प्रो. वी. नागदास की पहचान एक कलागुरु के साथ-साथ वरिष्ठ चित्रकार और छापा कलाकार की है I शायद यही कारण रहा कि ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष की भूमिका उन्हें ज्यादा रास नहीं आई I इसके पीछे के कारणों और कारकों की समीक्षा तो होती रहेगी I यहाँ प्रस्तुत हैं उनके हालिया छापा चित्र में से एक की कलात्मक समीक्षा I जो उनमें अन्तर्निहित संवेदनशील व्यक्तित्व और तकनीकी तौर पर दक्ष छापा कलाकार को सामने लाती है I
कला-आलोचना की दृष्टि से उनके इस छापा-चित्र को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि यह मात्र दृश्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संकटों का रूपक है। खासकर ईरान और अमेरिका-इस्राईल के साथ चल रहे संघर्ष और रूस-युक्रेन की बीच जारी युद्ध के साथ-साथ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच के तनाव को देखते हुए I इक्कीसवीं सदी के आगमन से पहले कहाँ तो माना जा रहा था कि यह सदी वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मानवता के कल्याण का होगा I किन्तु वैश्विक उन्माद बन चुके पूंजीवाद और अंध-राष्ट्रवाद के जूनून ने दुनिया को खात्मे के करीब पहुंचा दिया है I
बहरहाल इस परिप्रेक्ष्य में सबसे पहले इसके संयोजन पर ध्यान दिया जाए तो चित्र दो स्पष्ट भागों में विभाजित दिखाई देता है। इक तरफ बाईं ओर अराजकता, हिंसा और विनाश का दृश्य है—युद्धक विमानों की उपस्थिति, घना काला धुआँ, और नीचे सिमटे हुए, पीड़ित मानव-समूह—ये सब मिलकर आधुनिक सभ्यता की इसी युद्ध उन्माद वाली त्रासदी को उद्घाटित करते हैं। चित्र का यह हिस्सा अत्यधिक सघन रेखांकन और टेक्सचर से भरा हुआ है, जो मानसिक तनाव और भय को दृश्य रूप देता है।

इसके विपरीत, दाईं ओर एक नग्न, विकृत मानव आकृति है, जो अपने हाथों में फूलों का गुच्छा थामे हुए है। यह आकृति एक साथ कई अर्थों की ओर संकेत करती है—निर्बलता, आत्म-चिंतन, पीड़ा, और संभवतः पुनर्जन्म या आशा की संभावना। उसके सिर पर काँटों जैसी संरचना उसे एक तरह के ‘बलिदानी’ या ‘क्राइस्ट-सदृश’ प्रतीक में रूपांतरित करती है। यह आकृति स्थिर है, जबकि बाईं ओर का संसार गतिशील और उथल-पुथल से भरा हुआ है—यह छाया और प्रकाश का यह विरोधाभास चित्र की वैचारिक शक्ति को और गहरा करता है।
चित्र के मध्य में उड़ते हुए कबूतर की आकृति शांति का सार्वभौमिक प्रतीक है, किंतु इसके बावजूद यहाँ उसके चारों ओर का वातावरण उसे विडंबनापूर्ण बना देता है—जैसे कह रही हो कि आज के समय में शांति की अवधारणा मात्र एक आदर्श वाक्य बनकर रह गई है। इसी प्रकार, वृत्ताकार रूप और खगोलीय संकेत एक व्यापक ब्रह्मांडीय संदर्भ रचते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि मानव सभ्यता पर आया यह संकट केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक और सार्वकालिक है।
तकनीकी दृष्टि से, यह प्रिंट सूक्ष्म रेखांकन, क्रॉस-हैचिंग और टोनल वैरिएशन का उत्कृष्ट उदाहरण है। श्वेत-श्याम माध्यम का प्रयोग यहाँ अत्यंत प्रभावी है—यह न केवल दृश्य नाटकीयता को बढ़ाता है, बल्कि नैतिक और अनैतिक के द्वैत को भी रेखांकित करता है।
वस्तुतः विषयवस्तु के स्तर पर यह कृति आधुनिक सभ्यता के विरोधाभासों की कटु आलोचना प्रस्तुत करती है—विशेषतः युद्ध, हिंसा, और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण वाले इस दौर की दारुण गाथा बयां करती है। किन्तु वहीँ आशाओं का संचार करते हुए यह चित्र मनुष्य के भीतर निहित करुणा और पुनर्निर्माण की संभावनाओं को भी इंगित करती है।
समग्रतः, यह छापा-चित्र प्रतीकात्मकता, संरचनात्मक संतुलन और तकनीकी दक्षता का सशक्त उदाहरण है, जिसमें प्रो. वी. नागदास ने समकालीन यथार्थ को एक गहरे दार्शनिक और मानवीय विमर्श में रूपांतरित किया है।
-सुमन कुमार सिंह
