पूर्वोत्तर भारत की लोक चित्रकला

पूर्वोत्तर भारत की हस्तशिल्प और लोक चित्रकला अपनी सांस्कृतिक विविधता और प्रकृति-निष्ठा के लिए प्रसिद्ध है। नागालैंड, मणिपुर, असम, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश की जनजातियाँ बांस, बेंत, कपड़े और लकड़ी पर अद्भुत शिल्प रचती हैं। इनमें असम का “असमिया मुखा” और बांस-बेंत की टोकरियाँ, मणिपुर का “मोइरंगफी” वस्त्र, तथा नागालैंड की लकड़ी नक्काशी विशेष हैं। देश के किसी भी हिस्से में आयोजित हस्तशिल्प मेले में यहाँ के उत्पाद मिल जाते हैं I इन उत्पादों को शहरी और महानगरीय समाज द्वारा भी अपनाया जाता है I किन्तु बात जब लोक चित्रकला की आती है तो पूर्वोत्तर के बाहर के लोग इससे लगभग अपरिचित ही हैं I यहाँ तक कि आधुनिक कला जगत में भी इसकी चर्चा नहीं दिखती है I जबकि लोक चित्रकला में असम का मणिकूट और जमीन पर अहोम चित्रण, मणिपुर के रासलीला चित्र, और त्रिपुरा की देव-नृत्य झलकियाँ मिलती हैं।

Asamese masks

ये कलाएँ न केवल धार्मिक व सामाजिक जीवन को अभिव्यक्त करती हैं, बल्कि प्रकृति और लोक-आस्था का जीवंत दस्तावेज भी हैं। दरअसल भारतीय चित्रकला का इतिहास विविध आयामों से भरा हुआ है। यदि पश्चिमी और मध्य भारत हमें अजंता और बाघ की भित्ति परंपरा देते हैं, तो पूर्वी भारत—विशेषकर बिहार और बंगाल—पाल कालीन लघुचित्र और पांडुलिपि चित्रण की समृद्ध धारा प्रस्तुत करता है। इन दोनों केंद्रों का प्रभाव न केवल पूरे भारतवर्ष में बल्कि पड़ोसी क्षेत्रों—नेपाल, भूटान, तिब्बत और पूर्वोत्तर भारत—तक फैला। पूर्वोत्तर की लोक चित्रकलाओं का अध्ययन करते समय यह स्पष्ट होता है कि वहाँ की शैलियाँ सीधे-सीधे इन प्राचीन परंपराओं से संवाद करती हैं।

Ajanta Fresco

अजंता भित्ति चित्र : कथा और भावाभिव्यक्ति की परंपरा

अजंता (गुप्त काल और उसके बाद) भारतीय भित्ति चित्रकला की शिखर उपलब्धि है। यहाँ बौद्ध जाटक कथाएँ, बुद्ध के जीवन प्रसंग और मानवीय भावों से युक्त दैनंदिन जीवन के दृश्य चित्रित हैं।

  • विशेषताएँ: कोमल रंगों का प्रयोग, छायांकन, भावपूर्ण चेहरे, गतिशीलता और कथात्मकता।
  • अजंता की सबसे बड़ी देन यह है कि उसने कथा और भावाभिव्यक्ति को चित्रकला का मूल आधार बनाया।
अष्टसहस्रिका प्रज्ञापारमिता पांडुलिपि का एक पन्ना, बिहार या बंगाल, 12वीं शताब्दी, द मेट (The MET), न्यूयॉर्क, अमेरिका।

पाल कालीन चित्रकला : तंत्र और पांडुलिपि परंपरा

8वीं से 12वीं शताब्दी तक पाल साम्राज्य (बिहार-बंगाल) ने बौद्ध कला का नया अध्याय लिखा।

  • विषय: महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म, तांत्रिक देवता (तारा, हीवज्र, मंडल), प्रज्ञापारमिता जैसी पांडुलिपियाँ।
  • माध्यम: ताड़पत्र और भोजपत्र पर लघुचित्र, कागज़ और वस्त्र पर मंडल, मूर्तिकला के साथ संयोजन।
  • शैली: गहरे रंग, सूक्ष्म रेखाएँ, अलंकरण, प्रतीकात्मक संरचना।
    पाल कला ने तांत्रिक रहस्यवाद और सूक्ष्म लघुचित्र की जो परंपरा विकसित की, उसका प्रभाव तिब्बत, नेपाल और भूटान के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत तक पहुँचा।

पूर्वोत्तर भारत की लोक चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ

पूर्वोत्तर भारत, जिसमें असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय और सिक्किम आते हैं, वहाँ की लोक चित्रकलाएँ धार्मिक, अनुष्ठानिक और भक्ति जीवन से जुड़ी रही हैं।

सत्रिया चित्रकला

(क) असम : सत्रिया चित्रकला

  • आधार: शंकरदेव और माधवदेव की वैष्णव भक्ति परंपरा।
  • माध्यम: हस्तनिर्मित कागज़, प्राकृतिक रंग, मठों और ‘सत्रों’ में निर्मित चित्र।
  • विषय: भागवत कथाएँ, कृष्ण-लीला, धार्मिक आख्यान।
  • प्रभाव: यहाँ की कथात्मकता अजंता से प्रेरित जान पड़ती है, परंतु शैली लोकाभिमुख है।

(ख) अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम : थांका चित्रकला

Photo : google
  • आधार: महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म।
  • माध्यम: कपड़े या रेशमी वस्त्र पर रंगीन चित्र, लकड़ी पर मढ़ाई।
  • विषय: मंडल, बोधिसत्त्व, तारा, तांत्रिक देवता।
  • प्रभाव: पाल कालीन लघुचित्र और तांत्रिक मंडलों से सीधा संबंध।

(ग) मणिपुर : वैष्णव और लोक चित्रकला

  • आधार: कृष्ण भक्ति और रासलीला।
  • माध्यम: कागज़, कपड़ा, दीवारें।
  • विषय: गोपियों के साथ कृष्ण, नृत्य-प्रेरित दृश्य।
  • प्रभाव: अजंता की नृत्य और भावाभिव्यक्ति की परंपरा यहाँ रूपांतरित दिखती है।
रासलीला

(घ) नागालैंड और मेघालय : जनजातीय अनुष्ठानिक चित्रकला

  • आधार: लोक-देवता, आत्मा-पूजा, कृषि और युद्ध।
  • माध्यम: घरों की दीवारें, बाँस, लकड़ी।
  • विषय: टोटेम, मुखौटे, अनुष्ठानिक प्रतीक।
  • प्रभाव: यह अधिकतर स्वतंत्र और जनजातीय है, पर प्रतीकवाद में पाल कालीन तंत्र से साम्य दिखाई देता है।
  1. अजंता और पाल से अंतर्संबंध
पहलू अजंता (गुप्त काल) पाल कला पूर्वोत्तर लोक-शैली अंतर्संबंध
विषय बौद्ध कथाएँ, मानव जीवन तांत्रिक देवता, मंडल, प्रज्ञापारमिता भक्ति कथा (असम, मणिपुर), तांत्रिक थांका (सिक्किम) अजंता की कथा-प्रधानता + पाल का तांत्रिक रहस्यवाद
शैली कोमलता, भाव, गतिशीलता सूक्ष्म रेखाएँ, अलंकरण, गहरे रंग सपाट रंग, प्रतीकवाद दोनों परंपराओं का सरलीकृत लोक रूप
माध्यम गुफा-दीवार ताड़पत्र, कागज़, वस्त्र कागज़, कपड़ा, बाँस पाल पांडुलिपि परंपरा तिब्बत-भूटान होते पूर्वोत्तर पहुँची
प्रभाव कथा और भावाभिव्यक्ति तंत्र और मंडल संरचना लोक-कथाएँ + तांत्रिक प्रतीक दो परंपराओं का लोक-अनुवाद

स्पष्ट है कि पूर्वोत्तर भारत की लोक चित्रकलाएँ भी भारतीय चित्रकला की जीवित विरासत हैं। इनमें हमें अजंता की भावाभिव्यक्ति और कथा-प्रधानता के साथ-साथ पाल कालीन तांत्रिक रहस्यवाद का प्रत्यक्ष प्रभाव मिलता है।

  • असम और मणिपुर की वैष्णव-भक्ति कला में अजंता की मानवीय संवेदना और कथात्मकता की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
  • अरुणाचल और सिक्किम की थांका कला में पाल कालीन तांत्रिक मंडलों और पांडुलिपि-शैली की सीधी छाप दिखती है।
  • नागालैंड और मेघालय जैसी जनजातीय चित्रकला ने प्रतीकात्मक और अनुष्ठानिक स्तर पर इस परंपरा का लोक रूपांतरण किया।

अतः कहा जा सकता है कि पूर्वोत्तर की लोक चित्रकलाएँ केवल क्षेत्रीय परंपरा नहीं हैं, बल्कि भारतीय चित्रकला की गहरी ऐतिहासिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण हैं, जहाँ गुप्त-अजंता से लेकर पाल और तिब्बती परंपरा तक की प्रतिध्वनि मिलती है।किन्तु यहाँ यह भी स्पष्ट है कि पूर्वोत्तर भारत में लोक चित्रकला उस तरह से विशेष प्रचलित नहीं है, जैसा देश के अन्य हिस्सों बंगाल, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश इत्यादि अन्य हिस्सों में देखने को मिलता है I

-सुमन कुमार सिंह

स्रोत: chatgpt

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