कला और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी आवश्यक

कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटना से अपनी पढाई पूरी करने के बाद हम में से अधिकांश सहपाठियों ने कला शिक्षक, प्राध्यापक या विज्ञापन एजेंसी अथवा पत्र-पत्रिकाओं में डिजाईनिंग जैसा पेशा चुना I  किन्तु हम सबसे अलग हटकर हमारे सहपाठी डी.एन.श्रीवास्तव यानी दिग्विजय नाथ श्रीवास्तव ने आर्ट कन्जर्वेशन (कलाकृतियों, पुरासमाग्रियों के संरक्षण) जैसे क्षेत्र में काम करने को चुना I जाहिर है हम जैसों के लिए यह क्षेत्र बिल्कुल अन्जाना सा था I लेकिन 1988 में अपने लखनऊ प्रवास के दौरान इस विषय के बारे में कुछ जानकारी हासिल कर पाया I क्योंकि दिग्विजय उन दिनों लखनऊ स्थित इंटेक में ही कार्यरत थे I इस दौरान उन्होंने संरक्षण के क्षेत्र में लगभग तीन दशक से अधिक समय तक कार्य किया I हाल के दिनों में अपनी सेवानिवृति के बाद से वे लगातार चित्र निर्माण में तन्मयता से लगे हैं I पिछले दिनों लखनऊ स्थित आवास पर दिग्विजय और कलाकार/ कला समीक्षक भूपेन्द्र  कुमार अस्थाना की मुलाकात का वर्णन प्रस्तुत है भूपेन्द्र के शब्दों में – सुमन कुमार सिंह  (संपादक)

Bhupendra Kumar Asthana

चित्र रचना के लिए कोई उम्र नहीं बल्कि उसके प्रति समर्पित भावना और जुनून,रचनात्मकता को विकसित करने की एक  अनवरत यात्रा होती है । किसी भी उम्र में कला को सीखना तो संभव है ही एक लम्बे अंतराल के बाद दुबारा उस लय को पा लेना भी संभव है । जो किसी अन्य तरह की व्यस्तता के कारण कहीं पीछे छूट गया हो I यहाँ मैं ऐसे ही एक व्यक्ति की बात करने जा रहा हूं जिन्होंने लगभग तीस साल तक कला संरक्षण का कार्य किया। कला संरक्षण “शब्द” जैसा कि नाम से ही जाहिर है,  कलाकृतियों के रखरखाव और संरक्षण से संबंधित है। यानी  इसका अर्थ है कला और सांस्कृतिक विरासत को किसी भी तरह के नुकसान या क्षय से बचाना, ताकि भविष्य के लिए भी उसे संरक्षित रखा जा सके। इसमें कलाकृतियों की सफाई, मरम्मत के साथ-साथ भौतिक और रासायनिक उपचार की प्रक्रिया भी शामिल हैं।” बहरहाल इन दिनों  इस कार्य से सेवानिवृत्त होने के बाद वापस कला कर्म की तरफ एक लगन के साथ निरन्तर बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, दिग्विजय नाथ श्रीवास्तव । दिग्विजय नाथ जी से मेरी मुलाकात वरिष्ठ कलाकार, कला समीक्षक, लेखक सुमन सिंह जी ने लखनऊ में कराया था। दिग्विजय नाथ श्रीवास्तव जी का जन्म 10 मार्च 1963 को सिवान बिहार में हुआ। आपकी प्राथमिक शिक्षा रांची झारखंड में हुयी ।

बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया कि आज कला के जिस मुकाम पर पहुंच सका हूं उसके लिए मैं अपने कला गुरु प्रणव कुमार आचार्य का हमेशा ऋणी हूं I जिन्होंने मुझे कला की दुनिया में प्रवेश करने के लिए प्रेरित  और प्रोत्साहित किया। उनकी प्रेरणा से ही पटना कला महाविद्यालय में दाखिला लिया। 1987 में पटना विश्वविद्यालय, पटना से प्रथम श्रेणी से बी.एफ.ए. (वाणिज्यिक कला) की डिग्री हासिल की । पढाई के दौरान ही एक और कलागुरु ललित कुमुद जी का भी भरपूर सानिध्य प्राप्त हुआ। उनकी पटना में एक आर्ट एंड फोटोग्राफी एकेडमी थी जिसमें अनेक कार्य करने का मौका मिला। उसी दौरान हिंदुस्तान टाइम्स के विज्ञापन विभाग में कलाकार की नौकरी मिली । उन्हिंहीं दिनों दुस्तान टाइम्स में ही एक विज्ञापन छपा था, जिसमें इंटैक कंजर्वेशन इंस्टीट्यूट लखनऊ के लिए आवेदन आमंत्रित किया गया था I संयोग से मेरा चयन इस पद के लिए हो गया, उसके बाद मैं पटना से लखनऊ आया और तब से लखनऊ का ही होकर रह गया I इसी दौरान लखनऊ के अनेक कलाकारों से परिचय हुआ और उन सभी कलाकारों से मित्रवत भाव आज भी बना हुआ है।

62 वर्षीय दिग्विजय नाथ जी बताते हैं कि कला के क्षेत्र में शिक्षा लेने के बाद संरक्षण कार्य, ज्यादा महत्वपूर्ण लगा क्योंकि इस दौरान  पुराने पेन्टिंग और धरोहर जैसे विषय की बारीकी और उसकी उपयोगिता को भी समझने का भरपूर अवसर मिला।
सेवानिवृत्त होने के बाद दिग्विजय जी वर्तमान‌ में दृश्य चित्रण एवं अमूर्त शैली में काम कर रहे हैं। और भविष्य में कला प्रदर्शनी भी लगाने की योजना है। वैसे वे अपनी पेंटिंग के साथ ही कला संरक्षण का भी कार्य जारी रखे हुए हैं। जाहिर है अपने लम्बे अनुभव की वजह से वे  कन्जर्वेशन (संरक्षण) के कार्य में बहुत अच्छी जानकारी रखते हैं। वे बताते हैं कि कन्जर्वेशन या पुनरुद्धार का तात्प‌र्य किसी वस्तु का संरक्षण / मरम्मत या कुछ हद तक हो सके तो उसके मूल भौतिक सौन्दर्य को बचाए रखने के लिये जो प्रयास करते उसे हीं संरक्षण कहते है।  कला में संरक्षण का अपना महत्वपूर्ण योगदान है क्योंकि इसके जरिये ही मानव सभ्यता और उसके इतिहास का पता चलता है  I संरक्षण ही इतिहास के प्रत्येक कालखंड  के संन्देशों को उद्‌घाटित करती है। जिससे उस दौर के मानव के ज्ञान और संस्कृति का पता चलता है।

मैं लगभग 30 साल तक इंटेक (INTACH) में संरक्सेषण कार्य करता रहा, जिसमें मुख्य रूप से पेपर-पेन्टिंग, क्लॉथ पेन्टिंग, कैनवस (तैल रंग से बने चित्रों ), हस्तलिखित ग्रन्थ, लकड़ी, स्टोन, आयरन अन्य विभिन्न प्रकार के वस्तुओं पर हजारों की संख्या में संरक्षण का कार्य किया। इस क्षेत्र में करियर को लेकर उन्होंने बताया कि समान्यत कंजर्वेशन के इस क्षेत्र में BFA पेन्टिंग एवं  रसायन विज्ञान  (Chemistry) से स्नातक किये लोग जा सकते हैं।

– भूपेंद्र कुमार अस्थाना
9 जून 2025

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