अजीत वर्मा समकालीन भारतीय चित्रकला जगत के उन सशक्त कलाकारों में से हैं, जिन्होंने अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक दृश्य-संवेदनाओं को साधा है। पारंपरिक कलाकार परिवार में जन्मे और प्रसिद्ध म्यूरलिस्ट ग्यारसी लाल वर्मा के पुत्र होने के कारण उनमें शिल्प और भित्ति-चित्र परंपरा की गहरी समझ स्पष्ट दिखती है, किंतु उनकी दृष्टि केवल परंपरा तक सीमित नहीं रहती। प्रस्तुत है अजीत वर्मा की कला पर कलाकार/समीक्षक भूपेन्द्र कुमार अस्थाना का यह आलेख ….

अजीत वर्मा प्रो. के.जी. सुब्रमण्यन और अपने पिता ग्यारसीलाल वर्मा द्वारा प्रशिक्षित एक प्रशंसित कलाकार हैं I 17 दिसंबर, 1955 को राजस्थान के वनस्थली में जन्मे वर्मा ने 1980 में बड़ौदा के एम.एस. विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय से चित्रकला में स्नातक की उपाधि प्राप्त की I इसके उपरांत आपने 2022 में केकेएसयू, नागपुर से ललित कला में स्नातकोत्तर किया। उल्लेखनीय रूप से, वे भारतीय कलाकार परिषद के अध्यक्ष और कलाचर्चा के उपाध्यक्ष पद पर कार्यरत हैं। उनकी चित्रकला का विशिष्ट गुण है मानव और पक्षी आकृतियों का संयोजन। यह रूपक न केवल उनकी कल्पना की उर्वरता को दर्शाता है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के गहरे अंतर्संबंध का दार्शनिक संकेत भी देता है। पक्षी उनके चित्रों में स्वतंत्रता, उड़ान और स्वप्न के प्रतीक के रूप में आते हैं, जबकि मानव आकृतियाँ स्थायित्व और यथार्थ से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। इस प्रकार उनके कैनवास पर जीवन और कल्पना, यथार्थ और स्वप्न, परंपरा और आधुनिकता के बीच एक संतुलित संवाद स्थापित होता है। माध्यम की दृष्टि से वे ड्राई पेस्टल रंगों के प्रयोग में कुशल हैं, जिससे उनके चित्रों में कोमलता, पारदर्शिता और आत्मीयता का भाव आता है। पेस्टल की सहज लयात्मकता उनके विषयों को संवेदनात्मक गहराई प्रदान करती है। और उनकी कला अधिक व्यापक अभिव्यक्ति ग्रहण करती है।

हाल ही में उनकी प्रदर्शनी ‘त्रिवेणी’ (लखनऊ) विशेष उल्लेखनीय है, जहाँ अठारह कृतियों के माध्यम से उन्होंने दर्शकों को मानवीय संवेदनाओं, प्रकृति के रहस्यों और आत्म-अवलोकन की यात्रा पर आमंत्रित किया। दर्शकों ने उनके कार्यों में सूक्ष्म बोध और आत्मीयता के साथ-साथ एक सांकेतिक दार्शनिकता को अनुभव किया। समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो अजीत वर्मा की कला परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सेतु का कार्य करती है। वे न तो केवल शिल्पगत अनुशासन में बंधे रहते हैं और न ही केवल आधुनिकता के मोह में पड़ते हैं। उनकी कला में निरंतर खोज, आत्म-संवाद और जीवन के गहरे अनुभवों की छाप है। यही कारण है कि उनका रचनात्मक व्यक्तित्व समकालीन भारतीय कला में एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण करता है।

अजीत वर्मा की कला यात्रा अत्यंत व्यापक और समृद्ध रही है। उन्होंने देश-विदेश में अनेक प्रतिष्ठित प्रदर्शनी स्थलों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्ष 2012 में बड़ौदा की आकृति आर्ट गैलरी और अहमदाबाद के रविशंकर राव कला भवन में उनके एकल प्रदर्शन विशेष चर्चा का विषय बने। इसके अतिरिक्त 2008 और 2009 में अहमदाबाद में उन्होंने पोर्सलीन म्यूरल और आर्ट पैनल बनाए, जबकि 2010 में ऑस्ट्रेलिया में बहुरंगी इटालियन फ्रेस्को एवं स्वर्णकारी कार्य प्रस्तुत किया। लखनऊ में आयोजित त्रिवेणी प्रदर्शनी में उनके अठारह चित्र प्रदर्शित हुए, जिन्हें दर्शकों ने विशेष सराहना दी। उन्होंने श्रीकृष्ण कैंसर अस्पताल एवं शोध केंद्र, करमसद को अपनी 35 ऑयल पेंटिंग्स दान कर दीं, जो उनके समाजसेवी व्यक्तित्व का प्रमाण है। उनकी कृतियाँ भारत के अतिरिक्त अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, हांगकांग और अफ्रीका महाद्वीपों में भी संग्रहित हैं। ‘Metamorphosis of Mediums’ शीर्षक से आयोजित उनका एकल शो भी उल्लेखनीय रहा, जिसमें उन्होंने लगभग तीस वर्षों की अपनी कलायात्रा को प्रस्तुत किया।

सम्मानों की दृष्टि से अजीत वर्मा को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई विशिष्ट पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वर्ष 2020 में उन्हें राष्ट्रीय रत्न पुरस्कार (अमरावती, महाराष्ट्र) प्रदान किया गया। 2019 में राष्ट्रीय कला मनीषी सम्मान (उज्जैन), राष्ट्रीय स्तरीय पुरस्कार (अमरावती) और कला गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर सम्मान (जयपुर) से अलंकृत किया गया। 2017 में कोलंबिया की चौथी अंतरराष्ट्रीय कला प्रतियोगिता में उन्हें आर्टिस्ट ऑफ द मंथ घोषित किया गया। 2016 में राजस्थान के टोंक में आयोजित राष्ट्रीय कला पर्व में उन्हें राष्ट्र कला रत्न पुरस्कार मिला, जबकि 2014 में उज्जैन के अंतरराष्ट्रीय कला महोत्सव में उन्हें राष्ट्रीय स्वस्ति सम्मान से विभूषित किया गया। इन प्रदर्शनों और सम्मानों से स्पष्ट है कि अजीत वर्मा की कला ने न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि वैश्विक मंचों पर भी अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी कृतियाँ परंपरा और आधुनिकता के सेतु के रूप में सराही जाती हैं और उनके सम्मान उनके रचनात्मक योगदान का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

वर्मा ने केवल चित्र ही नहीं बल्कि मूर्तिकला में भी प्रयोग किये हैं । इनकी मूर्तियों को देखते हुए स्पष्ट होता है कि कलाकार ने परंपरा और आधुनिकता के बीच एक नया सेतु रचा है। ये आकृतियाँ मूल रूप से पशु-पक्षियों (बैल, घोड़ा, मुर्गा, हाथी आदि) से प्रेरित हैं, लेकिन उनकी संरचना कहीं न कहीं खिलौनों जैसी सरलता और लोक-जीवन के खिलंदड़ेपन को भी प्रकट करती है। प्रत्येक आकृति को ज्यामितीय रूपों—चौकोर, गोल, आयत और त्रिकोणीय पैटर्न—से गढ़ा गया है, जिससे वे सजावटी खिलौनों जैसे दिखते हुए भी कलात्मक अभिव्यक्ति का गहरा आधार प्रस्तुत करती हैं। इनमें प्रयुक्त बनावट (texture) और सतह पर की गई रेखाओं, बिंदुओं और वृत्ताकार चिह्नों का प्रयोग भारतीय लोककला की याद दिलाता है, जहाँ अलंकरण का संबंध केवल सौंदर्य नहीं बल्कि प्रतीकात्मक अर्थ से भी जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए, हाथी की मूर्ति पर अंकित ज्यामितीय आकृतियाँ उसे राजसी और पवित्र स्वरूप देती हैं, वहीं घोड़े या बैल आदि की आकृतियों पर बिंदु और सरल रेखाएँ उन्हें चंचल और ग्रामीण वातावरण से जोड़ती हैं।

वर्मा अपने मूर्तियों में जिन सामग्रियों का उपयोग करते है—कागज़ की लुगदी (पेपर मेशी),लकड़ी, धागा,और सतह पर जली हुई आकृतियाँ—वे भी लोक-कौशल और शिल्प की निरंतरता को रेखांकित करती हैं। घोड़े की अयाल या पूंछ के रूप में मोटे धागों का प्रयोग न केवल आभासी यथार्थ पैदा करता है बल्कि दर्शक के भीतर बालपन की स्मृतियों को भी जगाता है। इसी तरह मुर्गे की आकृति में पंखों की गोलाई और पैटर्न उसके जीवंत और चपल स्वभाव को व्यक्त करते हैं। इन मूर्तियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे दर्शक को केवल कलात्मक सौंदर्य नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान और परंपरा की गहराई का भी अनुभव कराती हैं। वे खिलौनों जैसी सहज और आकर्षक दिखती हैं, परंतु अपने भीतर एक गंभीर कलात्मक दृष्टि और भारतीय लोककला की निरंतरता का सन्देश संजोए हुए हैं। इस प्रकार ये कृतियाँ कला और शिल्प, खेल और सजावट, तथा आधुनिकता और परंपरा—इन तीनों के बीच संतुलित संवाद स्थापित करती हैं।

अपनी कला कृतियों के बारे में अजीत वर्मा कहते हैं कि कला मुझमें बचपन से ही रची-बसी रही है। मेरे पिता एमएस विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय के भित्ति चित्र विभाग में प्राध्यापक थे। क्योंकि मैं अपने पिता, कलाकार श्री ग्यारसीलाल वर्मा के मार्गदर्शन में कला सीखता रहा हूँ। यही कारण है कि मेरी कला में, जैसे रेखाचित्र, पेंटिंग, मूर्तियाँ, उभरी हुई कलाकृतियाँ और अन्य कला माध्यम, घनाकार आकृतियाँ प्रमुख हैं। मेरी घनाकार आकृतियाँ मेरी पहचान हैं और मैं अपनी कला का सृजन बड़े आनंद से करता हूँ। यह मेरी अपनी भाषा शैली है जिसे मैं घनाकार कला कहता हूँ। मैं अपनी कला में वर्तमान घटनाओं या अपने व्यक्तिगत अनुभवों के प्रभाव को दर्शाना ज़्यादा पसंद करता हूँ जिससे मुझे मानसिक शांति मिलती है।

मैं पहले फॉर्म को समझना और फॉर्म को सरल (सिंपलीफाय) करके देखना ओर उसके हर अंग को समझना और सभी अंगों को अलग अलग बनके भी उनमें सामंजस्य बनाए रखना। फिर चाहे फिगर हो या कंपोजिशन हो या कोई भी दिल की भावना को व्यक्त करना हो। वे आगे बताते हैं कि मैं एक पारंपरिक फ्रेस्को कलाकार भी हूँ। मुझे चित्रकला का माहौल विरासत में मिली है। मुझे याद है कि बचपन में श्री के.जी. सुब्रमण्यन सर, ज्योति भट्ट सर और शांति दवे सर जैसे महान कलाकार मेरे पिता के स्टूडियो में आकर कला पर चर्चा करते थे, जिसे मैं बहुत उत्साह से सुनता था। चित्रकला के अलावा, मैंने भित्ति चित्र परियोजनाएँ भी की हैं। इसकी शुरुआत राजकोट के रामकृष्ण आश्रम में भित्ति चित्र से हुई थी। मैं उस समय एक छात्र था, और श्री के.जी. सुब्रमण्यन और मेरे पिता के मार्गदर्शन में, हम छात्रों ने मिलकर उस भित्ति चित्र को पूरा किया था। वह अमूल्य अनुभव आज भी बहुत उपयोगी है।

भारत और विदेशों में फैले अपने कला प्रतिष्ठानों में, मैंने चीनी मिट्टी के काम, सीमेंट ढलाई, रेत ढलाई और भित्तिचित्रों में कई प्रयोग किए हैं जो आज भी जीवंत और ताज़ा लगते हैं। मैं अपनी पेंटिंग्स में शुद्ध रंगों और सरल आकृतियों को प्राथमिकता देता हूँ। मैं आमतौर पर अपने जीवन की घटनाओं या प्रभावशाली सामाजिक आयोजनों को चित्रित करता हूँ और उसी के अनुसार रंग और आकृतियाँ चुनता हूँ। इस तरह मैं दर्शकों को एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश करता हूँ। मैं 2011 की एक दुखद घटना को अपने कलाकार जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ मानता हूँ। मैं हमेशा कला की सेवा करना चाहता हूँ। मैं हर दिन कला की सेवा में 12 से 14 घंटे बिताता हूँ, जिससे मुझे कला सृजन की ऊर्जा मिलती है।
-भूपेन्द्र कुमार अस्थाना
