मिथिला की तंत्र शैली पर पालकालीन चित्रशैली का प्रभाव

मिथिला चित्रकला पर पालकालीन चित्र शैली का प्रभाव है या नहीं ? इस सवाल का जवाब थोड़ा मुश्किल लग रहा है I खासकर कला इतिहास के पन्नों में जब तक कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हो I किन्तु इतिहास के पन्नों से जो कुछ संकेत मिलते हैं उसके आधार पर, एक सवाल जो बनता है वह यह कि मिथिला के कर्नाट और सेन वंशीय शासक बौद्ध और हिन्दू किस धर्म के अनुयायी थे ? इस बात पर विचार करने से जो तथ्य सामने आते हैं, वे इस प्रकार हैं – कर्नाट वंश का शासनकाल इस क्षेत्र में 12वीं–14वीं शताब्दी तक रहा है, विवरण मिलता है कि ये कर्नाट शासक मूलतः दक्षिण भारत (कर्नाटक क्षेत्र) से आए थे और मिथिला में स्थापित हुए। उन्होंने हिंदू परंपरा, विशेषकर वैष्णव और शैव संप्रदाय को संरक्षण दिया। परन्तु, चूँकि उस समय मिथिला पाल-कालीन परंपरा (जहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव गहरा था) से गुज़र चुका था, इसलिए बौद्ध कला, शिक्षण संस्थान और लोक-परंपराओं का प्रभाव इन शासकों के समय भी देखा जाता है। अतः कह सकते हैं कि यह वंश “मिश्रित धार्मिक सह-अस्तित्व” का उदाहरण था — जिसके शासक तो हिंदू थे लेकिन प्रशासनिक और सांस्कृतिक ढाँचे में बौद्ध विद्वानों व कलाकारों की भागीदारी भी बनी रही।

कर्नाट शासकों से कुछ पहले यानी 11 वीं शताब्दी में इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों में सेन वंश की सत्ता कायम हो चुकी थी जो 13 वीं सदी तक जारी रही I इस दौरान सेन वंशीय शासक बंगाल और मिथिला दोनों क्षेत्रों में सक्रिय रहे। मिथिला और बंगाल के खान-पान से लेकर लोक व्यवहार की किंचित समानता की एक वजह इसे भी माना जाता है I वे कट्टर वैष्णव और शैव परंपरा के पोषक थे। लेकिन इनका काल भी पाल-परंपरा के उत्तरार्ध से जुड़ा था, इसलिए इनकी कला और स्थापत्य में बौद्ध प्रतीकों के अवशेष मिलते हैं। इतना ही नहीं इनके दरबार में कई बौद्ध पंडितों और कवियों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है, हालांकि शाही संरक्षण मुख्यतः हिंदू मठों, मंदिरों और संस्कृत विद्या को मिला।

इस तरह इन दोनों शासकों के धार्मिक नीति का सार यह है कि दोनों वंशों ने हिंदू धर्म को राजधर्म के रूप में मान्यता तो दी, पर बौद्ध धर्म को अस्वीकार नहीं किया। बौद्ध शिक्षा-परंपरा और तांत्रिक प्रवृत्तियाँ इस दौर में भी मिथिला समाज और चित्रकला में गहरी बनी रहीं। यही कारण है कि मिथिला पेंटिंग और तांत्रिक शैली में बौद्ध तत्त्व (मंडल, यंत्र, ध्यानमूर्तियाँ) हिंदू देवी-देवताओं के साथ-साथ दिखाई देते हैं। लब्बोलुआब यह कि मिथिला के कर्नाट और सेन वंशीय शासक औपचारिक रूप से हिंदू परंपरा के अनुयायी तो थे, लेकिन सांस्कृतिक और कलात्मक स्तर पर वे बौद्ध और हिंदू दोनों परंपराओं की मान्यता और सह-अस्तित्व के पक्षधर थे।

पालकालीन पाण्डुलिपि में हरित तारा (स्रोत: metmuseum)

संभवतः इसी वजह से मिथिला चित्रकला की तंत्र शैली और पाल कालीन चित्रकला विशेषकर बौद्ध तांत्रिक पांडुलिपि चित्रण के बीच कई बिंदुओं पर संबंध देखा जा सकता है। हम जानते हैं कि पाल काल (8वीं–12वीं शताब्दी) बौद्ध धर्म (विशेषकर वज्रयान और तांत्रिक बौद्ध मत) का उत्कर्ष काल था। उस समय नालंदा, विक्रमशिला, ओडंतपुरी जैसे महाविहार सक्रिय थे और वहाँ से अष्टमहाभया देवी, तारा, वज्रयोगिनी, मंडल, यंत्र आदि के चित्र पांडुलिपियों में मिलते हैं। मिथिला क्षेत्र भौगोलिक रूप से इन्हीं केंद्रों के समीप था और सांस्कृतिक आदान-प्रदान लगातार होता था। इसलिए पाल काल की चित्रकला और मिथिला की बाद की तंत्र शैली में समानताएँ स्वाभाविक हैं।

ऐसे में जो शैलीगत समानताएँ मिथिला और पालकालीन चित्रों में मिलती हैं, उसे इस तरह से देखा-समझा जा सकता है-

  • प्रतीकवाद: पाल चित्रों में मंडल, ज्यामितीय यंत्र, देवी-देवता के उग्र रूप मिलते हैं। मिथिला तंत्र शैली भी इन्हीं प्रतीकों पर आधारित है।
  • रंग योजना: पाल पांडुलिपियों में गहरा लाल, गेरुआ, काला और सुनहरा रंग प्रमुख थे। तंत्र शैली की मधुबनी पेंटिंग में भी यही रंग शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रतीक बनते हैं।
  • देवी-पूजन परंपरा: पाल कालीन कला में तारा और अन्य महाविद्याओं का चित्रण मिलता है। मिथिला की तंत्र शैली भी दशमहाविद्या और शक्ति-पूजन से प्रभावित है।
  • अलंकरण और सघनता: पाल कला और मिथिला दोनों में चित्र-पृष्ठ को खाली नहीं छोड़ा जाता, अलंकरण भरपूर होता है।
कृष्णानंद झा की कृति “दस महाविद्या” (स्रोत : https://ojasart.com/)

वहीँ कुछ भिन्नताएँ जो स्पष्ट दृष्टिगत हैं, उसे इस प्रकार चिन्हित किया जा सकता है –

  • माध्यम: पाल चित्र मुख्यतः पाम-लीफ और पांडुलिपि पर बने, जबकि मिथिला तंत्र शैली दीवारों, फर्श और बाद में कागज/कपड़े पर बनी।
  • सामाजिक संदर्भ: पाल चित्र राजकीय/बौद्ध मठों द्वारा संरक्षित कला थी, जबकि मिथिला की तंत्र शैली गाँव-समाज और विशेष रूप से स्त्री कलाकारों की परंपरा रही है।
  • लोक बनाम मठ परंपरा: पाल शैली मठों और विद्वानों के लिए थी; मिथिला तंत्र शैली लोक अनुष्ठानों, कोहबर और देवी-पूजन से जुड़ी रही।

ऐसे में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि मिथिला तंत्र शैली पर पाल कालीन चित्रकला का प्रत्यक्ष तो नहीं, पर अप्रत्यक्ष और सांस्कृतिक-धार्मिक प्रभाव निश्चित रूप से रहा है। किन्तु पाल कला ने तांत्रिक देवी-देवताओं, मंडल और यंत्र की जो दृश्य भाषा गढ़ी, उसी की लोकानुकूलित और घरेलू अनुष्ठानिक रूपांतर मिथिला में देखने को मिलता है। इस तरह मिथिला तंत्र शैली को पाल कालीन तांत्रिक कला की लोक परंपरा में निरंतरता और पुनःस्थापन माना जा सकता है।

-सुमन कुमार सिंह

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