति और रेखा पर विशेष बल।
- अवनींद्रनाथ के चित्रों में नव-रस और प्रतीकात्मक रंग योजना का प्रयोग — यह चित्रसूत्र से प्रेरित दृष्टिकोण था।
जे. स्वामीनाथन और आदिवासी चित्रकला : स्वामीनाथन ने गोंड, भील, और वारली कलाकारों को “शुद्ध दृष्टि” (pristine vision) कह कर उनके कार्य को चित्रसूत्रीय स्वभाव से जोड़ा।
- इनके चित्रों में भी विशिष्ट रंग-प्रतीक, प्रकृति से भावमूलक संबंध, और मिथकीय दृष्टिकोण दिखते हैं।
प्रिंट और इंस्टॉलेशन आर्ट में चित्रसूत्र की छाया: हाल के वर्षों में कई समकालीन कलाकार (जैसे सेतु अरोड़ा या मनोज कुलकर्णी) अपने कार्यों में रंगों के प्रतीकवाद, आध्यात्मिक प्रतीकों, और अनुष्ठानिक प्रक्रिया का प्रयोग कर रहे हैं — जो चित्रसूत्रीय परंपरा के समकालीन पुनर्पाठ हैं।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण का चित्रसूत्र भारतीय चित्रकला की परंपरा में एक ऐसा शास्त्र है जो कला को न केवल तकनीक बल्कि चेतना, धर्म और आध्यात्मिकता से जोड़ता है। आधुनिक भारतीय कला के कई पहलुओं में, चाहे वह शांतिनिकेतन की परंपरा हो या समकालीन लोक-अधारित प्रयोग, इस चित्रसूत्र की छायाएँ स्पष्ट रूप से दिखती हैं। यह हमें सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या आज की कला-प्रशिक्षण प्रणाली, जिसमें पश्चिमी दृष्टिकोण प्रमुख है, को भारतीय चित्रसूत्र जैसे स्रोतों से पुनः जोड़ना चाहिए?
स्रोत :chatgpt
