विमला आर्ट फोरम, गुड़गाँव द्वारा 12 जुलाई 2025, शनिवार को कंचन कला दीर्घा में लोक चित्रकला प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया। यह प्रदर्शनी 14 अगस्त तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। यहाँ प्रदर्शित सभी कलाकृतियाँ विमला आर्ट फोरम के निजी संग्रह से ली गई हैं।
सामान्यतः कला प्रदर्शनियाँ आज कला-जगत का नियमित हिस्सा बन चुकी हैं, परंतु इस आयोजन को विशेष दृष्टि से देखा जाना चाहिए। क्योंकि आज भी लोक चित्रकला और लोक कलाकारों को कला-जगत की मुख्यधारा से प्रायः अलग कर देखा जाता है। यह विडंबना ही है कि जिन कलाओं की जड़ें हमारी सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ी हैं, उन्हें अक्सर ‘मुख्यधारा’ के बाहर रखा जाता है।

इन्हीं प्रश्नों के मद्देनज़र आयोजकों ने इस अवसर पर एक “लोक कला गोष्ठी” का भी आयोजन किया। यद्यपि इस गोष्ठी के लिए कोई पूर्व-निर्धारित विषय नहीं था, फिर भी कार्यक्रम के शीर्षक से यह स्पष्ट था कि संवाद का केंद्र लोक कला और लोक कलाकार ही रहेंगे।
हमारे यहाँ आज भी कला चर्चा और संवाद को अकसर कला महाविद्यालयों या अकादमियों का विशेषाधिकार मान लिया जाता है। जबकि आवश्यकता इस बात की भी है कि ऐसी चर्चाएँ कला प्रदर्शनियों के अवसर पर, कलाकारों की उपस्थिति में भी हों। इससे दर्शक और कलाकार के बीच एक जीवंत और अर्थपूर्ण संवाद संभव होता है।
मेरी व्यक्तिगत राय में, इस तरह के आयोजनों में परस्पर संवाद का एक सत्र अवश्य शामिल किया जाना चाहिए। क्योंकि अक्सर देखा गया है कि इस प्रकार की चर्चाएँ एकतरफ़ा हो जाती हैं — आमंत्रित वक्ता अपने विचार तो रखते हैं, लेकिन श्रोताओं की प्रतिक्रियाओं, सवालों और अनुभवों को सुनने या आमंत्रित करने का कोई प्रयास नहीं होता। संवाद का यह संतुलन ही किसी कला आयोजन को वास्तव में सहभागी और समावेशी बनाता है।
इस दृष्टि से विमला आर्ट फोरम का यह आयोजन न केवल लोक चित्रकला के प्रति एक गंभीर कलात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है, बल्कि यह भी बताता है कि लोक कलाकारों को केंद्र में रखकर की गई कला चर्चा, हमारी सांस्कृतिक समझ को कितना समृद्ध और व्यापक बना सकती है।
गोष्ठी के लिए आमंत्रित वक्ताओं में वरिष्ठ कलाकार व कला-समीक्षक अशोक भौमिक, वेद प्रकाश भारद्वाज, सुमन कुमार सिंह, तथा फोकार्टोपीडिया के संस्थापक और लोक कला के समर्पित अध्येता सुनील कुमार शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कलाकार और समीक्षक जय प्रकाश त्रिपाठी ने किया।

सभी वक्ताओं ने लोक कला और लोक कलाकारों की वर्तमान स्थिति पर अपनी-अपनी दृष्टि से विचार प्रस्तुत किए। यद्यपि उनके स्वर भिन्न थे, परंतु सभी वक्तव्यों से जो समवेत स्वर निकलकर सामने आया, वह यह था कि – देश में लोक कलाओं को लेकर गहन अध्ययन और संस्थागत प्रोत्साहन की स्पष्ट कमी है, जिसे दूर किया जाना अत्यंत आवश्यक है।
वक्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि आज के समय में लोक कलाओं के लिए बाज़ार की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, परंतु साथ ही यह भी ज़रूरी है कि बाज़ार को लोक कलाओं का नीति-नियंता न बनने दिया जाए। क्योंकि लोक कला का मूल तत्व लोक की चेतना, परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं की सामूहिक अभिव्यक्ति है – न कि किसी उत्पाद की बिक्री-योजना। अतः यह अनिवार्य हो जाता है कि समाज और बाज़ार के बीच संतुलन बनाते हुए लोक कलाओं को एक गरिमामयी स्थान दिया जाए।
इस संवाद-सत्र के आयोजन के लिए विमला आर्ट फोरम, कंचन मेहरा, वरिष्ठ कलाकार दिलीप शर्मा तथा फोरम से जुड़े सभी मित्र साधुवाद के पात्र हैं। ऐसे आयोजन, जो मुख्यधारा की स्थापित लीक से हटकर होते हैं, वास्तव में भविष्य की कला-संभावनाओं के सूत्रधार बनते हैं। और यह विश्वास किया जा सकता है कि इस तरह की पहल आने वाले समय में लोक कलाओं को लेकर एक नए विमर्श को जन्म देंगी।
इन्हीं विचारों की निरंतरता में प्रस्तुत है लोक कलाओं पर एक विस्तृत आलेख, जो इस संवाद को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
लोक चित्रकला का वैश्विक सन्दर्भ और भारत:
लोक चित्रकला, जिसे अंग्रेज़ी में Folk Art या Popular Painting गया है, यह किसी भी देश या संस्कृति की उस दृश्यात्मक परंपरा को कहा जाता है जो आम जनजीवन से जुड़ी होती है। ये कलाएं किसी औपचारिक कला शिक्षा के दायरे में नहीं आतीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होकर विभिन्न समुदायों में पनपती हैं। दुनिया के प्रत्येक हिस्से में किसी न किसी रूप में लोक कलाओं की मौजूदगी देखी जाती है I अलबत्ता इसकी एक प्रमुख विशेषता जो लगभग समान रूप से हर जगह देखने को मिलती है, वह है इसका शहरी क्षेत्र के अपेक्षाकृत दूरस्थ बसने वाले समाजों में इसका चलन I
लोक चित्रकला की वैश्विक उपस्थिति
- अफ्रीका: अफ्रीकी जनजातीय चित्रकला में दीवार चित्रों, मुखौटों और वस्त्रों पर बनी आकृतियों में जीवन चक्र, प्रकृति, और पूर्वजों की आराधना के संकेत मिलते हैं। ज़ुलु और डोगोन जनजातियों की कला विश्वभर में सराही जाती है।

- लैटिन अमेरिका: मैक्सिको, पेरू, बोलिविया आदि देशों में लोक चित्रकला धार्मिक उत्सवों, मृतक की पूजा, और क्रांतिकारी इतिहास से जुड़ी होती है। फ्रीदा काहलो जैसे आधुनिक कलाकारों ने भी लोक शैली को अपने चित्रों में स्थान दिया।
- यूरोप: पोलैंड की Wycinanki (कागज़ काटकर बनाई गई चित्रकला), रूस की Matryoshka Dolls पर बनी चित्रकला, और स्कैंडिनेवियन देशों की शिल्प-कला लोक परंपराओं से प्रेरित रही हैं। मध्यकालीन चर्चों की भित्ति-चित्रकला भी अनेक बार लोक शैली के करीब रही है।
- पूर्वी एशिया: चीन की Nianhua (नववर्ष पर बनने वाली चित्रकला), जापान की Ukiyo-e (woodblock prints), और इंडोनेशिया की Wayang Kulit जैसी छाया चित्र परंपराएं लोक जीवन, धर्म और मिथकों से जुड़ी हुई हैं।
- ऑस्ट्रेलिया: Aboriginal Art—ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी चित्र परंपरा, जो ‘डॉट पेंटिंग’ (बिंदुओं से बनी चित्रशैली) के लिए विख्यात है, प्राकृतिक स्थलों और पूर्वजों की स्मृति को रेखांकित करती है।

वैश्विक लोक चित्रकला में समानताएं और विविधताएं :
- अधिकांश लोक चित्रकलाओं में प्रकृति, धर्म, लोककथाएं, और सामूहिक स्मृति के तत्व मिलते हैं।
- रेखाओं और रंगों का उपयोग प्रतीकात्मक होता है, जैसे—लाल रंग ऊर्जा या जीवन का, काला मृत्यु या रहस्य का, और पीला शुभता का संकेतक हो सकता है।
- इन चित्रों में perspective (दृश्य-गहराई) का अभाव सामान्य है, लेकिन इससे दृश्य भाषा की प्रभावशीलता कम नहीं होती।
- हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट सामग्री (जैसे कागज़, लकड़ी, दीवार, वस्त्र), माध्यम (जैसे प्राकृतिक रंग, चारकोल, मिट्टी) और तकनीक होती है।
आधुनिकता और वैश्वीकरण का प्रभाव :
उन्नीसवीं शताब्दी में जब उपनिवेशवाद और औद्योगिकीकरण ने गति पकड़ी, तब यूरोपीय कलाकारों ने गैर-पाश्चात्य (non-western) और ‘प्रिमिटिव’ कला की ओर आकर्षण दिखाया। पिकासो, मातिस जैसे आधुनिकतावादी कलाकारों ने अफ्रीकी मास्क, ऑस्ट्रलियाई आदिवासी कला और जापानी प्रिंट से प्रेरणा ली। इससे लोक और आदिवासी कलाओं को नया दृश्य मंच मिला। वहीं, बीसवीं शताब्दी में लोक चित्रकला का उपयोग राजनीतिक, पहचान संबंधी और सामाजिक आंदोलनों में भी हुआ—जैसे मैक्सिको की म्यूरलिस्ट परंपरा, जिसने जनसंपर्क और साक्षरता के लिए दीवार चित्रों का सहारा लिया।

संग्रहालय, बाज़ार और बिचौलियों की भूमिका : लोक चित्रकलाएं पहले केवल स्थानीय परंपराओं का हिस्सा थीं, लेकिन अब वे अंतरराष्ट्रीय संग्रहालयों, गैलरियों और नीलामघरों में अपनी जगह बना चुकी हैं। Smithsonian Museum (USA), Musée du quai Branly (France) जैसे बड़े संस्थानों ने लोक और जनजातीय कलाओं को संग्रहित और प्रदर्शित करना शुरू किया। किन्तु इसके साथ यह भी देखने को मिलता है कि— कलाकारों को अक्सर यथोचित श्रेय या पारिश्रमिक नहीं मिलता। स्थानीय विविधताएं ‘ब्रांडिंग’ के दबाव में समरूपता की ओर धकेली जाती हैं। लोक चित्रकला को ‘अलगाववाद’ या ‘एथनिक’ टैग देकर मुख्यधारा से बाहर रखा जाता है।
वैश्विक मंच पर लोक चित्रकला की स्थिति : लोक चित्रकला अब ‘हाशिये की कला’ नहीं रही। यह न केवल सांस्कृतिक विविधता की वाहक है, बल्कि आज की राजनीतिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक जटिलताओं को भी स्वर देती है। लेकिन इसके सामने चुनौतियाँ भी हैं—संवेदनशीलता का अभाव, व्यावसायीकरण का दवाब, और स्थानीय कलाकारों के अधिकारों की उपेक्षा।
वैश्विक कला जगत को अब यह समझने की आवश्यकता है कि लोक चित्रकला सिर्फ एक ‘मनोहर दृश्य शैली’ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता, स्मृति और अस्मिता की चित्रभाषा है।
लोक चित्रकला का भारतीय सन्दर्भ : भारत की सांस्कृतिक परंपरा में चित्रकला का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह परंपरा केवल महलों, मंदिरों या पांडुलिपियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सामान्य जनजीवन का भी अभिन्न अंग रही है। भारत की लोक चित्रकला परंपरा, जो ग्राम्य संस्कृति से उपजी और वहीं पनपी है, न केवल दृश्य सौंदर्य का सृजन करती है, बल्कि यह सामाजिक स्मृति, धार्मिक विश्वासों, पर्यावरणीय चेतना और सामूहिक कल्पना की भी संवाहक है।
लोक चित्रकला की परिभाषा और पहचान : लोक चित्रकला उस दृश्य कला को कहते हैं जो स्थानीय समाजों द्वारा परंपरागत रूपों, तकनीकों और प्रतीकों के माध्यम से सृजित की जाती है। इसे आमतौर पर पेशेवर कलाकार नहीं, बल्कि समाज के भीतर जन्मे चित्रकार, स्त्रियाँ, किसान, गायक, पुजारी और अन्य लोक समूह तैयार करते हैं। ये चित्र दीवारों, कपड़ों, कागजों, मिट्टी, लकड़ी, पत्तियों आदि पर बनाए जाते हैं, और इनका उपयोग विवाह, त्योहारों, अनुष्ठानों और सामाजिक अवसरों पर किया जाता है।
प्रमुख भारतीय लोक चित्रकला परंपराएं: भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोक चित्रकला की समृद्ध परंपराएं विकसित हुई हैं। कुछ प्रमुख शैलियों में निम्नलिखित उल्लेखनीय हैं:

- मिथिला चित्रकला (बिहार): बिहार के मिथिला क्षेत्र की यह शैली ज्यादातर स्त्रियों द्वारा बनाई जाती है। इसमें प्रकृति, देवी-देवता, रामायण और महाभारत के प्रसंग, विवाह और फसल उत्सव प्रमुख विषय होते हैं। यह शैली गहरे रंगों, सूक्ष्म रेखाओं और ज्यामितीय आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है।
- पिछवाई और फड़ चित्रकला (राजस्थान): पिछवाई चित्रों में श्रीनाथजी की उपासना से जुड़े प्रसंग होते हैं, जबकि फड़ चित्रकला में लोक देवताओं जैसे पाबूजी या देवनारायण की वीरगाथाएं चित्रित होती हैं। ये चित्र चलते-फिरते कथावाचकों (भोपाओं) के लिए पोर्टेबल मंदिर का कार्य करते हैं।
- वारली चित्रकला (महाराष्ट्र): यह जनजातीय शैली सरल आकृतियों—त्रिभुज, वृत्त, वर्ग—के माध्यम से दैनिक जीवन, खेती, त्योहारों और नृत्य का चित्रण करती है। सफेद रंग से लाल मिट्टी पर चित्रित ये दृश्य अद्भुत लय और सौंदर्य रचते हैं।
- पटचित्र (उड़ीसा और पश्चिम बंगाल): ये चित्र वस्त्रों, पत्तों, ताड़पत्रों या लकड़ी पर बनाए जाते हैं। इनमें कृष्णलीला, दशावतार, रामकथा जैसे विषयों का प्रमुखता से चित्रण होता है। गायन और वाचन के साथ प्रस्तुत ये चित्रकथाएं बहु-माध्यमीय लोक परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
- संज्ञा और कांगड़ा शैली से प्रभावित लोक चित्रकला (हिमाचल प्रदेश): यहाँ की चित्रकला लोक देवी-देवताओं, लोक कथाओं और प्राकृतिक दृश्यों के चित्रण में रची-बसी है।
लोक चित्रकला की विशेषताएं :
- सामूहिक स्मृति और अनुभव की अभिव्यक्ति: लोक चित्रकार अपने समाज की सामूहिक चेतना को दृश्य रूप में प्रस्तुत करता है। ये चित्र व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक कल्पना के प्रतीक होते हैं।
- धार्मिक और अनुष्ठानिक उद्देश्य: लोक चित्रों का प्रमुख उद्देश्य धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों, विवाह आदि में भाग लेना होता है। ये चित्र देवी-देवताओं को बुलाने, आशीर्वाद पाने और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने के लिए बनाए जाते हैं।
- प्रतीकों और रंगों का सांस्कृतिक अर्थ: हर रंग, आकृति और प्रतीक का विशेष अर्थ होता है—जैसे लाल रंग शक्ति और विवाह का प्रतीक है, हरा हरियाली और पुनरुत्थान का, पीला शुभता और ब्रह्मा का।
- मौखिक परंपरा से जुड़ाव: लोक चित्रकला अक्सर गायन, कथा और नृत्य के साथ जुड़ी होती है। चित्र को केवल देखा नहीं जाता, बल्कि सुना और अनुभव भी किया जाता है।
लोक चित्रकला की वर्तमान स्थिति :

बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब ‘आधुनिक भारतीय कला’ शहरी मध्यवर्गीय दर्शकों और अंतरराष्ट्रीय गैलरी प्रणाली के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई, तब लोक चित्रकला एकबार फिर उपेक्षित होने लगी। परंतु संचार क्रांति और वैश्विक कला बाजार के फैलाव ने एक नया मोड़ दिया। आज कई लोक कलाकार ऐसे हैं जिन्होंने पारंपरिक विधाओं को नए विषयों और प्रयोगों के साथ प्रस्तुत किया है। उनके चित्रों में परंपरा के साथ आत्मकथात्मक, पर्यावरणीय और सामाजिक सरोकार भी जुड़ते हैं।
हालांकि, लोक चित्रकला के इस पुनरुत्थान के साथ कई आलोचनात्मक प्रश्न भी जुड़े हैं—क्या यह कला अब भी समुदायों की सामूहिक चेतना से जुड़ी है, या वह केवल गैलरी/बाजार के लिए ‘फिट’ बनाई जा रही है? क्या कलाकार अब भी अपने समाज के लिए चित्र बना रहे हैं या अब वह ‘आर्ट वर्ल्ड’ के लिए अनुकूलित हो चुके हैं?
लोक चित्रकला और कला बाज़ार :
लोक चित्रकला की बढ़ती लोकप्रियता ने उसे कला बाजार में एक प्रमुख स्थान दिलाया है। पर यह भी देखा गया है कि कई बार कलाकारों को वास्तविक लाभ नहीं मिलता, जबकि बिचौलिये और गैलरी मालिकों को आर्थिक लाभ होता है। साथ ही, कई बार ‘लोक कला’ की एकीकृत ब्रांडिंग के चलते स्थानीय विविधता और विशिष्टता खोने लगती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई बार लोक कलाकारों को उनकी ‘वास्तविक’ शैली में चित्र बनाने के लिए बाध्य किया जाता है, जिससे रचनात्मक स्वतंत्रता बाधित होती है।
भारतीय लोक चित्रकला परंपरा न केवल हमारी सांस्कृतिक विविधता की साक्षी है, बल्कि यह आज भी जीवंत, गतिशील और सामूहिक चेतना की वाहक है। इसके भीतर जीवन का उल्लास, श्रम की गरिमा, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और आत्मा की सहज अभिव्यक्ति मौजूद है। परंतु अब आवश्यकता है कि इसे न केवल संरक्षण मिले, बल्कि आलोचनात्मक समझ और कलात्मक सम्मान भी दिया जाए—ऐसा सम्मान जो इसे महज “लोक” नहीं, बल्कि जीवंत “लोक सौंदर्यशास्त्र” का अंग माने।
-सुमन कुमार सिंह
