वरिष्ठ कला समीक्षक/ कला इतिहासकार जोनी एमएल,अपने बेबाक लेखन के माध्यम से आलोचना के उन तमाम जोखिम को उठाते हैं I जिससे सामान्य तौर पर बचने या परहेज़ का चलन इन दिनों कुछ ज्यादा ही देखा जा रहा है I दरअसल उनका लेखन हमारे सामने यह प्रश्न भी खड़ा करता है कि क्या कला लेखन या समीक्षा का आशय सिर्फ अभिनन्दन पत्र लिखना है ? या उससे इतर हटकर उसकी खामियों और खूबियों पर बात करना भी I यहाँ प्रस्तुत है जनगढ़ सिंह श्याम की कला परंपरा पर उनके फेसबुक पोस्ट का हिंदी अनुवाद I -संपादक
Johny ML
कला और मनोरंजन उद्योग में ‘ब्लॉकबस्टर शो’ जैसी एक अवधारणा होती है। जिसे सामान्यतः किसी फिल्म की सफलता से जोड़कर देखा जाता है I बहरहाल जब किसी फिल्म या कार्यक्रम में बहुत सारे दर्शक आते हैं, खासकर वे लोग भी जो आम तौर पर ऐसे कार्यक्रमों या फिल्म में रुचि नहीं लेते हों I पर अब इसलिए देखने जाते हैं क्योंकि बहुत से अन्य लोग भी इसे देखने जा रहे हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि हर शो के सारे टिकट आसानी से बिक जाते हैं, इसलिए लोग जल्दी से लाइन में लगते हैं, और इस तरह से वह शो या कार्यक्रम जनता की मांग के कारण लंबे समय तक जारी रहता है। तो इस तरह का एक ब्लॉकबस्टर शो अपने आप में एक बदलावकारी चरित्र लिए होता है, जो दर्शकों की संख्या और धारणा दोनों में कई बदलाव लाता है।
सामान्य तौर पर संग्रहालयों और दीर्घाओं में नियमित शो भी होते हैं और ब्लॉकबस्टर शो भी। लेकिन अक्सर ब्लॉकबस्टर शो में कुछ अप्रत्याशित सा होता है। अगर किसी शहर में पाब्लो पिकासो या सल्वाडोर डाली की कोई चित्र प्रदर्शनी हो, तो जगह की परवाह किए बिना लोग उन्हें देखने आते हैं, क्योंकि वे इन मशहूर नामों के बारे में सुन चुके होते हैं। लेकिन कुछ शो ऐसे भी होते हैं, जिनमें कोई प्रसिद्ध व्यक्ति न तो प्रदर्शन में होता है और न ही दर्शकों में, फिर भी वे ब्लॉकबस्टर बन जाते हैं। क्योंकि एक दुसरे की जुबानी इस प्रदर्शनी की ख्याति फैलती है और लोग उसे देखने उमड़ पड़ते हैं। फिल्म उद्योग में जैसे नए नायकों को ब्लॉकबस्टर फिल्में स्थापित करती हैं, वैसे ही किसी ब्लॉकबस्टर प्रदर्शनी से कलाकारों को ख्याति मिलती है।
अब यदि मैं अपनी पिछली बातों के तर्ज़ पर कहूं, तो इन दिनों दिल्ली में एक ब्लॉकबस्टर प्रदर्शनी जारी है। जिसका शीर्षक है – ‘पाटनगढ़ में जारी है जनगढ़ कलम’। जैसा कि आप जानते हैं, जनगढ़ पाटनगढ़ (मध्यप्रदेश) के पहले प्रशंसित गोंड कलाकार थे I जिनकी खोज का श्रेय जे. स्वामीनाथन द्वारा भेजे गए उन कलाकारों या कलाविदों को जाता है, जिन्हें भारत भवन, भोपाल में स्थापित हो रहे रूपांकर संग्रहालय के लिए आदिवासी कला और कलाकारों की खोज के लिए भेजा गया था I जो रह रहे थे उन सुदूर अंचलों में I जनगढ़ की कला उस जनजातीय समाज की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, जिसे शुभ अवसरों पर दीवारों या उपलब्ध कागजों पर बनाया जाता था I और जब जनगढ़ ने प्रशंसा और ख्याति की ऊँचाइयों को छू लिया, तो यह कला ‘गोंड आर्ट’ के रूप में अत्यधिक चर्चित हो गई — लेकिन इसकी कीमत उन्हें अपनी खुशियों और अंततः अपने जीवन से चुकानी पड़ी।
आत्महत्या कभी-कभी लोगों को शहीद बना देती है। जनगढ़ कला और लालच का शिकार बन गया — शायद उन लोगों के लालच का, जो उसे दिशा दे रहे थे या उसके काम को संभाल रहे थे। मृत्यु ने उनकी शैली को कला इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज करवा दिया और चर्चित बना दिया। ऐसे में सीमित परिधियों से निकलकर यह कला व्यापक कला-जगत में प्रवेश कर गई। ‘कलम’ का अर्थ होता है ‘शैली’; जैसे मसीह कभी ईसाई नहीं थे और बुद्ध कभी बौद्ध नहीं थे, वैसे ही जनगढ़ कभी ‘जनगढ़ कलम’ के कलाकार नहीं थे। लेकिन जब उनकी मृत्यु ने उनकी ख्याति को स्थायी बना दिया, तो एक ‘कलम’ (शैली) को स्थापित कर दिया गया, और उनकी पत्नी, बेटियाँ, रिश्तेदार — यहाँ तक कि पाटनगढ़ के स्वाभाविक कलाकार भी उस ‘जनगढ़ कलम’ के अनुयायी बन गए।
जब बाज़ार में किसी कला की मांग होती है, तो उस शैली में चित्र भी अधिक बनने लगते हैं I उधर दुनियाभर में कला आज पुनरुत्थान की राह पर है। ऐसे में कलाकार और प्रमोटर पारंपरिक सामग्रियाँ, तकनीकें और गैर-परंपरागत कला की खोज में लगे रहते हैं। इसीलिए लोक और जनजातीय कला का भी पुनरुत्थान हो रहा है; ऐसे में इस ‘कलम’ या शैली को समकालीन कलाकारों के साथ-साथ खुद लोक और आदिवासी कलाकारों ने भी अपनाया है। यह चलन पिछले दस वर्षों से चल रहा है और कई गैलरियाँ जो पहले ‘कटिंग-एज आर्ट’ में विशेषज्ञ थीं, अब लोक और जनजातीय कला की प्रबल समर्थक बन गई हैं। ऐसे में जाहिर है कि इस तरह की कला के लिए एक विशेष प्रकार का ग्राहक वर्ग है और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। क्योंकि उन्हें कुछ ऐसा चाहिए जो सुंदर हो और विवाद से परे भी।
‘जनगढ़ कलम’ एक नया स्कूल (शैली) है, जैसे आलोचकों ने 19वीं शताब्दी से कलाशैलियों को पहचान दी और उन्हें ‘इज़्म’ से संबोधित किया । प्रदर्शनी से यह साफ़ झलकता है कि पाटनगढ़ के कलाकारों का यह सुसंगठित समूह बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया है, जिसकी ‘गोंड कला’ बेहद परिष्कृत है। जिसे कोई भी प्रशिक्षित दृष्टि जनगढ़ की असली ‘कलम’ से अलग करके पहचान सकती है। यह प्रदर्शनी इसलिए भी ब्लॉकबस्टर है क्योंकि इसमें प्रदर्शित सभी बीस चित्र बिक चुके हैं I और आयोजकों में से एक ने मुझे बताया कि अब हमारे स्टॉक में तीस और चित्र हैं, जिनकी बिक्री भी लगभग तय हो चुकी है।
अब सवाल है कि मैं इसे जनगढ़ सिंह श्याम की मूल शैली से अलग एक गढ़ा गया स्कूल क्यों कहता हूँ? दरअसल, कलाकारों के नामों में जो ‘श्याम’ उपनाम दिखाई देता है, वह एक ब्रांड नाम है, उनका असली उपनाम नहीं। क्योंकि बाज़ार ने गाँव के कलाकारों को यह सम्मानसूचक उपनाम अपने नाम में जोड़ने के लिए प्रेरित किया, ताकि उन्हें ‘जनगढ़ कलम’ से जोड़कर आसानी से पहचाना जा सके। यह कला भी या तो विकसित हुई है या ऑर्डर पर बनाई गई है, क्योंकि जनगढ़ श्याम की चित्रात्मक शैली में जो बिखरी हुई छवियाँ और उनके हल्के असंतुलन होते थे, जो रचना को गति देते थे — वे यहाँ पूरी तरह गायब हैं, और उनकी जगह साफ-सुथरी समरूपता, सलीकेदार रेखांकन, अच्छे रंग, यांत्रिक निष्पादन, अत्यधिक सुंदरता और मिश्रित (हाइब्रिड) छवियाँ ले चुकी हैं। ये छवियाँ मिश्रित हैं क्योंकि इसमें निहित लोक और जनजातीय कल्पनाएँ आमतौर पर छवियों को स्पष्ट रेखाओं के साथ ‘हिंदूकरण’ नहीं करतीं I जैसा कि हम इन चित्रों में वहां देखते हैं, जहाँ हाथी, साँप, पक्षी आदि को चित्रित किया गया है।
इस प्रदर्शनी का ब्लॉकबस्टर स्वरूप उत्साहजनक है क्योंकि यही तो हम समकालीन कला के लिए भी चाहते हैं। नीलामी घरों में आधुनिक कलाकारों के लिए भीड़ जुटती है और साथ ही लोक तथा जनजातीय कला के लिए भी लोग उमड़ते हैं। समकालीन कला वह क्षेत्र है जहाँ दर्शक सबसे कम आते हैं; यहाँ लोग सिर्फ सामाजिकता के लिए, पेज 3 में छपने के लिए और वही पुरानी हताशा व्यक्त करने के लिए आते हैं।
मुझे लगता है कि लोक और जनजातीय कला के पुनरुत्थान के प्रति यह अत्यधिक प्रेम एक बहुत गहरे और प्रासंगिक कारण से जुड़ा है, जो हमारे देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति से गहरे तौर पर संबंधित है I ये कलाकृतियाँ अर्ध-धार्मिक होती हैं जिन्हें हमारे देशवासी जीविका या सांस्कृतिक कारणों से आसानी से अपना लेते हैं, ये सुंदर और समरूप होती हैं, जो आपकी “सब ठीक है” वाली सकारात्मकता के भ्रम को पुष्ट करती हैं, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये कलाएँ गैर-विवादास्पद होती हैं जो ऐसे कलाकारों द्वारा बनाई जाती हैं जिनका मुख्यधारा के सामाजिक-राजनीतिक जीवन से कोई खास संबंध नहीं होता। वे खरीदारों और कला-संग्राहकों के साथ सौंदर्यशास्त्र या राजनीति पर बहस करने नहीं आने वाले। ऐसे में कोई भी खरीदार या संग्राहक इन चित्रों को अपनी दीवारों पर टाँग सकता है और पूरी तरह से शांतचित्त रह सकता है, और जब कभी किसी पार्टी का आयोजन हो, तो वे अतिशयोक्ति की हद तक इसकी प्रशंसा कर सकता है, जिससे यह साबित हो सके कि उनका यह विशिष्ट सौंदर्यबोध उनके अतिथियों की सतही पसंद से कहीं उच्चतर है।