पिछली सदी के सत्तर के दशक की स्मृतियों में लौटें तो चुनाव प्रचार का एक विशिष्ट दृश्य सामने आता है, जब टीन की चादरों पर बनाए गए स्टेंसिल को दीवारों पर लगाकर, उसके ऊपर गेरू या नील जैसे रंगों का प्रयोग कर संदेश छापे जाते थे। उस समय पोस्टर, बैनर और पम्पलेट की अपेक्षा इस माध्यम का अधिक उपयोग होता था। यद्यपि कुछ स्थानों पर दीवारों पर सीधे चुनावी नारे भी लिखे जाते थे, किन्तु मुख्य उद्देश्य यही होता था कि मतदाताओं तक पार्टी का चुनाव-चिह्न और उम्मीदवार की जानकारी सरलता से पहुँच सके।
ऐसे समय में शहरों में कुछ कुशल कारीगर होते थे, जिन्हें स्टेंसिल बनाने में विशेष महारत हासिल होती थी। स्मृतियों के आधार पर कह सकता हूँ कि मुंगेर शहर में भी ऐसी एक जगह थी। वर्षों बाद उसका सटीक स्थान तो स्मरण नहीं रहा, किन्तु हाल ही में बेगूसराय में आयोजित “अनुभूति” शीर्षक कला शिविर में युवा कलाकार विधान राही से भेंट के दौरान यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वे उसी पारिवारिक परंपरा से आते हैं, जहाँ उनके दादाजी के समय से स्टेंसिल निर्माण का कार्य होता रहा है।

यद्यपि इस कला के उद्भव और विकास का स्पष्ट इतिहास बताना कठिन है, फिर भी बचपन की वे स्मृतियाँ आज भी जीवंत हैं, जब ऐसे कारीगरों को काम करते हुए देर तक निहारता रहता था। खासकर जब कभी उधर से गुजरना हो पाता था I यह उल्लेखनीय है कि स्टेंसिल तकनीक का उपयोग केवल चुनाव प्रचार तक सीमित नहीं था, बल्कि स्थानीय स्तर पर उत्पादों के विज्ञापन में भी इसका व्यापक प्रयोग होता था।
इस संदर्भ में विधान राही का कार्य विशेष महत्व रखता है। वे अपनी कलाकृतियों में उन स्मृतियों और प्रक्रियाओं को पुनर्स्थापित करते हैं, जिनसे आज की पीढ़ी लगभग अनभिज्ञ है। अपने कार्य के बारे में उनका कथन है कि उनका वर्तमान शोध भारत में लुप्त होती हस्तनिर्मित प्रिंट संस्कृति, विशेषकर स्टेंसिल प्रक्रिया, को एक आर्काइव, राजनीतिक और भौतिक अभ्यास के रूप में समझने और विकसित करने पर केंद्रित है। यह शोध उनके पारिवारिक अनुभवों से प्रेरित है, जो मुंगेर में चुनावी पोस्टर, बैनर और सार्वजनिक संकेतों के लिए स्टेंसिल निर्माण से जुड़ा रहा है।

वे विशेष रूप से उस ऐतिहासिक मोड़ (rupture) में रुचि रखते हैं, जब दीवारों पर पोस्टर लगाने पर प्रतिबंध और डिजिटल प्रिंट तकनीकों के आगमन ने पारंपरिक हस्तनिर्मित छपाई को लगभग समाप्त कर दिया। इस परिवर्तन ने न केवल दृश्य संस्कृति को रूपांतरित किया, बल्कि उन कारीगर समुदायों को भी हाशिए पर धकेल दिया, जिनका श्रम और शारीरिक उपस्थिति शहर की सार्वजनिक दृश्य भाषा का अभिन्न हिस्सा थी।
विधान राही के अनुसार, स्टेंसिल इस लुप्त हो चुकी परम्परागत कला का एक जीवित अवशेष है, जिसमें स्मृति, श्रम और प्रतिरोध एक साथ निहित हैं। वे एक ही स्टेंसिल के बार-बार उपयोग के माध्यम से—पेंटिंग, प्रिंट और इंस्टॉलेशन में—मौलिकता, लेखकत्व और सत्ता से जुड़े प्रश्नों की पड़ताल करते हैं। उनके लिए यह पुनरावृत्ति मात्र यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक राजनीतिक क्रिया है। स्टेंसिल के घिसाव, असंतुलन और टूट-फूट के चिह्न समय, श्रम और व्यवस्थागत दबावों के साक्ष्य के रूप में उभरते हैं, जो डिजिटल रूप से निर्मित चिकनी छवियों का प्रतिरोध करते हैं।

इस युवा कलाकार की एक तैलरंग कृति है “How Much Would It Cost?” समकालीन भारतीय समाज की राजनीतिक, आर्थिक और दृश्य-सांस्कृतिक संरचनाओं पर एक तीखा प्रश्नचिन्ह प्रस्तुत करती है। यह चित्र केवल एक बाजार-दृश्य नहीं, बल्कि लोकतंत्र, उपभोक्तावाद और श्रम के अंतर्संबंधों की आलोचनात्मक व्याख्या है।
चित्र में सब्ज़ी बेचती महिलाओं, फल-सब्ज़ियों की प्रचुरता और रोज़मर्रा के जीवन के दृश्य एक परिचित यथार्थ रचते हैं, किन्तु इनके ऊपर बिखरे स्टेंसिल—जिनमें चुनावी प्रतीक, “वोट” और ग्राफिक चिह्न दिखाई देते हैं—इस यथार्थ को राजनीतिक अर्थ दे देते हैं। यहाँ बाजार और लोकतंत्र एक-दूसरे में घुलते हुए प्रतीत होते हैं, मानो हर वस्तु, हर श्रम और यहाँ तक कि नागरिकता भी किसी ‘कीमत’ में बदल गई हो।

राही की विशेषता यह है कि वे पारंपरिक स्टेंसिल तकनीक को समकालीन पेंटिंग में रूपांतरित करते हैं। कागज़ के मुड़े-तुड़े स्टेंसिल, उनकी परतें और छायाएँ, चित्र में समय, श्रम और स्मृति की भौतिक उपस्थिति को रेखांकित करती हैं। यह डिजिटल युग की सपाट छवियों के विरुद्ध एक प्रतिरोध भी है।
संरचनात्मक दृष्टि से, चित्र में कोलाज-सदृश संयोजन और बहु-दृष्टिकोण एक जटिल दृश्य-भाषा निर्मित करते हैं। समग्रतः, यह कृति लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बाजारीकरण और आम जनजीवन के बीच के अंतर्विरोधों को प्रभावी ढंग से उद्घाटित करती है।

दरअसल इस युवा चित्रकार का यह शोध स्टेंसिल आधारित अभ्यास को इंस्टॉलेशन और आर्काइविक रूपों में विस्तारित करने का प्रयास करता है। इसके माध्यम से विधान ऐसे इंस्टॉलेशन विकसित कर रहे हैं, जिनमें दीवार-आधारित कार्यों के साथ प्रयुक्त स्टेंसिल, उनके अवशेष तथा प्रक्रिया से जुड़ा दस्तावेजीकरण भी शामिल है, जिससे प्रदर्शनी स्थल या कला दीर्घा अपने आप श्रम और स्मृति का स्थल बन जाता है। इसके साथ ही, वे संस्थागत अभिलेखों, मौखिक इतिहास और सार्वजनिक संग्रहों के साथ संवाद स्थापित कर स्टेंसिल अभ्यास को राजनीतिक संप्रेषण, प्रिंट इतिहास और समकालीन दृश्य संस्कृति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
इस प्रकार, उनकी कला कृतियाँ स्टेंसिल को केवल एक नॉस्टैल्जिक शिल्प के रूप में नहीं, बल्कि एक समकालीन आलोचनात्मक भाषा के रूप में प्रस्तुत करता है, जो व्यक्तिगत परंपरा को सामूहिक इतिहास से और भौतिक प्रक्रिया को राजनीतिक दृश्यता से जोड़ती है।
-सुमन कुमार सिंह
