क्या क्यूरेटर कलाकृतियों के स्वामित्व के अधिकारी होते हैं?

समकालीन कला की दुनिया में हाल के वर्षों में “क्यूरेटर” एक महत्त्वपूर्ण भूमिका के रूप में उभरा है। आज जब कोई सुधि दर्शक किसी प्रमुख कला प्रदर्शनी में जाता है, तो सबसे पहले वह जानना चाहता है—इस प्रदर्शनी को किसने क्यूरेट किया ? कलाकार, प्रदर्शनी और क्यूरेटर के इस रिश्ते ने जहाँ नई संभावनाएँ खोली हैं, वहीं कुछ जटिलताएँ भी सामने आई हैं। इन पर चर्चा अक्सर निजी दायरों में होती है, पर सार्वजनिक मंचों पर यह संवाद अभी भी अनुपस्थित है। ऐसे में जोनी एमएल द्वारा सोशल मीडिया पर इस विषय को उठाना एक सराहनीय पहल है। प्रस्तुत है मूल आलेख का हिंदी अनुवाद, इस उम्मीद और अपेक्षा के साथ कि कला-जगत इस चर्चा  को खुले मन से आगे बढ़ाए। — संपादक

Johny ML

कल कलाकार प्रकाश किशोर ने यह मुद्दा उठाया जब उन्होंने अपने एक दक्षिण अफ्रीकी कलाकार-मित्र की भागीदारी दिल्ली में आयोजित एक प्रदर्शनी में सुनिश्चित करवाई, जिसे एक प्रतिष्ठित क्यूरेटर ने क्यूरेट किया था जो मुख्यतः क्वीयर (समलैंगिक एवं अन्य) विषयों पर केंद्रित प्रोजेक्ट्स पर काम करती हैं। इस बीच दुर्भाग्य से उस कलाकार का निधन हो गया और उनके परिवार ने डॉक्टर किशोर से उनकी कलाकृतियाँ वापस मांगी। ऐसे में उन्होंने उस क्यूरेटर से संपर्क किया, लेकिन क्यूरेटर ने उन कलाकृतियों को लौटाने से इनकार कर दिया। डॉ. किशोर के अनुसार, उस क्यूरेटर का रवैया उद्दंड और अहंकारी था और उसने कलाकृतियाँ लौटाने में कोई रुचि नहीं दिखाई। किशोर ने मुझे बताया कि अब दिवंगत कलाकार का परिवार उस क्यूरेटर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रहा है।

बतौर क्यूरेटर, मेरे लिए यह स्थिति नई नहीं है। कभी-कभी कलाकार शिकायत करते हैं कि मैं समय पर उनकी कलाकृतियाँ वापस नहीं कर पाया। अक्सर यह विलंब मेरे कारण नहीं होता, अलबत्ता ऐसा तकनीकी या प्रशासनिक समस्याओं के कारण हो सकता है, लेकिन फिर भी वापस लौटाने की जिम्मेदारी मुझ पर भी आती ही है। एक क्यूरेटर के रूप में, मैं बतौर पारिश्रमिक न तो कोई कलाकृति स्वीकारता हूँ और न ही कोई कलाकृति अपने पास रखता हूँ I लेकिन अगर कोई कलाकार मुझे अपनी कोई कलाकृति उपहार स्वरुप देता है, तो मैं उसे खुशी-ख़ुशी स्वीकार लेता हूँ। कई बार बात यहाँ तक आ जाती कि जब मैं किसी प्रदर्शनी से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं होता, क्योंकि उसे किसी अन्य क्यूरेटर ने क्यूरेट किया होता है, तब भी कई कलाकार अपनी ऐसी शिकायतें लेकर मेरे पास आते हैं। आमतौर पर मैं ऐसे मामलों में शामिल होना पसंद नहीं करता। हालांकि, जब कभी मुझे लगता है कि किसी मामले में क्यूरेटर की जिम्मेदारी में चूक हुई है, तो मैं ऐसे खुले मंचों पर उसे उजागर करता हूँ।

मुझे याद है लगभग एक साल पहले, एक कलाकार ने एक क्यूरेटर के खिलाफ शिकायत पोस्ट की थी, कि क्यूरेटर ने उसकी कलाकृति को एक इस्तेमाल किए हुए अंडरवियर में पैक करके वापस भेजा है I वह क्यूरेटर मेरा मित्र था I फिर भी मैंने इस मामले की तहकीकात की और जब मुझे क्यूरेटर के खिलाफ फोटोग्राफिक सबूत मिले, तो मैंने खुले मंच से उस क्यूरेटर से आग्रह किया कि उसे कलाकार से माफी माँगनी चाहिए। लेकिन क्यूरेटर-मित्र ने माफी माँगने से इनकार कर दिया, और तो और कलाकार को किसी तरह का उचित स्पष्टीकरण देने से भी मना कर दिया। हालाँकि मुझे मालूम था कि वह क्यूरेटर-मित्र उस छोटी मूर्ति को गंदे अंडरवियर में पैक करने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं था। ऐसा संभवतः उन कलाकार-सहायकों में से किसी एक की शरारत रही होगी, जिन्होंने कलाकृतियों को वापस भेजने की जिम्मेदारी ली थी। फिर भी, मैंने उस क्यूरेटर से उस दिन के बाद बातचीत बंद कर दी।

देखा जाए तो क्यूरेटर कई प्रकार के होते हैं; मसलन एक तो संस्थागत क्यूरेटर जो दीर्घाओं, संग्रहालयों और अन्य संस्थानों में कार्य करते हैं, दुसरे होते हैं ऐसे स्वतंत्र क्यूरेटर, जो प्रोजेक्ट बनाते हैं, फंड जुटाते हैं और प्रदर्शनी या परियोजना को अंजाम देते हैं, और वहीँ कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो केवल इसलिए खुद को क्यूरेटर कहते हैं क्योंकि वे प्रदर्शनियाँ आयोजित करते हैं।

संस्थागत क्यूरेटरों की विशिष्ट भूमिकाएँ और ज़िम्मेदारियाँ होती हैं और वे किसी भी निर्धारित भूमिका या नियम से बाहर नहीं जा सकते। सामान्यतः वे कलाकृतियाँ लौटाने के लिए ज़िम्मेदार नहीं होते, क्योंकि यहाँ उनकी भूमिका केवल एक संपर्क-सूत्र वाली होती है और जिसका वे सिर्फ निर्वहन करते हैं I ऐसे में यदि कोई संग्रहालय या दीर्घा किसी कलाकृति को वापस भेजने में विफल होती है, तो वह एक संस्थागत विफलता मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में यहाँ उस क्यूरेटर की ईमानदारी या ज़िम्मेदारी पर सवाल नहीं उठता, जो केवल एक संपर्क सूत्र रहा है और कभी-कभी क्यूरेटर के साथ-साथ प्रबंधक या मध्यस्थ की भूमिका भी निभा रहा होता है।

अब रही बात स्वतंत्र क्यूरेटरों की तो इनके दो प्रकार होते हैं; एक, फ्रीलांसर जो संस्थानों और व्यक्तियों के लिए प्रदर्शनी क्यूरेट करने हेतु स्वयं को उपलब्ध कराते हैं। मैं स्वयं भी इसी श्रेणी में आता हूँ। दूसरे प्रकार के स्वतंत्र क्यूरेटर वे होते हैं जो आयोजक और क्यूरेटर दोनों की भूमिका एक साथ निभाते हैं। जहाँ पहले प्रकार के क्यूरेटर बिक्री या कमीशन में शामिल नहीं होते, वहीं दूसरे प्रकार के क्यूरेटर कलाकृतियाँ बेच सकते हैं और कमीशन साझा कर सकते हैं। बहरहाल यह क्यूरेटर और कलाकार के बीच का आपसी समझौता होता है। जाहिर है कि इन दूसरे प्रकार के क्यूरेटरों के मामले में, वे कलाकृतियाँ कलाकार/कलाकारों को वापस करने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। इसलिए वर्तमान मामले में, जब कलाकार का अचानक निधन हो गया है, तो उसकी कलाकृतियाँ उसके परिवार, उत्तराधिकारी या मध्यस्थ को सौंप दी जानी चाहिए।

भारत में बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) मौजूद हैं और कुछ समूह इन अधिकारों को लागू करने की दिशा में काम भी करते हैं, हालाँकि कलाकारों या बौद्धिक संपदा के मालिकों को इन अधिकारों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है I ऐसे में इन अधिकारों के प्रति सचेत समूह अपनी तरफ से कड़ी मेहनत तो करते हैं लेकिन अक्सर स्वतंत्र कलाकारों से उन्हें शायद ही उचित प्रतिक्रिया मिलती है। ऐसे में वे कलाकार जो किसी संस्था के साथ अनुबंधित होते हैं, बौद्धिक संपदा की चोरी या स्वामित्व के अधिकार से संबंधित समस्याओं के शिकार नहीं होते, क्योंकि उन्हें संस्थागत उपनियमों की वजह से सुरक्षा मिल जाती है।

तो जब स्वतंत्र कलाकार स्वतंत्र क्यूरेटरों के साथ काम करते हैं — विशेष रूप से उन क्यूरेटरों के साथ जो स्वयं प्रदर्शनियाँ भी आयोजित करते हैं — तो लेन-देन में पारदर्शिता होनी चाहिए, भले ही उनके बीच पहले से कोई लिखित समझौता न हो। क्युरेशन के मामले में इसे एक नैतिक प्रक्रिया कहा जाता है। क्योंकि ऐसी प्रदर्शनियों के मामलों में, यदि कलाकृतियाँ नहीं बिकती हैं, तो उनका स्वामित्व हमेशा कलाकार के पास ही रहता है। अब यदि कलाकार विदेश में रहता है या किसी कारण से संपर्क में नहीं है, तो क्यूरेटर को उन कलाकृतियों को सुरक्षित रखना चाहिए और कलाकार के परिवार से संपर्क कर उन्हें वापस भेजने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए। यदि कलाकृतियाँ किसी मध्यस्थ के माध्यम से आई हैं, तो उन्हें स्वाभाविक रूप से उसी मध्यस्थ के जरिये वापस भी भेजा जाना चाहिए।

किसी भी प्रदर्शनी में शामिल होने आई किसी कलाकृति पर क्यूरेटर का कोई स्वामित्व अधिकार नहीं होता, जब तक कि वह कलाकृति कलाकार या मध्यस्थ से विधिवत बिक्री अनुबंध और दस्तावेजों के आधार पर खरीदी न गई हो। यह कार्य नैतिकता एक ओर जहाँ पारदर्शिता सुनिश्चित करती है, वहीँ दूसरी ओर कलाकृति की उत्पत्ति को दर्ज करने की प्रक्रिया को मजबूती देती है। वर्तमान मामले में मेरी राय है कि संबंधित क्यूरेटर को कलाकृतियाँ वहीं लौटानी चाहिए जहाँ से वे आई थीं — यानी इस मामले में डॉ. किशोर को। क्योंकि नैतिक आचरण का यही तकाजा है I इसलिए यह किसी तरह के पाखंड और दोहरे मापदंडों को सहन नहीं किया जाना चाहिए।

अब अंत में जैसा कि एडी फ्रैंकल का कथन है — ज़रूरत पड़े तो ऐसे में कुत्ते के पिल्ले को दुत्कार भी देना चाहिए I

– जोनी एमएल

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