क्यों कला समीक्षक कभी-कभी भयभीत चूहा बन जाते हैं

कला समीक्षक और कला लेखक के अंतर पर प्रकाश डालते हुए, अपने इस लेख में वरिष्ठ कला समीक्षक/ इतिहासकार जोनी एमएल मौजूदा कला लेखन की उन कड़वी सच्चाईयों को उजागर कर रहे हैं I जिसे हमारा कला जगत महसूस तो करता है किन्तु जब बात इस पर चर्चा की आ जाये, तो दबी जुबान से इसे स्वीकारते हुए भी मुंह खोलने से साफ़ बचते नज़र आते हैं I -संपादक

Johny ML

पिछले कुछ दशकों से मैं कला, कलाकारों और कला बाजार तथा सामान्य जीवन में उनके व्यवहार के पैटर्न पर हास्यास्पद रूप से आत्म-धर्मी, बेहिचक और बेशर्म उपदेशात्मक लेखन करता आ रहा हूँ। कुछ लोग मेरी स्पष्टवादिता की सराहना करते हैं, जबकि कुछ लोग मेरी आलोचनात्मक टिप्पणियों को छिपकर या खुलेआम तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। जहाँ पहले प्रकार के लोग मुझसे और अधिक अपेक्षा रखते हैं, वहीं दूसरे प्रकार के लोग चुपचाप मेरी आलोचना के अचानक और लंबे समय से प्रतीक्षित अंत की कामना करते हैं।

ऐसे में मेरे प्रशंसक प्रायः वे कलाकार होते हैं जिनमें इतना शिष्टाचार और साहस होता है कि वे अपने भीतर झाँक सकें, बिना आक्रामक प्रतिक्रिया या अवसादजनक आत्म-भर्त्सना के फंदे में फंसे। क्योंकि वे ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपने अहं से समझौता कर लिया है, आत्म-विश्वास पाया है और आत्म-सुधार की क्षमता विकसित की है। कुछ कलाकार उम्र में मुझसे काफी वरिष्ठ हैं (मैं उन्हें सत्तर पार कहकर डायनासोर जैसा महसूस नहीं कराना चाहता), फिर भी वे मेरी आलोचनात्मक बातों पर गंभीरता से विचार करते हैं, भले ही वे जानते हों कि वे मेरी बातों के अनुसार खुद को बदलने वाले नहीं हैं।

कलाकार, अंततः कलाकार ही होते हैं; सबसे ख़राब कलाकारों में भी अपनी सीमाओं में कल्पना की सबसे सुंदर उड़ान होती है। लेकिन इस लेख में मैं अपने ही समुदाय के लोगों के बारे में बात करने जा रहा हूँ — यानी कला आलोचकों के बारे में। उनमें से कई लोग मेरे कट्टर अनुयायी हैं, भले ही वे खुलकर मेरी प्रशंसा कभी नहीं करते। उनमें से कुछ साहसी हैं और अवसर मिलने पर मुझे और आगे लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। एक और समूह ऐसे कला आलोचकों का है, जो हमेशा आलोचना के गिरते स्तर की शिकायत करते रहते हैं लेकिन कभी भी इसे स्पष्ट शब्दों में अपने लेखन में व्यक्त नहीं करते।

आगे बढ़ने से पहले मैं बताना चाहूँगा कि आजकल हम किस प्रकार की कला आलोचना कर रहे हैं या देख रहे हैं । सबसे पहले तो हमें कला आलोचना को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए उसे कला लेखन से अलग करना चाहिए। वैसे भी हमारे यहाँ कई कला लेखक हैं जो खुद को कला आलोचक कहते हैं। दरअसल कला लेखन, कला आलोचना नहीं है। कला लेखन हमेशा कला या कलाकार के बारे में होता है, जिसमें कोई आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं होता। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मैं इंडियन एक्सप्रेस में वंदना कालरा के लेखन को मानता हूँ। उनके लेख प्रायः उस बात को ही दुहराते हैं जो कलाकार ने कहा है या जो उसकी कला या उस कलाकार के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। ऐसे लेखों से पाठकों को कोई ठोस दृष्टिकोण या आलोचनात्मक मूल्यांकन नहीं मिलता।

कला आलोचना एक ऐसा लेखन है जिसमें कला आलोचक का दृष्टिकोण होता है, जो उसके अनुभव और कला के ऐतिहासिक समझ से पुष्ट होता है। दैनिक अखबारों में जो कॉलम छपते हैं, वे कला आलोचना हो सकते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे हमेशा ऐसा हों। इन दिनों अंग्रेज़ी के दैनिक अखबारों में भी अच्छे कला कॉलम नहीं मिलते। वरिष्ठ कलाकार, आलोचक और लेखक अशोक भौमिक एक हिंदी दैनिक अख़बार में कॉलम लिखते हैं, जिसे कला आलोचना का एक अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है। कभी-कभी अखबार, कला आलोचना के क्षेत्र के प्रसिद्ध नामों से किसी प्रसिद्ध कला व्यक्तित्व या कला आयोजन पर लेख लिखवाते हैं। लेकिन उनमें से अधिकतर लेख फीचर लेखन या ‘फील गुड’ कहानियों की तरह के होते हैं, जिन्हें बस रविवार को पढ़ने के लिए तैयार किया गया होता है।

दैनिक अखबारों, ऑनलाइन समाचार तथा सांस्कृतिक पोर्टलों में घटती जगह ने कला आलोचना और कला आलोचकों के लिए अवसरों को लगभग समाप्त कर दिया है। हालांकि, कई अन्य सोशल मीडिया मंचों पर सकारात्मक कला आलोचना के प्रयास किए जा रहे हैं। आज सोशल मीडिया पर भी सनसनीखेज़ लेखन का बोलबाला है, ख़ासतौर पर जब कोई सुपरस्टार आलोचक जैसे जैरी सॉल्ट्ज़ एक उदाहरण पेश करते हैं। लेकिन कोई भी सॉल्ट्ज़ की रत्ती भर भी नकल करने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि अधिकांश कला आलोचक सच बोलने से डरते हैं। वैसे भी उनमें से अधिकांश अब कैटलॉग लेखक बन गए हैं या फिर ऐसी पत्रिकाओं के लेखक, जिन्हें कला लॉबी द्वारा संचालित किया जाता है और जो बड़े कला मेलों या आयोजनों के दौरान विशेष अंक के रूप में प्रकाशित होते हैं।

वस्तुतः कैटलॉग लेखन एक प्रकार का प्रचारात्मक लेखन होता है जिसमें ‘वास्तविक’ कला आलोचकों की सेवाओं की आवश्यकता होती है। यह कैटलॉग लेखन, कला लेखन से कुछ ऊपर के स्तर का होता है किन्तु कला आलोचना से कुछ नीचे वाला, फिर भी उसमें कला आलोचना के कुछ अंश तो होते ही हैं I जाहिर है कि एक कैटलॉग की प्रस्तावना में कोई कला आलोचक संबंधित कलाकार की खराब सौंदर्यशास्त्रीय प्रस्तुति की कठोर आलोचना नहीं कर सकता। लेकिन वह अपेक्षाकृत सौम्य शब्दों (euphemisms) का प्रयोग करके संकेत दे सकता है, बिना उस आलोचनात्मक ढांचे को तोड़े, जिसे उसने स्वयं उस कलाकार के लिए खड़ा किया है। अक्सर कैटलॉग लेखन पैसे के लिए किया गया कार्य होता है और एक इंसान तथा पेशेवर के रूप में यहाँ आपको वही लिखना पड़ता है जिसकी अपेक्षा की जाती है।

अब सवाल उठता है कि आखिर ये कला आलोचना क्या है ? दरअसल कला आलोचना का मकसद सार्वजनिक क्षेत्र में प्रस्तुत कलाकृतियों को जवाबदेह बनाना होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में प्रदर्शित कोई भी कलाकृति, अपने दर्शकों की परवाह किए बिना, संस्कृति का एक प्रतीक होती है। ऐसे में संस्कृति की जाँच-पड़ताल, विश्लेषण और ज़रूरत पड़ने पर उसमें सुधार का सुझाव ऐसे में आवश्यक हो जाता है I कोई भी सांस्कृतिक उत्पाद, चाहे वह चित्रकला हो, मूर्तिकला, फ़ोटोग्राफ़ी, इंस्टॉलेशन या परफ़ॉर्मेंस, वह एक व्यक्तिपरक सोच की प्रक्रिया का परिणाम होता है। कलाकार की यह व्यक्तिपरकता जो उसकी कलाकृति में परिलक्षित होती है, वह ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और टकरावों से निकला हुआ एक संश्लिष्ट सार होती है। जरुरी नहीं कि सभी ऐतिहासिक शक्तियाँ सकारात्मक ही हों। ऐसे में कुछ बातें मानव सभ्यता की मूलभूत समझ और विवेक के विरुद्ध भी जा सकती हैं। तो ऐसी स्थितियों को प्रश्नों के घेरे में लाना और स्पष्ट करना ज़रूरी होता है। और यहाँ इन तथ्यों को उजागर करना ही कला आलोचक का काम है।

मैं ‘संदर्भ की तानाशाही’ विषय पर चर्चा करता रहा हूँ (जैसा कि ब्रिटिश आलोचक एडी फ्रैंकल ने प्रस्तावित किया है)। कला आलोचना केवल संदर्भ तक सीमित नहीं होती। किसी भी कलाकृति के दो प्रकार के सौंदर्यशास्त्रीय मूल्य होते हैं; पहला, औपचारिक सौंदर्यशास्त्र, जो कलाकृति की बनावट और उसके निर्माणात्मक तत्वों से संबंधित होता है। दूसरा, आंतरिक सौंदर्यशास्त्र, जो कलाकृति के ‘अर्थ’ को दर्शकों के सामने प्रकट करने में सक्षम होता है। पहला सौंदर्यशास्त्र इस बात से जुड़ा होता है कि दर्शक या आलोचक उस कलाकृति को अपने चक्षुओं से कैसे ग्रहण करता है, उसकी संरचना के ज़रिये उसमें व्यक्त भावनाओं, स्मृतियों और विचारों से कैसे जुड़ता है, वहीं दूसरा पहलू उन कारणों और गतिशीलताओं की पड़ताल करता है, जिन्होंने उस कलाकृति की रचना को संभव बनाया। जो आलोचक पहले पहलू पर ही रुक जाता है, वह कलाकृति के ऐतिहासिक सार को समझने में विफल रहता है। और दूसरी तरफ जो आलोचक पहले वाले सौंदर्य पक्ष को बिल्कुल नहीं देखता, वह संदर्भ का ग़ुलाम बन जाता है। ऐसी स्थिति में एक अच्छा आलोचक जो करता है — वह है मध्य मार्ग को अपनाते हुए, अपनी सारी बुद्धि और संवेदनशीलता को एकत्र कर कलाकृति को महसूस करता है और फिर उसे अपने लेखन से प्रकट करता है I

हमारे कला आलोचक ऐसा नहीं कर रहे हैं। क्योंकि वे ऐसा करने से डरते हैं। समकालीन समय में सबसे अधिक सराही और अपनाई जाने वाली कला ‘आलोचना’ दरअसल ऐसा लेखन है, जिसमें लेखक अपने विषय से जुड़े व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करने में सारी ऊर्जा झोंक देता है। इस तरह की लेखन शैली में आत्म-कथात्मक कल्पना (auto-fiction) की विशेषताएँ और कोमलता होती है, क्योंकि कुछ समय बाद जब पाठक उस दौर से दूर हो जाते हैं जिसकी चर्चा उस लेखन में की गई होती है, तब लेखक असली घटनाओं को कल्पना में ढालने लगता है और कल्पना को असल जैसा दिखाने लगता है। लोगों को यह पसंद आता है। असल में, पाठकों को बच्चों जैसा बना दिया जाता है — जैसे वे किसी दादाजी से पुराने ज़माने की कहानियाँ सुन रहे हों, जिसमें उनकी बहादुरी, जीत और कारनामों का ज़िक्र हो।

कला को कल्पना में ढालना या कलाकारों के इर्द-गिर्द कहानियाँ बुनना कुछ मामलों में मददगार होता है, क्योंकि ऐसी कहानियाँ कलाकृति की प्रामाणिकता और उत्पत्ति को मज़बूत आधार देने के लिए जरूरी मानी जाती हैं। हालांकि, इन सब बातों का कला आलोचना में अधिक योगदान नहीं हो पाता । यहाँ तक कि कला आलोचना के नाम पर की गई भारी-भरकम अकादमिक लेखन भी यही काम करता है, बस यहाँ मंच बदल जाता है I कला आलोचना को आत्म-कथात्मक, अकादमिक बड़बड़ाहट या गपशप का माध्यम बना देना, अंततः स्वयं से कला आलोचना की हत्या करने जैसा है। मैं जेरी सॉल्ट्ज़ और हाल फोस्टर के कला कॉलम पढ़ने की कोशिश कर रहा था — पहले प्रसिद्ध कला आलोचक हैं और दूसरे प्रसिद्ध अकादमिक आलोचक। मेरी समझ से वे बेहद अपठनीय हैं। सॉल्ट्ज़ का लेखन बस घटनाओं पर उनके निजी प्रभाव होते हैं, जिन्हें विचित्र भाषा शैली से सजाया गया होता है। वहीँ फोस्टर की बौद्धिकता उनके आलोचनात्मक लेखन को अत्यंत गूढ़ और अपारदर्शी बना देती है।

अब आइए मैं अपने कला आलोचकों और भारत में कला आलोचना की मौत को लेकर उनकी कभी न खत्म होने वाली शिकायतों की बात करूँ। मेरा तो मानना है कि, कला आलोचना ज़िंदा है लेकिन आलोचक खुद सिधार गए हैं। क्योंकि ऐसे में शिकायतें करने के बजाय वे स्वयं वैसा क्यों नहीं लिखते, जैसा वे वास्तव में लिखना चाहते हैं ? वैसे सच तो यह भी है कि आजकल कला आलोचकों के पास लिखने के लिए पर्याप्त मंच नहीं हैं। कुछ कला पत्रिकाएं सिर्फ गुटबाज़ी के बल पर चलती हैं और कुछ अन्य पत्रिकाएं किसी तरह अपने को जिंदा रखे हुए है, और अक्सर कलाकारों से मिलने वाले सहयोग से चलाया जाता है। यहाँ तक कि अब कला आलोचना में किसी तरह के पारिश्रमिक की गुंजाईश नहीं बची I (बेशक, कैटलॉग लेखन, क्यूरेटर निबंध और प्रचार लेखन के लिए भुगतान होता है। मेरा आशय यह नहीं कि कला आलोचक सस्ते होते हैं)। लेकिन अगर आप कला आलोचना करना चाहते हैं तो डरने की क्या ज़रूरत है? आप बस अपना सोशल मीडिया अकाउंट खोलिए और उस पर लिखिए — जैसा कि मैं वर्षों से करता आ रहा हूँ।

जो कला आलोचक गैलरियों और कलाकारों की चुपचाप शिकायतें करते रहते हैं, वे दरअसल अब भी उनसे कुछ पाने की उम्मीद रखते हैं। मेरे हिसाब से, अगर आप उनसे कुछ उम्मीद कर रहे हैं तो यह वैसा ही है जैसे लोकोक्ति में एक लोमड़ी मोटे अंडकोषों वाले सांड के पीछे इस उम्मीद से चल रही हो — इस आशा में कि कभीन कभी वे उसके मुंह में गिर जाएँगे! कला दीर्घाएं या ऐसी ही संस्थाएं कला आलोचना को न तो समर्थन देंगी, न प्रचारित करेंगी और न ही उसमें पैसा लगाएंगी — इसलिए कृपया इस भ्रम में न रहें। सीधे शब्दों में कहें तो आपके पास खोने को कुछ नहीं है। इसलिए मैं उन सभी लेखकों से जो कला आलोचक बनना चाहते हैं अपेक्षा करता हूँ— वे बड़े लोगों का डर छोड़ें और जो मन में है, वही लिखें।

कला दीर्घाएं अब तेजी से केवल देखने के कमरों में बदलती जा रही हैं। धन-सम्पन्न मुख्यधारा की गैलरियाँ अब अपने कला उद्घाटन कार्यक्रम कुछ दिनों के लिए बीकानेर हाउस, इंडिया हैबिटैट सेंटर या त्रावणकोर हाउस जैसे प्रसिद्ध स्थानों पर करती हैं और फिर शो को अपनी गैलरी में ले जाती हैं, जहाँ वे कलाकृतियाँ आम जनता से अचानक हटा ली जाती हैं और केवल इच्छुक दर्शकों और खरीदारों को ही दिखाई जाती हैं। वहीँ कुछ अन्य गैलरियाँ अब अपने ग्राहकों के अलावा किसी और को निमंत्रण तक नहीं भेजतीं। क्योंकि अब कला प्रदर्शनियाँ पूरी तरह से निजी आयोजन बन चुकी हैं। तो ऐसे में अगर आप कला आलोचना करते हैं तो आप क्या खोते हैं? जाहिर है कुछ भी नहीं।

जोनी एमएल

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