कलाकार मित्र नरेन्द्र पंजियारा के साथ देवघर भ्रमण के क्रम में हम जा पहुंचे नंदन पहाड़ पर I दरअसल नरेन्द्र का आवास इसी इलाके में है I साथ ही लगभग तीन दशक से अधिक समय में यहाँ सक्रिय रहने की वजह से शहर के स्थानीय निवासियों के बीच उनकी अपनी खास पहचान है I इसकी एक वजह जहाँ उनका कला शिक्षक होना है, वहीँ बतौर कलाकार उन्होंने अपनी चित्रशैली को “देवघर शैली” के तौर पर जिस तरह से स्थापित किया है, इस वजह से स्थानीय बौद्धिक वर्ग से लेकर आम लोगों के बीच खासे लोकप्रिय भी हैं I यहाँ तक कि सरकार द्वारा नंदन पहाड़ को पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित किये जाने के अभियान से भी नरेन्द्र का जुडाव रहा है I

बताते चलें कि देवघर (झारखंड) एक धार्मिक नगरी है इसका प्राचीन इतिहास धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। इसे आज बाबा बैद्यनाथ धाम के नाम से संपूर्ण भारत में जाना जाता है। यहाँ का प्रमुख केंद्र बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग है, जो बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पुराणों और किंवदंतियों में उल्लेख की बात करें तो स्कन्द पुराण, शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में देवघर का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव को लंका ले जाने के लिए तप किया और शिवलिंग प्राप्त किया, किंतु वह यहीं स्थापित रह गया। कालांतर में यह बैद्यनाथ धाम के रूप में प्रसिद्ध हुआ। प्रत्येक वर्ष सावन महीने में गंगाजल लेकर कांवड़िया सुल्तानगंज (भागलपुर, बिहार) से देवघर तक पैदल यात्रा करते हैं और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। यह परंपरा कम से कम एक सहस्राब्दी पुरानी मानी जाती है। वहीँ कुछ विद्वानों का मत है कि इस क्षेत्र में बौद्ध और जैन धर्म का भी प्रभाव रहा। निकटवर्ती पावापुरी और राजगीर जैन-बौद्ध परंपराओं से जुड़े हैं, इसलिए माना जाता है कि देवघर क्षेत्र में भी इनके अनुयायी रहे होंगे।

यह तो हुयी धार्मिक महत्व की बात, इस शहर का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास भी अत्यंत प्राचीन है I विवरण मिलता है कि प्राचीन काल यह क्षेत्र मगध साम्राज्य, गुप्त साम्राज्य और पाल राजाओं के अधीन रहा। पाल वंश ने बौद्ध धर्म का संरक्षण किया और इस क्षेत्र में कला और स्थापत्य को भी बढ़ावा मिला। वहीँ मध्यकाल तक आते आते देवघर का मंदिर एक प्रमुख तीर्थस्थल बन गया। यहाँ अनेक संत, सिद्ध और साधक आए। मुस्लिम शासकों के समय में भी यह शिवधाम सुरक्षित रहा, हालांकि कुछ संघर्ष और आक्रमण के संकेत मिलते हैं। ब्रिटिश काल में देवघर एक प्रसिद्ध तीर्थ बन चुका था। अंग्रेज अधिकारियों ने भी यहाँ के मेले और श्रद्धालुओं की संख्या का उल्लेख किया है। बैद्यनाथ धाम मंदिर परिसर में 22 मंदिर हैं, जिनमें मुख्य मंदिर में शिवलिंग स्थापित है। कतिपय इसी कारण इसे शैव भक्ति आंदोलन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। वैसे यहाँ की संस्कृति में संथाल और अन्य आदिवासी समुदायों की लोकधर्मीय परंपराएँ भी जुड़ी हैं। सुल्तानगंज से गंगा जल लेकर जब कांवड़िया बैद्यनाथ धाम आते हैं तो मुख्य मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद नंदन पहाड़ स्थित मंदिरों में भी जाते हैं I

किन्तु स्थानीय आबादी के लिए यह जगह सिर्फ पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं रहकर एक पर्यटन स्थल भी है I इसे बढ़ावा देने के लिए स्थानीय प्रशासन ने इस स्थल के सौन्दर्यीकरण का प्रयास किया है I जिसके तहत पार्क को विकसित कर बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले इत्यादि भी लगाये गए हैं I लगभग दस-बारह साल पहले जब इस स्थान पर पहली बार गया था, तब इसे शहर से दूर समझा जाता था I अलबत्ता उस दौरान भी आसपास बस्ती बसने लगी थी, किन्तु अब इसे घनी आबादी वाला क्षेत्र मान सकते हैं I यहाँ तक कि सावन के महीने में भीड़ बढ़ने पर कांवड़ियों की कतार अब इस इलाके से लगनी शुरू होती है I बैद्यनाथ मंदिर की यहाँ से दूरी के लिहाज़ से लगभग 109 किलोमीटर पैदल चलकर आये भक्तों के लिए यह खासा परेशानी का सबब बन जाता है I किन्तु इसका एक सुखद पक्ष यह है कि लाखों की भीड़ के बावजूद किसी तरह के भगदड़ या बड़ी दुर्घटना हाल के वर्षों में देखने को नहीं मिली है I इस लिहाज़ से स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार अवश्य बधाई के पात्र हैं I

बहरहाल यहाँ के मंदिर परिसर में जिन पुजारी से मुलाकात होती है, वे हैं नीलू मिश्र उर्फ़ नीलू पंडित I पंडित जी स्थानीय हैं और लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व सरकारी नौकरी से सेवानिवृत हुए हैं I 75 वर्षीय पंडित जी से बातचीत में इस शहर के इतिहास से लेकर वर्तमान तक की कई ऐसी जानकारी मिली, जिससे हम जैसे लोग बिल्कुल अनजान थे I मसलन उन्होंने बताया कि आज से पचास साल पहले इस पहाड़ के आसपास जंगली जानवर दिख जाया करते थे I वैसे पंडित जी का दावा था कि वर्ष 1968 में अपनी शादी के दिन जो उन्होंने साबुन का उपयोग किया, उसके बाद फिर दुबारा कभी नहीं लगाया I

वैसे आसपास कुछ गुफाओं का अस्तित्व आज भी बरकरार हैं, किन्तु सुरक्षा कारणों खासकर सांप-बिच्छु की आशंका के कारण वहां जाना उचित नहीं था I स्थानीय किंवदंती के अनुसार, नंदन पहाड़ शिव-भक्तों और साधकों के तप और ध्यान का प्रमुख केंद्र रहा है। माना जाता है कि यहां प्राचीन काल में अनेक योगी और तांत्रिक साधक अपनी साधनाएँ करते थे। वैसे नंदन पहाड़ को पार्वती और शिव की कथाओं से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि देवी पार्वती अपने पुत्र गणेश और कार्तिकेय के साथ यहाँ विहार के लिए आती थीं। एक और मान्यता यह है कि जब लंकापति रावण ने शिवधाम में जबरदस्ती प्रवेश का प्रयास किया तो नंदी के द्वारा उसे रोका गया I गुस्साए रावण ने नंदी को उठाकर हवा में उछाल दिया, मान्यता है कि नंदी जहाँ जाकर गिरे उस पहाड़ को नंदी पहाड़/ नन्दन पहाड़ कहा जाने लगा I विवरण यह भी मिलता है कि मध्यकाल में जब बाबाधाम (बैद्यनाथ धाम) एक प्रमुख शक्ति और शिव-भक्ति केंद्र के रूप में विकसित हो रहा था, तब नंदन पहाड़ साधना और तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए प्रसिद्ध रहा। गुप्त और पाल कालीन शैव-शाक्त साधना परंपरा से इसका संबंध माना जाता है। वैसे आसपास के क्षेत्रों में मिलने वाले शिलालेख और मूर्तिशिल्प संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र शैव-शाक्त उपासना का सक्रिय केंद्र रहा है। वैसे मेरी व्यक्तिगत राय में इस क्षेत्र का पुरातात्विक अध्ययन अगर गंभीरता से किया जाए तो, कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है I
-सुमन कुमार सिंह
