- पुस्तक ‘समय के प्रश्न’ का कांस्टीट्यूशन क्लब में लोकार्पण
नई दिल्ली, 15 फरवरी। सुप्रसिद्ध समाजवादी चिंतक एवं जननेता रघु ठाकुर की पुस्तक ‘समय के प्रश्न’ का 14 फरवरी को कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में लोकार्पण संपन्न हुआ। पत्रकारिता, राजनीति और सामाजिक क्षेत्र के विशिष्ट जनों ने मत व्यक्त किया कि यह पुस्तक देश–दुनिया और समाज की जटिल समस्याओं के समाधान लोकतंत्र की सुरक्षा तथा महात्मा गांधी के दर्शन में खोजती है।
‘एक देश एक चुनाव’ के प्रश्न पर रघु ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि यह विचार तभी सार्थक होगा जब चुनाव का संपूर्ण खर्च चुनाव आयोग वहन करे, ताकि अमीर–गरीब सभी वर्गों के प्रत्याशी समान अवसर के साथ चुनाव लड़ सकें। उन्होंने कहा कि पंचायत से लेकर संसद तक चुनाव एक साथ कराना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही आवश्यक है कि किसी भी दल की निर्वाचित सरकार को उसकी निर्धारित अवधि तक कार्य करने दिया जाए।

कार्यक्रम में हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष लक्ष्मी दास, राज्यसभा सदस्य संजय सिंह, लेखक शिवदयाल तथा पुस्तक की संपादक डॉ. शिवा श्रीवास्तव की उपस्थिति रही। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सहयोगी एच.एस. शर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की पौत्री अपर्णा, पत्रकार अरविंद मोहन, कार्टूनिस्ट इरफ़ान, अशोक पंकज, संजय राय, आकांक्षा ठाकुर, शंभू दयाल बघेल और मुकेश चंद्र सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती अनीता सिंह ने किया। उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक प्रश्नों पर केंद्रित यह रघु ठाकुर की बाईसवीं पुस्तक है।
अपने वक्तव्य में रघु ठाकुर ने आंतरिक लोकतंत्र, इलेक्टोरल बॉन्ड, जातिप्रथा, स्वदेशी, मीडिया की भूमिका और विश्व–संसद की आवश्यकता जैसे विषयों पर विस्तार से विचार रखा। उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि आंदोलन लोहार की खटखट की तरह निर्माण की प्रक्रिया है। आज असहमति और आंदोलन के लिए स्थान कम होता जा रहा है, जो वैश्विक विसंगतियों का मूल कारण है।

उन्होंने यह भी कहा कि ‘एक देश एक चुनाव’ की मांग उन्होंने और उनके साथियों ने पहले उठाई थी, किंतु इसे लागू करने की प्रक्रिया में लोकतांत्रिक संतुलन आवश्यक है। जनता पार्टी के दौर में राज्य सरकारों को भंग किए जाने की प्रवृत्ति का उन्होंने विरोध किया था। डॉ. राममनोहर लोहिया का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को आत्मालोचना का साहस रखना चाहिए। लोहिया ने 1955 के केरल गोलीकांड के बाद अपने ही दल की सरकार से नैतिक आधार पर त्यागपत्र की अपेक्षा की थी।
राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि रघु ठाकुर की दूरदृष्टि अद्वितीय है। आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण पर उनके तीन दशक पुराने विचार आज और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा कि पूंजीवादी और कॉरपोरेट संचालित वैश्विक व्यवस्था के खतरों के प्रति रघु ठाकुर ने समय रहते आगाह किया था।

पुस्तक की भूमिका पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने लिखी है। कार्यक्रम में वक्ताओं ने रघु ठाकुर की जनपक्षधर प्रतिबद्धता और नैतिक राजनीति के प्रति उनके समर्पण को रेखांकित किया। सामान्यतः पुस्तक विमोचन में कम उपस्थिति देखी जाती है, किंतु इस अवसर पर देश के विभिन्न अंचलों से आए उनके समर्थकों की उपस्थिति ने उनके व्यापक सामाजिक प्रभाव को स्पष्ट किया।
विदित है कि रघु ठाकुर भारतीय समाजवादी परंपरा के उन विचारकों में हैं जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता–प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उपकरण माना। वे डॉ. राममनोहर लोहिया की वैचारिक परंपरा से प्रभावित रहे और आंतरिक लोकतंत्र, नैतिक राजनीति तथा वैचारिक आत्मालोचना के पक्षधर रहे। उन्होंने वैश्वीकरण, पूंजीवादी वर्चस्व, चुनावी सुधार, इलेक्टोरल बॉन्ड, जातिगत असमानता और मीडिया की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर निरंतर हस्तक्षेप किया। जनआंदोलनों के समर्थन और असहमति के अधिकार की रक्षा को उन्होंने लोकतंत्र का प्राणतत्व माना। स्वदेशी, स्वावलंबन और विकेंद्रीकरण पर उनका जोर गांधीवादी दृष्टि से जुड़ता है। संयुक्त राष्ट्र की सीमाओं की ओर संकेत करते हुए विश्व–संसद की कल्पना प्रस्तुत करना उनके व्यापक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को दर्शाता है। वैचारिक प्रतिबद्धता, सादगीपूर्ण जीवन और जन–सरोकारों के प्रति सतत सक्रियता ने उन्हें समकालीन राजनीति में एक विशिष्ट और नैतिक आवाज के रूप में स्थापित किया है।
