भूपेन्द्र कुमार अस्थाना समकालीन भारतीय कला जगत के एक सक्रिय और बहुआयामी युवा कलाकार हैं, जिनकी रचनात्मक उपस्थिति केवल चित्र सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि कला के विविध क्षेत्रों में विस्तृत है। वे सृजन, कला आयोजन और लेखन—तीनों में समान रूप से संलग्न रहते हैं। चित्रकला और छापा कला में उनकी विशेष रुचि और अभ्यास उन्हें तकनीकी दक्षता के साथ संवेदनशील अभिव्यक्ति प्रदान करता है। कला आयोजनों में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रहती है; वे प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं और शिविरों में भाग लेने के साथ-साथ उनके संयोजन में भी सक्रिय रहते हैं, जिससे कला और समाज के बीच संवाद मजबूत होता है। एक कला लेखक के रूप में उनके लेखों में कला इतिहास, समकालीन विमर्श और लोक-सांस्कृतिक संदर्भों का संतुलित समावेश मिलता है। विशेषतः भारतीय लोक और क्षेत्रीय कला परंपराओं के दस्तावेजीकरण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है। इस प्रकार, उनकी कला यात्रा बहुआयामी और निरंतर विकसित होती हुई दिखाई देती है। यहाँ प्रस्तुत है कलाकार दंपत्ति अजीत सिंह एवं किरण राठौर की कला यात्रा पर उनका आलेख, आलेखन डॉट इन के पाठकों के लिए I -संपादक
भूपेन्द्र कुमार अस्थाना
उत्तर प्रदेश की छापा कला परंपरा पर दृष्टि डालें तो इसकी एक सशक्त और समृद्ध धारा दिखाई देती है। लखनऊ कला महाविद्यालय में इसकी नींव रखने में सुधीर रंजन खास्तगीर और ललित मोहन सेन जैसे अनेक अग्रणी कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जयकृष्ण अग्रवाल जी ने, खास्तगीर की प्रेरणा से सोमनाथ होर के सानिध्य में तकनीकी ज्ञान अर्जित कर इस क्षेत्र में प्रवेश किया और लखनऊ की छापा चित्रकला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई। उनके मार्गदर्शन में अनेक महत्वपूर्ण कलाकार तैयार हुए, जिनमें मनोहर लाल भूगरा, पद्मश्री श्याम शर्मा, गोपाल दत्त शर्मा, आर. के. सरोज सिंह, गोगी सरोज पाल, रागिनी उपाध्याय, किरण सिंह राठौर, सुरेंद्र पाल जोशी, सावित्री पाल और ज्योति शुक्ला जैसे नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। समय के साथ इस परंपरा ने अपने कुछ महत्वपूर्ण स्तंभ खो दिए—सावित्री पाल का कुछ वर्ष पूर्व निधन हो गया और सरोज सिंह जी को कोरोना महामारी ने हमसे छीन लिया—फिर भी यह परंपरा अपने जीवंत स्वरूप में निरंतर आगे बढ़ती रही है।
इस परंपरा के साथ मेरा व्यक्तिगत जुड़ाव भी रहा। लखनऊ कला महाविद्यालय में प्रवेश के समय से ही छापा कला मेरा प्रमुख विषय रहा और स्नातकोत्तर अध्ययन मैंने मनोहर लाल भूगरा जी तथा उनके सेवानिवृत्त होने के बाद राजेंद्र प्रसाद जी के सानिध्य में पूरा किया। इसी दौरान देश की विख्यात छापा कलाकार अनुपम सूद से मिलने और उनकी कला पर विस्तार से लिखने का अवसर मिला, जिसने मेरे दृष्टिकोण को और व्यापक बनाया । आगे चलकर ललित कला केंद्र में छापा कला कार्यशाला में सक्रिय रूप से कार्य करते हुए इसी विधा में मुझे राज्य पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
जब कला के व्यापक परिदृश्य को समझना प्रारंभ किया, तो छापा कला में तीन महिला कलाकारों के नाम विशेष रूप से एक साथ लिए जाते थे—किरण सिंह राठौर, सावित्री पाल और ज्योति शुक्ला। आज इन तीनों में से किरण सिंह राठौर जी लगभग 66 वर्ष की अवस्था में भी समान ऊर्जा और प्रतिबद्धता के साथ कला में सक्रिय हैं। हाल ही में उनके प्रयासों से आयोजित राष्ट्रीय छापा कला कार्यशाला इसका प्रमाण है, जहाँ सार्थक संवाद और प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ देखने को मिलीं।
अजीत सिंह के दो दृश्य चित्र
इसी क्रम में कल उनके निवास पर जाना एक विशिष्ट अनुभव रहा। यह केवल एक औपचारिक भेंट नहीं, बल्कि एक जीवंत कला-संवाद था। उनके साथ-साथ उनके पति, कलाकार अजीत सिंह जी से हुई बातचीत ने इस अनुभव को और समृद्ध किया। इस संवाद में उनके कला महाविद्यालय के दिन, गुरुजन, मित्र और उनकी साझा कलायात्रा पर विस्तृत चर्चा हुई, जिससे उनके सृजन के पीछे के मानवीय और ऐतिहासिक आयाम खुलकर सामने आए।
यह उल्लेखनीय है कि किरण सिंह राठौर जी का जन्म 1960 में लखनऊ में हुआ। प्रारंभिक रुचि ने उन्हें औपचारिक कला शिक्षा की ओर अग्रसर किया और 1984 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.एफ.ए. की उपाधि प्राप्त की। 1985–86 में ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के गढ़ी स्टूडियो की छात्रवृत्ति ने उनके कलात्मक अभ्यास को नई दिशा दी, जबकि 1989 से 1991 तक भारत सरकार की जूनियर फेलोशिप ने उनके सृजन को और गहराई प्रदान की। उनकी प्रतिभा को प्रारंभिक मान्यता 1980 में राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश के पुरस्कार से मिली, जिसे 1987 में पटना की अखिल भारतीय कला प्रदर्शनी में प्राप्त सम्मान ने और सुदृढ़ किया।
किरण राठौर के मूर्तिशिल्प
उनकी सक्रियता विभिन्न कला शिविरों और प्रदर्शनियों में निरंतर बनी रही—1987 में इलाहाबाद का अखिल भारतीय रचनाकार शिविर, 1988 में कानपुर का युवा कलाकार शिविर, 1989 में लखनऊ का ‘इंडो-जर्मन’ शिविर और उसी वर्ष नई दिल्ली का अखिल भारतीय महिला कलाकार शिविर—इन सभी ने उनके अनुभव को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों से जोड़ा। 1986 में शिलांग और 1987 में लखनऊ में आयोजित उनकी एकल प्रदर्शनियाँ उनके स्वतंत्र कलात्मक स्वर की पुष्टि करती हैं। 1984 से 1989 तक मणिपुर की शिल्प कला परिषद्, 1985–86 में यू.एस.ए. के भारतीय ग्राफिक प्रभाग तथा 1989–90 की रजत जयंती प्रदर्शनी सहित वर्तमान समय में भी अनेक महत्वपूर्ण आयोजनों में उनकी सहभागिता ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई है और आज भी दिला रही है।
राठौर जी को हम प्रायः उनके छापा-चित्रों के लिए जानते हैं, किंतु उनके सृजन का विस्तार इससे कहीं अधिक व्यापक है। टेराकोटा, सीमेंट, कंक्रीट, फाइबर और मेटल जैसे विविध माध्यमों में उनके मूर्तिशिल्प इस बात के साक्ष्य हैं कि उनके भीतर का कलाकार किसी एक विधा में सीमित नहीं है। उनके घर में सजी मूर्तियाँ और बाहर स्थापित शिल्प, उनके अनुभव, प्रयोग और समय के साथ हुए गहरे संवाद को मूर्त रूप देते हैं।
इन सभी तथ्यों, तिथियों और अनुभवों को एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि यह केवल एक कलाकार की जीवनी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की छापा कला परंपरा की एक सशक्त, निरंतर और जीवंत धारा है—जो पीढ़ियों से प्रवाहित होती हुई आज भी अपनी ऊर्जा और अर्थवत्ता के साथ उपस्थित है।