राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में “वैदेही सीता”   

राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में इन दिनों “वैदेही सीता : बिहार की बेटी” शीर्षक प्रदर्शनी चल रही है I इस प्रदर्शनी और इससे जुड़े कार्यक्रम पर प्रस्तुत है वरिष्ठ चित्रकार प्रो.अन्नपूर्णा शुक्ला का यह आलेख I विदित हो कि प्रो.शुक्ला वनस्थली विद्यापीठ से सेवा निवृति के बाद इन दिनों जयपुर में निवास करते हुए, अपने कला सृजन और लेखन में संलग्न हैं I आलेखन डॉट इन के पाठकों के लिए …

प्रो.अन्नपूर्णा शुक्ला

बिहार का हजारों वर्ष पुराना आध्यात्मिक इतिहास सौंदर्यात्मक लालित्य से भरा-पूरा है। जहां बुद्ध, महावीर, सूफी संतों और दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह जी की पवित्र आत्मा निवास करती हो वहां की लोक कलाएं स्वतः फलीभूत हो जाती हैं। लोक की आत्मा सहज स्वाभाविक होती है जो लोक कलाओं की रूह को सदैव विरचित करती रहती है। यही विरेचन बिहार की लोक कला का आधार रहा है क्योंकि लोक कलाकारों की आत्मा विशुद्ध होती है वही पारदर्शिता उनकी अभिव्यक्ति में समाई रहती है फिर वह जिस माध्यम में व्यक्त होती है वह सहज और पवित्र होती है। कुछ इसी भाव को मैंने इस प्रदर्शनी में अनुभव किया।

पद्मश्री बौआ देवी की कृति

बिहार संग्रहालय और आरआईसी के सौजन्य से आरआईसी, जयपुर राजस्थान के ही तत्वाधान में 2 सितंबर 2025 से ये प्रदर्शनी प्रारंभ हुई है जो 30 सितंबर 2025 तक जारी रहेगी। जिसका उद्घाटन आरआईसी के निदेशक ने किया जिसमें बिहार संग्रहालय के अपर निदेशक श्री अशोक कुमार सिन्हा और अन्य सम्माननीय व्यक्ति उपस्थित रहे । इस प्रदर्शनी में लगभग 35 कलाकारों के चित्रों को दीर्घा में प्रदर्शित किया गया । इसमें बिहार के 11 पद्मश्री से सम्मानित, राष्ट्रीय पुरस्कार और राज्य पुरस्कार से सम्मानित कलाकारों के चित्र भी हैं। कार्यक्रम में बिहार के 3 पद्मश्री से सम्मानित कलाकार बौआ देवी, दुलारी देवी और अशोक कुमार विश्वास भी उपस्थित थे।

पद्मश्री दुलारी देवी की कृति

प्रदर्शित चित्रों में वैदेही यानी सीताजी को यहाँ किसी देवी या शक्ति के रूप में नहीं बल्कि बिहार (मिथिला) की बेटी सीता के रूप में अपनी-अपनी अलग-अलग शैलियों में लोक कलाकारों ने फलक पर संयोजित किया, किसी ने सामाजिक परिदृश्य में, किसी ने पारिवारिक परिदृश्य में, यहां तक सीता को कलाकार रूप में भी चित्र बनाते हुए दिखाया गया है। यही है हमारे लोक जीवन की सार्थकता और समर्पण । जैसा मन वैसी अभिव्यक्ति। मैंने प्रारंभ में बताया है कि बिहार शुद्ध आत्माओं की तपस्थली रही है तभी तो बिहार की वैदेही के तप को अनुभव कर लोक कलाकारों ने अपनी तूलिका से कैनवस पर अंकित करते चले गए। चाहे कोई भी शैली हो जैसे मिथिला या मधुबनी शैली, टिकुली शैली, मंजूषा शैली, सुजनी शैली, कसीदा कारी और भी विविध बिहार की शैलियों में सीता के जीवन से जुड़े हुए विषयों पर चित्र रचे गए हैं। इस प्रदर्शनी को देखकर कला शैलियों की अनंत संभावनाओं को अनुभव किया जा सकता है।

इसी प्रदर्शनी के साथ ही टॉक शो और सात दिनों का कला कार्यशाला भी छ: लोक कलाकारों द्वारा प्रारम्भ किया गया । इन लोक कलाकारों की मानसिक यात्रा जब खाली कैनवास पर हिलोरे ले रही थी तब मुझे बिहार की बेटी सीता, बुद्ध, महावीर, गुरु गोविन्द जी और उन तमाम सूफी संतों की तप साधना का सत्व उनमें स्पष्ट होता दिख रहा था।

मिथिला शैली कैसे प्रकाश में आई इस का संक्षिप्त परिचय यहाँ आवश्यक है – जिसे टॉक शो में बिहार संग्रहालय के अपर निदेशक श्री अशोक कुमार सिन्हा जी ने बताया – विलियम जी. आर्चर ने 1934 में बिहार में एक बड़े भूकंप के दौरान खोजा था। जब वो विनाशकारी भूकंप के बाद क्षेत्रों का निरीक्षण करने गए तब उन्होंने घरों की टूटी दीवारों पर बनी इस कला को देखा, उनकी इस खोज ने  प्राचीन कला को दुनियां के सामने लाने में मदद की और बाद में 1949 में लेख भी प्रकाशित किया गया। इसके बाद 1967 में दिल्ली में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई जिसमें पहली बार सभी चित्र कागज पर मिथिला शैली में चित्रित किए गए थे । तभी से मिथिला पेंटिंग ने संपूर्ण विश्व में अपनी अद्भुत पहचान बनाई । बिहार देश का पहला राज्य है जिसमें अभी तक 16 पद्मश्री सम्मान लोक कलाकारों को मिले हैं जिसमें से 9 मिथिला पेंटिंग को मिले हैं।

पद्मश्री अशोक विश्वास की कृति (टिकुली शैली )

तो ऐसी है बिहार की सात्विक भाव भूमि। राजस्थान में आए तीन पद्मश्री कलाकारों में सबसे अनुभवी कलाकार लगभग 82 वर्ष की पद्मश्री बौआ देवी जी से जब बात हुई तो उनका उत्साह, सहजता जो कलाकार 11बार जापान गया हो उसका जरा सा भी अहम नहीं, बस तूलिका थिरक रही थी कैनवस पर जापान की मीठी मीठी यादों के साथ I मिथिला शैली को विस्तार देती हुई जब पद्मश्री दुलारी देवी से बात हुई यही भाव उनकी चेतना में समाहित थे । इन दोनों लोक कलाकारों के बचपन को वेदना ने सहेजा, इतना ही नहीं रंगहीन सामाजिक परंपराओं ने दशा और दिशा बदल दी किंतु शुद्ध कर्मशील आत्माएं कभी विचलित नहीं होती कोई न कोई पतवार मिल ही जाता है । कुछ ऐसा ही हुआ इन दोनों और ऐसी बहुत सी लोक कलाकारों के साथ, किसी को पद्मश्री कर्पूरी देवी मिली, किसी को अन्य गुरु ।

सिकी कला

टिकुली शैली अद्भुत शैली है, इसकी सौंदर्यात्मकता का इतिहास मौर्य काल से जुड़ा हुआ है, इसका सौंदर्यबोध जो टिकुली के रूप में बिहार में स्थापित हुआ। इस की कलात्मक यात्रा टिकुली कलाकार पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास जी ने बताई जो बहुत ही रोचक हैं। कैसे ये कला पृष्ठभूमि के कगार पर थी और फिर कैसे इसे सहेजा गया। टिकुली माथे पर लगाने वाली बिंदी उस युग में शीशे के टुकड़े पर गोल्डन फॉयल लगाकर उस पर चित्र बनाए जाते थे,  जिसको महिलाएं माथे पर लगाती थी, फिर कुछ बदलाव आया शीशे के बड़े टुकड़ों पर फॉयल चढ़ाकर चित्र बनाए जाने लगे और वो शो पीस के रूप में आगे, इसके बाद लकड़ी फिर एमडीफ पर  इनेमिल पेंट आ गया। तभी आप ने गुरु से 20 वर्षों तक ये कला सीखी फिर इसे गांव गांव जाकर सिखाया। आज तक में लगभग 8000 महिलाएं ये कला सीख चुकी हैं।

सुजनी शिल्प

सुजनी शैली लोक की सहज अभिव्यक्ति है। धागे की अद्भुत बुनावट कलाकार की योजना और सतह पर टेक्चर को उत्पन्न करते जाना जिससे ये बिहार की अद्भुत लोक कला के रूप में विस्तारित  हुई। इसी प्रकार कशीदाकारी कला, सिकी कला, सभी अद्भुत धैर्य वाली हैं। इन सभी बिहार की लोक कलाओं को देख कर एक बात तो स्पष्ट हुई कि यदि आप सहज, सरल संवेदनशील हैं तो माध्यम कुछ भी हो, वो सौंदर्य से स्वतः भर जाएगा, लोक में मिलावटी वृत्तियां नहीं हैं तभी तो लोक कला संवेदनाओं का ही प्रतिरूप है । ऐसी ही हैं बिहार की लोक कलाएं ।

आधुनिकता क्या है ? यह इन लोक चित्रों में स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती है। इन लोक कलाकारों को तो यह भी नहीं पता कि अमूर्तन क्या है? या विश्व में किन-किन परिस्थितियों में अनेक वादों का जन्म होता चला गया। मैं यहां यह स्पष्ट कर रही हूं कि भारत सांस्कृतिक दृष्टि से अमूर्तन को प्रारंभ से ही धारण किए हुए हैं अमूर्तन एक भाव है जो कलाकार की चेतना में बिंबो का सृजन करता चलता है उसमें सिर्फ और सिर्फ हमारी आंतरिक चेतना चलायमान रहती है। यही इन कलाकारों के चित्रों को देखकर अनुभव किया जा सकता है कि जैसे बिंब पर बिंब वैदेही के जीवन के आसपास से ही उगते चले गए हों।

बिहार संग्रहालय के अपर निदेशक श्री अशोक कुमार सिन्हा जी ने बताया कि सांस्कृतिक दृष्टि से, लोक कला की दृष्टि से बिहार बहुत समृद्ध है । उन्होंने बताया कि सीता विषय को हम लोगों ने ये सोचकर लोक कलाकारों से चित्रण करवाया था कि जितना समर्पण विश्व में राम का रहा है, किंतु सीता का समर्पण उससे कम नहीं है इस संवेदना को लेकर इन चित्रों का सृजन किया गया। प्रदर्शनी में शामिल सभी कृतियाँ बिहार म्यूजियम, पटना में एक सप्ताह के लिए आयोजित एक कला शिविर में रचे गए थे । आगे एक महत्वपूर्ण जानकारी भी मिली कि मधुबनी पेंटिंग का सबसे बड़ा संग्रहालय जापान में है, यह हमारे देश के लिए गर्व का विषय है।

-अन्नपूर्णा शुक्ला

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