आम आदमी को चित्रकला के केंद्र मे लाने वाली शैली है ‘पटना कलम’

अठारहवीं सदी में पटना एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था। इसी दौर में यहाँ जिस विशिष्ट चित्रकला शैली का विकास हुआ, उसे आज हम पटना कलम के नाम से जानते हैं। इस शैली के विकास में ईस्ट इंडिया कम्पनी से जुड़े अधिकारियों और संरक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसके कारण इसे प्रायः कम्पनी शैली का एक विस्तार मान लिया जाता है। किंतु वस्तुतः इस चित्रकला परंपरा की जड़ें कम्पनी शासन से भी पहले, मुग़ल साम्राज्य के अंतिम चरण में दिखाई देती हैं। इसलिए पटना कलम को केवल कम्पनी शैली के परिप्रेक्ष्य में सीमित कर देना इसके व्यापक ऐतिहासिक और कलात्मक महत्व को कम कर देता है। हाल ही में पटना संग्रहालय में इस शैली के चित्रों की एक महत्वपूर्ण और व्यापक प्रदर्शनी आयोजित की गई। इस प्रदर्शनी के बहाने पटना कलम की परंपरा, विकास और विशिष्टताओं पर कला समीक्षक अनीश अंकुर की विस्तृत रिपोर्ट का यह पहला भाग आलेखन डॉट इन के पाठकों के लिए प्रस्तुत है। — संपादक।

Anish Ankur

पटना कलम: एक विरासत  ( भाग -1)

  • पटना संग्रहालय में “पटना कलम” के चित्रों की पहली सार्वजनिक प्रदर्शनी आयोजित 

पिछले दिनों पटना म्यूजियम में पटना कलम के चित्रों की पहली बड़ी सार्वजनिक प्रदर्शनी लगाई गई। 17 दिसंबर से 25 फरवरी तक चली  इस प्रदर्शनी को सही ही नाम दिया गया था ‘पटना कलम: एक विरासत’। यह प्रदर्शनी बिहारवासियों को उस अनूठी और समृद्ध विरासत से परिचित कराती है जिसके बारे अब तक एक सीमित दायरे मे ही जानकारी थी। यदि कुछ थी भी तो इंटरनेट और सोशल मीडिया में कुछ गिनी-चुनी तस्वीरों को देखते रहने की थी।  इस प्रदर्शनी के माध्यम से पटना संग्रहालय ने पटना कलम के चित्रों का बड़ा  खजाना आम लोगों के लिए खोल दिया।  लगभग ढाई महीने चली यह प्रदर्शनी इस मायने में  ऐतिहासिक कही जाएगी कि पटना कलम की इतनी बड़ी सार्वजनिक प्रदर्शनी इससे पहले  कभी नहीं लग पाई थी।

पटना के कलाप्रेमियों को  इस विशिष्ट चित्रकला शैली के चित्रों को एक साथ देखना एक दुर्लभ अनुभव रहा।  इन चित्रों को देखने के लिए  सुधी प्रेक्षकों के अलावा बडी संख्या में आमलोग भी आते रहे और बिहार के इस अनमोल विरासत को विस्फारित नेत्रों से  निहारते देखते  रहे।

भारतीय चित्रकला के इतिहास में पटना कलम का एक अनूठा महत्व रहा है। पटना कलम को ‘कंपनी स्कूल और आर्ट’ या कंपनी शैली भी कहा जाता है क्योंकि ये चित्र  भारत में राज करने वाले ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में और उसके निर्देश पर बनाए गए  माने जाते हैं।  पटना कलम के चित्रों के मुख्य संरक्षक भले ही अंग्रेज रहे हों पर भारतीय चित्रकला  में  इस कारण सबसे अलग  मानी  जाती है कि  पहली बार आमलोगों, सामान्य तबकों से आने वाले लोगों  को कैनवास पर जगह मिली थी।

इस प्रदर्शनी में पटना म्यूजियम के अपने संग्रह के  संरक्षित चित्रों के अतिरिक्त कुछ निजी संग्रहों के चित्र भी शामिल रहे हैं।  जिनमें प्रमुख हैं पटना कलम के चर्चित चित्रकार रहे हुलास लाल ( 1785-1875)  के वंशज श्री संजय कुमार लाल (धनबाद) तथा श्री प्रदीप जैन (पटना)।  ज्ञातव्य हो कि पटना कलम चित्रों के संग्रह लंदन के विक्टोरिया एलबर्ट संग्रहालय,  के अलावा, पटना के खुदाबख्श लाइब्रेरी, कला एवं शिल्प महाविद्यालय और जालान संग्रहालय में मौजूद  है।

‘पटना कलम’ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :

कलकत्ता तथा मुर्शिदाबाद के बाद, पटना ईस्ट इंडिया कंपनी काल का सबसे प्रमुख शहर तो था ही  बंगाल प्रेसीडेंसी का प्रमुख शासकीय केन्द्र भी था। 17 वीं शताब्दी में, अंग्रेजों ने पटना में  कारखाना स्थापित किया, जहाँ से सूत, रेशम, लाह और साल्टपीटर  ( पोटैशियम नाइट्रेट ) का व्यापार किया जाता था। एक कॉमर्शियल सेंटर  के रूप में इसकी अहमियत को देखते हुए पटना का महत्व स्थापित हो चला था।

लगभग इसी वक्त मुगलिया सल्तनत अपने अंत की ओर बढ़ रहा था।  पटना कलम की विकास यात्रा मुगल दरबार से शुरू होती है। मुगल साम्राज्य के उतरार्द्ध में जब वहाँ के कलाकारों को प्रश्रय एवं राजकीय संरक्षण मिलना बंद हो गया, तब उनका पलायन बनारस, मुर्शिदाबाद, अजीमाबाद (पटना) आदि में होने लगा।

मुर्शिदाबाद, नवाबों के संरक्षण में कला-संस्कृति के एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में उभर चुका था। उसी दौर में पटना (जो उस वक्त ‘अजीमाबाद’ के नाम से जाना जाता था) भी उन कलाकारों के आकर्षण का केन्द्र बन चुका था। 1750-60 के आसपास कलाकार इस शहर में विस्थापित होकर आने लगे। इन चित्रकारों ने पटना के लोदी कटरा, मुगलपुरा, दीवान मुहल्ला, मच्छरहट्टा, दानापुर और आरा में बसकर अपनी चित्रकला को क्षेत्रीय रूप में विकसित किया और जिसे ‘पटना कलम’ या ‘पटना शैली’ का नाम दिया गया। 18वीं और 19वीं शताब्दी में पटना कलम भारतीय चित्रकला की एक ऐसी प्रमुख शैली बन चुकी जो बिहार में विकसित हुई थी ।

पटना में तब अंग्रेजों की अच्छी-खासी आबादी बस चुकी थी, जिनमें से कइयों ने भारतीय जीवन के दस्तावेजीकरण (Documentation ) पर ध्यान दिया। इसी जरूरत के मद्देनजर  बड़े पैमाने  पर दस्तावेजीकरण करना शुरू कर किया।

कुछ कला इतिहासकारों का मानना है चूंकि पटना कलम शैली के मौजूदा चित्रों में हमें तत्कालीन प्राकृतिक परिवेश के चित्र भी काफी संख्या में देखने को मिलते हैं।  फलतः  इन  कलाकारों द्वारा निर्मित प्राकृतिक अथवा यथार्थपरक चित्र दरअसल भारत की प्राकृतिक संपदा के दस्तावेजीकरण से संबंधित अंग्रेजों के महत्वाकांक्षी औपनिवेशिक  परियोजना का हिस्सा थे, जिसका उपयोग उन्होंने आगे चलकर  भारतीय पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं का शोषण करने के लिए भी किया। वैसे भी  भी 19वीं सदी के मध्य  तक  ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापार करने वाली वाणिज्यिक  इकाई ही नहीं रह गई थी अपितु अब वह  एक राज चलाने वाली  प्रशासकीय निकाय में परिवर्तित हो  चुकी  थी।  अंग्रेजों को यह महसूस हुआ कि भारत पर शासन करने के लिए उसे समझना जरूरी है।

इन्हीं वजहों से पटना कलम के चित्रों के मुख्य ग्राहक अंग्रेज हुआ करते थे जो पटना की छवियों को स्मृति चिन्ह के रूप मे रखना चाहते थे और इंग्लैंड भी भेजा करते थे।  पटना कलम के चित्रों की इस प्रदर्शनी में यदि कला  पद्धति के स्तर पर देखें  तो तीन किस्म नजर आते हैं। कागज पर वाटर कलर, अभ्रक पर पिगमेंट  और हाथी दांत पर पिगमेंट। जिन पिगमेंट का इस्तेमाल किया गया हैं  वे अपनी चमक के कारण अलग से ध्यान आकर्षित करते हैं।

चित्र बनाने हेतु उपयोग किए जाने वाले कागज ज्यादातर हस्तनिर्मित होते थे। शुरुआत में बांस से निर्मित कागज का उपयोग होता था और बाद के दिनों में यूरोप से आयातित कागजों पर भी चित्र बनाए गए।

 पशु -पक्षियों के चित्र :

पटना म्यूजियम के संग्रह में  पशु-पक्षियों के चित्र बड़ी संख्या में हैं।  कागज पर वाटरकलर से ‘हाथी’, ‘भैंस ‘ , ‘घोड़ा ‘,  ‘गधा ‘  ‘चार सींगों वाला नर बकरा’,  खूंटे से बंधी ‘गाय ‘, ‘तैरता हुआ बतख ‘, ‘पक्षी’, ‘बाज’ , ‘लाल तोता ‘, ‘ हरा तोता ‘ ‘दो पक्षी’,  ‘फूल’ हैं। पशु पक्षियों के चित्र देखने पर बहुत सजीव नजर आते हैं। हां कुछ ऐसे नए पक्षियों के भी चित्र हैं जो अब दिखाई नहीं पड़ते. एक दो चित्रों को छोड़कर अधिकांश में पृष्ठभूमि दिखाई नहीं पड़ती। बिना बैकग्राउंड के इन चित्रों  को देखते हुए ऐसा एहसास होता है मानो ‘बैकग्राउंड रिमुवर’ से उन्हें  हटा दिया गया हो। इस खंड मे ज्यादातर चित्र पटना म्यूजियम के कलेक्शन के  है। एक दो चित्र संजय लाल के संग्रह से भी लिए गए हैं।

कागज पर वाटर कलर में बने चित्रों में ‘शेर और जंगली बैल'( जिसे बाइसन भी कहा जाता है ) का चित्र विशेष रूप से दर्शनीय है। शेर और जंगली बैल दोनों के  आपस में भिड़ने की मुद्रा को बखूबी चित्रित किया गया है। यह चित्र इस मायने में उल्लेखनीय है कि पटना कलम के ज्यादातर चित्र स्थिर, ठहरे हुए  रहते हैं जबकि इस चित्र में एक गति, एक मूवमेंट है। शेर और बैल का एक दूसरे पर आक्रामक मुद्रा में देखते रहना ऐसा है मानो दोनों अब एक दूसरे पर झपट्टा मारने पर उतारू  हों। ऐसे ही एक चित्र ‘हाथी और महावत’ का है।  इसमें महावत हाथी पर बैठा है जबकि हाथी एक पेड़ की टहनियों  पर हरे पत्तों को सूंड़ से  खाने की कोशिश कर रहा है।  ‘फूल’ का चित्रण बेहद सहज और सजीव ढंग से किया गया है।

इस श्रृंखला में प्रदीप जैन के संग्रह से  अभ्रक पर पिगमेंट  से बने चित्रों में ‘चिड़िया ‘, ‘पीली गोरैया’  प्रमुख है। अभ्रक पर पिगमेंट में एक चमक सी दिखती है जिससे प्रेक्षक देर  तक ठहरने को मजबूर हो जाता है। यह चित्र प्रदर्शनी में लोगों और उनके दैनंदिन कार्यों को केंद्रित कर काफी चित्र प्रदर्शित हैं।

अब जैसे इस खंड के बने चित्रों के प्रमुख है ‘ जूते मरम्मत करता मोची’ में ग्राहक छड़ी लिए  हल्की दूरी पर खड़ा  है। ग्राहक की मूंछें उसके खड़े होने का अंदाज उसकी विशिष्टता को इंगित करता है, वहीं मोची जूता को ठीक करने में व्यस्त है। मोची की दशा उसके अस्त व्यस्त चेहरे से महसूस किया जा सकता है। ब्लैक एंड व्हाइट में बना यह चित्र प्रभावी बन पड़ा है। ‘पतंग का धागा तैयार करते हुए’ एक चित्र है। चित्र में  लटाईं, धागा  लिए एक बुजुर्ग और एक बच्चे को देखा जा सकता है।

ठीक ऐसे ही ‘धूनिया’ , ‘बढ़ई’,  ‘कुम्हार’ ,  ‘सुनार’, ‘गुरु और शिष्य’ , ‘मछुआरा और मछुआरी ‘ ‘ताड़ी संग्रह करते हुए पुरुष और महिला’, ‘ तंबोली ‘ (यानी पान बेचने वाला), ‘कबाब और रोटियां तैयार करने वाला ‘ ‘कांच बनाने वाले’, ‘इत्र विक्रेता’, ‘दर्जी’,  ‘किसान’,  ‘सारंगी वादक’ आदि  प्रमुख हैं। आज के दर्शकों के लिए कांच बनाने वाला चित्र अनोखा इस मायने में है कि पहले कांच कैसे बनाए जाते थे इसकी बानगी देखने को मिलती है।

अन्य चित्रों के है  ‘भाला लिए सैनिक’, कलाबाज का प्रदर्शन, ‘जलवाहक’ ( जिसे भिश्ती कहा जाता है ), ‘कपड़ा धोते स्त्री और महिला’ तथा ‘मीर शिकार’ । मीर शिकार पक्षी पकड़ने वाले को कहा जाता था। अब तो यह शब्द ही विलुप्त सा हो चला है । ऐसे ही पानी ढोने के लिए भिश्ती हुआ करते थे यह आज के बच्चों को अजीब लग सकता है।

इन चित्रों में  ‘ग्वाला’ चित्र प्रेक्षक को ठहरने पर विवश करता है।  इस सामान्य से लगने वाले चित्र में एक ग्वाला अपनी गाय का दूध दुहते चित्र है। गाय के थन में ग्वाला के साथ-साथ  गाय का बच्चा उस थन  में अपना मुंह लगाने को उद्धत है। बगल में गाय की झोपड़ी और गाय का नाद दिखता है। यह चित्र उन कुछ दुर्लभ चित्रों में है ज़िसमें वातावरण और माहौल की हल्की सी छाया है। अमूमन पटना कलम के चित्रों में चित्रों को उसके माहौल से अलग करके दिखाया जाता है।  इस चित्र को बहुत बारीकी और सादगी से दर्शाया गया है।

‘डिस्टलरी में काम करते पुरुष’  चित्र कागज पर वाटर कलर से ब्लैक एंड व्हाइट में बना है। डिस्टिलरी का मतलब हुआ मद्य या शराब बनाने की प्रक्रिया। इस प्लांट के छोटे-छोटे ब्यौरे चित्रकार ने दर्ज करने की कोशिश की है। पटना कलम के चित्रों के बहुत कम सामग्री हुआ करती है इस चित्र की खास बात यह है कि चित्र देखते हुए उस वक्त के  शराब बनाने में शामिल लोगों और उनकी पद्धति का अंदाजा हो जाता है।

‘दर्जी’ चित्र अपने रंगों के खासकर लाल रंग के इस्तमाल की वजह से ध्यान खींचता है। तीन पुरुष हैं, एक दर्जी अपने काम में संलग्न है जबकि दो भद्र पुरुष हैं। एक बैठा और दूसरा खड़ा है।  दोनों युवक नजर आते हैं। दोनों की  वेशभूषा से दर्शक को  उसके सामाजिक अवस्था का अंदाजा हो जाता है। इस चित्र में कई रंगों का उपयोग दिखता है। दर्जी खुद कालीन पर बैठा है । चित्र का सबसे आकर्षक हिस्सा है दर्जी का  लाल कपड़े पर काम करते रहना। लाल रंग का उपयोग चित्र को विशिष्ट बना देता है।

कागज पर वाटर कलर में बना ‘लौह समान विक्रेता’ में सो पुरुष हैं और सामने लोहे के सामानों को रखा गया है। लोहे के कितने प्रकार हो सकते हैं उसे इस चित्र से देखा जा सकता है। चित्र में दिखने वाले लोहे कई सामान तो अब  विलुप्त  ही हो चुके हैं।  लेकिन इस चित्र में उसे देखा जा सकता है।  लोहार के साथ उसका एक युवा सहयोगी है। लोहार का चेहरा गौर से देखने पर उसके ऊपर बीत रही मुश्किल परिस्थितियों को  प्रेक्षक महसूस कर सकता है।

‘सुनहरी गेहूं की कटाई ‘  चित्र भी दर्शनीय बन पड़ा है। गेहूं का एक हिस्सा किसान काट चुका है जबकि खासा  हिस्सा बाकी है। गेहूं का पीला और मिट्टी का काला रंग, साथ में कटे गेहूं के खेत के साथ देखने पर मनभावन लगता है ।  दूर में हरे पेड़ हैं। ताड़ के पेड़ों को गांवों में स्थाई उपस्थिति रहा करती है। यह चित्र प्रदीप जैन के संग्रह का है।  हर जगह किसान काले रंग से चित्रित हैं। उसके देह में जनेऊ, माथे पर मुरेठा  देखा जा सकता है।  पटना कलम के चित्रों में रंग उभर कर आते हैं और फबते हैं।

‘ जादूगर का नाटक ‘ में चोटी और मूंछों वाला व्यक्ति एक बच्चे को करतब करते देख रहा है। संभव है उसे प्रशिक्षित भी कर  रहा हो।  दोनों की भंगिमा इस चित्र को दर्शनीय बना देती है। इस चित्र में भी  मूवमेंट  नजर आता है। जहीं चित्रों में कोई कार्य व्यापार नजर आता है वह और अधिक अच्छा लगता है। दर्शक को ऐसा प्रतीत होता है कि चित्र को किसी घटना या  प्रक्रिया के दरम्यान बनाया गया है। यह चित्र  इसे भी कागज पर वाटर कलर से निर्मित है।

ठीक ऐसे ही एक चित्र है ‘इंग्रेवर एंड कस्टमर’ जिसका हिंदी अनुवाद खुदाई करने वाला और  ग्राहक रखा गया है। बेहतर होता खुदाई करने वाले की जगह नक्काशी करने वाला रखा गया होता। इस चित्र में एक फूलदान पर नक्काशी करने में तल्लीन कारीगर है जबकि दूसरा फूलदान लिए ग्राहक  बैठा  उसे देख रहा है। इस चित्र में इन दोनों की अलग- अलग भूमिकाओं  और सामाजिक अवस्थिति जो इस  जीवंतता से चित्रित किया गया है कि देखते ही बनता है ।

कागज पर वाटरकलर में ही  इतने किस्म के क्रिया-व्यापारों  को चित्रित किया गया है  कि देखने वाले को अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के बिहार का एक अंदाजा सा हो जा ता है। एक तरह से यह विजुअल डॉक्यूमेंटेशन किया है इन कलाकारों ने।कल्पना से बनाया गया एक चित्र है ‘मानव – पशु मिश्रित रूप’  जिसमें मनुष्य व पशु दोनों का मिला जुला रूप आकाश में उड़ता दिख रहा है। इसे भी स्याह सफेद में वाटर कलर से बनाया गया है।

संजय कुमार लाल के संग्रह से  वाटरकलर में ही आधा पुरुष आधा नारी का चित्र एकबारगी ध्यान खींचती है। इस चित्र में हल्की पृष्ठभूमि को भी चित्रित किया गया है।  पीछे शहरी मकान, पार्क है और अर्धनारीश्वर की याद दिलाती पुरुष और नारी का रूप चित्रित किया गया है। चित्र के आधे भाग में जहां पुरुष मूंछों वाला रोबीला दिखता है जबकि लाल साड़ी पहने नाजुक स्त्री है। स्त्री के हाथों में फूलदान जबकि पुरुष छड़ी लिए खड़ा है। आधा पुरुष – आधा नारी को एक दूसरी पद्धति याने अभ्रक पर पिगमेंट से भी चित्रित किया गया है। पर चित्र में इस वाटर कलर वाली बात नहीं दिखती।

‘साधू’ शीर्षक चित्र में रंग का इस्तेमाल किया गया है।  गले में ताबीज और लाल लंगोट पहने साधू हाथ में मिट्टी के पात्र में  अंगार लिए हुए है जबकि दूसरे हाथ में चिमटा है। बगल में  सुनहरी पत्तियों वाले पेड़ जबकि पृष्ठभूमि में हरे पेड़ों का झुंड और पहाड़ नजर आता है। ऐसे चित्र बहुत कम हैं जिसमें व्यक्ति के साथ उसके आसपास के माहौल को भी कैनवास पर लाया गया हो।

प्रदर्शनी का एक महत्वपूर्ण  चित्र  है  ‘भिक्षु और पांच पैरों वाला बैल’।  इस चित्र में बैल का पांचवां पैर उसके  कंधे के हल्का ऊपर लटका दिखाता है। देखकर प्रेक्षक के अंदर एक अजीब अनुभूति होती है।  बैल की पीठ पर एक  बैठने वाला कपड़ा रखा गया है। एक कलगी लगा पगड़ी राजशाही कपड़े पहना व्यक्ति उस बैल की पीठ पर हाथ रखे हुए है। जैसा कि पटना कलम के चित्रों में होता है चित्र में कोई पृष्ठभूमि नहीं है।  पता नहीं क्यों इस चित्र का शीर्षक ‘भिक्षु और बैल’ रखा गया है। चित्र से व्यक्ति भिक्षु नहीं अपितु  राजपुरुष  नजर आता है।

इस चित्र का एक बड़ा रेप्लिका बनाकर प्रदर्शन स्थल के बाहर रखा गया था। दर्शकों और आगंतुकों के लिए यह कौतूहल का विषय बना हुआ था। रेप्लिका में चेहरे की बनावट की जगह खाली छोड़ दी गई थी। इस कारण यह सेल्फी प्वाइंट बन गया था। दर्शक चेहरे वाली खुली स्पेस में अपना ठुड्डी  रखकर फोटो खिंचवाते देखे जा सकते हैं। जाहिर है कि दर्शकों ने इसका खूब आनंद उठाया।

‘ ध्यानमग्न योगी’ , ‘साधु’, ‘गुरुनानक देव ‘ , ‘नागा साधू’  , ‘देवी लक्ष्मी ‘  , ‘राधा कृष्ण’,  आदि प्रचलित धार्मिक छवियों को  भी पटना कलम के कलाकारों ने कैनवास पर वाटरकलर से चित्रित किया है।

पटना कलम के इन चित्रों को बनाने के लिए जिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था उसे  “कजली स्याही”  कहा जाता है। इससे बहुत महीन और सटीक किनारे बनते हैं। इसे  गिलहरी के बालों से बने ब्रश से बनाने की बात कही जाती है। कजली स्याही का मतलब यह हुआ कि बिना पेंसिल से स्केच किए सीधे ब्रश से पेंट किया जाता है।  यह काम अत्यधिक दक्षता की मांग करता है क्योंकि एक बार ब्रश लग जाने पर उसे मिटाया नहीं जा सकता है। इस तरह से स्केच करने की वजह आज भले ही समझ से परे लगे, लेकिन सच तो यह है कि उस दौर में आज की तरह पेन्सिल उपलब्ध नहीं थी और अगर थी भी तो प्रचलन से बाहर थी I

इन चित्रों से  डेढ़- दो  सौ साल पहले का  बिहारी जनजीवन कैसा था ? इसका पता चलता है। बिहार की स्थानीय विशेषताओं  को ये चित्र सामने लाते हैं।  बिहार के लोगों के लिए अपने ही अतीत से जुड़ने और उसे समझने का अनोखा अवसर प्रदान करता है ‘पटना कलम : एक विरासत’

नोट : अगले  भाग -2  में  चर्चा इस बात की कि मुगल मिनिएचर्स और यूरोपियन रियलिज्म दोनों से कैसे अलग है पटना कलम

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