संवेदनाओं, अनुभवों और जीवन के रंगों का जीवंत चित्रण करने वाले कलाकार रस्तोगी जी के जन्मदिन पर विशेष
2006 में जब मैंने लखनऊ कला महाविद्यालय में प्रवेश लिया, तो कला और साहित्य के प्रति मेरी रुचि को विस्तार देने का अवसर मिला। प्रदर्शनी, नाटक, फिल्म और साहित्यिक बैठकों में जाना मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अनुभव रहा। इन आयोजनों के माध्यम से मुझे न केवल कला की विविध विधाओं से जुड़ने का अवसर मिला, बल्कि उनसे जुड़े दिग्गज व्यक्तित्वों से मिलने और संवाद करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।
भूपेंद्र कुमार अस्थाना
इसी दौरान नाटक जगत के अनेक वरिष्ठ कलाकारों—पद्मश्री राज बिसारिया, अनिल रस्तोगी, ऊर्मिल थपलियाल, मोहन कुलश्रेष्ठ, और ललित सिंह पोखरियाल जैसे महान हस्ताक्षरों का सान्निध्य मिला। इनके साथ काम करने और उनसे सीखने का अवसर आज भी मेरी कला-यात्रा को दिशा देता आ रहा है। बीते उन्नीस वर्षों के लखनऊ प्रवास ने मुझे अपार अनुभव दिए हैं, और आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा।
आज का दिन विशेष है, क्योंकि कभी-कभी जीवन ऐसे व्यक्तित्व रचता है जो दो बिल्कुल अलग दुनियाओं को एक साथ जोड़ देते हैं। अनिल रस्तोगी ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं। विज्ञान की कठोरता और थिएटर की नाजुकता—दोनों की जटिलताओं को अपने जीवन में सहजता से समेटने वाले रस्तोगी जी केवल अभिनेता भर नहीं हैं, बल्कि अनुभव और संवेदनाओं के गहन अन्वेषक हैं।
अनिल रस्तोगी
अनिल जी का स्नेह अमूल्य है। अनेक कला-प्रदर्शनियों और आयोजनों में उनसे निरंतर मिलना-जुलना प्रेरणा का स्रोत रहा है। आज, उनके जन्मदिन पर, मैं अपने छोटे-से अनुभव के जरिये उनके प्रति शुभकामनाएँ और आदर साझा कर रहा हूँ।
यह दिन केवल एक व्यक्ति का जन्मदिन नहीं है, बल्कि उस व्यक्तित्व का उत्सव है जिसने अपने जीवन में ज्ञान और कला, विज्ञान और संवेदनशीलता, तथा कर्म और भावनाओं का अद्भुत संतुलन स्थापित किया। हम आज जन्मदिन मना रहे हैं अनिल रस्तोगी का—एक ऐसे अभिनेता का, जिसकी कला केवल मंच या परदे तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हमारे भीतर छिपी मानवीय संवेदनाओं को छूती है और उन्हें जीवंत करती है।
लखनऊ की गलियों में 27 सितंबर 1943 को जन्मे अनिल रस्तोगी जी ने अपने जीवन की शुरुआत सरलता, अनुशासन और जिज्ञासा के साथ की। बचपन से ही उनमें ज्ञान की प्यास और खोज की भावना थी। विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने विज्ञान का मार्ग चुना और 1962 में सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिक के रूप में कार्य प्रारंभ किया। 2003 में सेवानिवृत्त होने तक उन्होंने वर्षों तक देश की सेवा की। लेकिन विज्ञान के साथ-साथ उनकी आत्मा सदा कला और अभिनय की ओर आकृष्ट रही।
थिएटर की दुनिया में
यही वर्ष उनके जीवन में एक और अध्याय लेकर आया—थिएटर की दुनिया। मंच पर उनकी पहली प्रस्तुति में ही यह स्पष्ट हो गया कि अनिल रस्तोगी केवल अभिनेता नहीं, बल्कि अनुभव और संवेदनाओं के गहन अन्वेषक हैं। दर्शकों के लिए उनका मंचीय अनुभव केवल दृश्य या संवाद भर नहीं होता, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा बन जाता है। ताजमहल का टेंडर में उनका संवाद— “ज़िंदगी की सच्चाई आंखों में नहीं, दिल में बसती है।”
आज भी श्रोताओं के हृदय में गूंजता है। येहूदी की लड़की में उन्होंने युद्ध और पीड़ा के बीच मानवीय आशा और प्रेम की अद्भुत छवि प्रस्तुत की। जब वे किसी किरदार की पीड़ा में डूबते हैं, तो दर्शक भी उस दर्द को महसूस करने लगते हैं। यही उनकी कला की सबसे बड़ी शक्ति है।
उनकी टेलीविजन और फिल्मी भूमिकाएँ भी उतनी ही प्रभावशाली हैं। उड़ान में SSP बशीर अहमद की भूमिका हो या मुल्क, ठप्पड़, बटला हाउस जैसी फिल्मों में निभाए गए छोटे लेकिन असरदार किरदार—हर प्रस्तुति में उनकी संवेदनशीलता और अनुभव झलकते हैं। निर्देशक और सहकर्मी हमेशा उनके सहज व्यवहार और धैर्य की चर्चा करते हैं। उनके संवाद और हाव-भाव हर सेट पर स्वाभाविक और प्रभावशाली प्रतीत होते हैं।
उनका निजी जीवन भी उतना ही प्रेरणादायी है। 21 मई 1962 को उन्होंने सुधा रस्तोगी जी से विवाह किया। परिवार के प्रति उनका समर्पण और सादगी उनके किरदारों में गहराई और वास्तविकता जोड़ते हैं। उनकी संजीदगी और प्रेम ने उनकी कला को और जीवंत बनाया।
अपने योगदान के लिए उन्हें अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए—संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, यश भारती, कालिदास सम्मान, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और DD UP लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड। किंतु उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार यह रहा कि वे हर भूमिका में मानवीय संवेदनाओं की गहराई को दर्शकों तक पहुँचा सके।
आज, उनके जन्मदिन पर हम केवल उनके अभिनय या पुरस्कारों को याद नहीं कर रहे हैं। हम उनके जीवन की संवेदनशीलता, धैर्य, अनुभव और प्रेम का उत्सव मना रहे हैं। मंच पर उनके सूक्ष्म हाव-भाव, फिल्मों में उनकी आत्मविश्वासी उपस्थिति, सेट पर उनकी सहजता और निजी जीवन में उनकी सादगी हमें यह सिखाती है कि सच्ची कला केवल देखने या सुनने की वस्तु नहीं, बल्कि वह हृदय और आत्मा तक पहुँचने वाली अनुभूति है।
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ, आदरणीय अनिल जी! आपकी कला और जीवन की यह चमक हमेशा हमें प्रेरित करती रहेगी। आपके संवाद, आपके किरदार और आपकी संवेदनशीलता हमारे भीतर भावनाओं का दीप जलाते रहेंगे।
— भूपेंद्र कुमार अस्थाना 27 सितंबर 2025
(संलग्न तस्वीरें हाल ही में संपन्न हुए नाटक “डैडी” से)