बहु-विषयक कला या अर्थहीन स्वतंत्रता?

जोनी एम. एल. भारतीय समकालीन कला जगत के एक प्रमुख कला समीक्षक, लेखक और क्यूरेटर हैं। वे तीखे, निर्भीक और वैचारिक रूप से स्पष्ट लेखन के लिए जाने जाते हैं, जो कला, संस्थागत संरचनाओं और बाज़ार-प्रेरित प्रवृत्तियों पर आलोचनात्मक प्रश्न उठाता है। उनके लेख समकालीन कला की वैचारिक अस्पष्टताओं, औपनिवेशिक विरासत और तथाकथित नवाचारों की सीमाओं को उजागर करते हैं। जोनी एम. एल. ने अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों और बिएनालों के संदर्भ में भारतीय कला की भूमिका पर लगातार टिप्पणी की है। उनका लेखन आलोचना को केवल सौंदर्यबोध तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक विमर्श से जोड़ता है। यहाँ प्रस्तुत है उनकी हालिया टिप्पणी का हिंदी अनुवाद -संपादक

‘मल्टीडिसिप्लिनरी यानी बहु-विषयक कलाकार’ एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही  मेरे चेहरे पर विद्रूप सी मुस्कान आ जाती है।

क्योंकि यह मुझे साफ़-साफ़ कहता है—‘हे आलोचक, मुझसे किसी भी चीज़ के प्रति प्रतिबद्धता की उम्मीद मत रखो, सिवाय इन मुद्दों पर मेरी दो कौड़ी की राय के जिनसे मैं अपना काम चला लेता हूँ I ऐसे में तुम्हारी राय मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती।’

अलबत्ता ‘मिक्स्ड मीडिया’ उतनी चुनौती नहीं देता। अगर आप इसे ध्यान से देखें तो उसमें थोड़ा ऐक्रेलिक, थोड़ा कपड़ा, कुछ टिशू पेपर, थोड़ा तेल, कुछ मुद्रित सामग्री, कुछ वुडकट, कुछ टहनियाँ, थोड़ा फेविकोल, कुछ चारकोल, थोड़ा धातु और न जाने और भी क्या-क्या यहाँ मिल सकता है। फिर भी यह आलोचक या दर्शक के लिए सोचने-समझने का कोई न कोई संकेत छोड़ देता है।

मल्टीडिसिप्लिनरी यानि बहु-विषयक यहाँ ‘इंटरडिसिप्लिनरी’ यानि अंतःविषयक का क़रीबी रिश्तेदार है, जिसका मतलब है कि आप अपने काम के बारे में कुछ भी कर या कह सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद इस प्रक्रिया में आप संबंधित विधा के अनुशासनों से बंधे रहते हैं।

उदाहरण के लिए, आप एक प्रशिक्षित प्रिंटमेकर हैं, लेकिन आपकी रुचि वास्तुकला में भी है। तो ऐसे में आप वास्तुकला के तत्वों को अपनी कलाकृति में—या तो अवधारणात्मक रूप से या सामग्री के तौर पर प्रयुक्त करते हैं।

यहाँ अगर मैं खेल का रूपक इस्तेमाल करूँ, तो यह सब इंटरडिसिप्लिनैरिटी डेकैथलॉन की तरह है; जिसमें कई खेलों के माध्यम से आपकी सहनशक्ति की परीक्षा ली जाती है। लेकिन वहाँ जीतने का एक निर्धारित लक्ष्य तय रहता है।

वहीँ मल्टीडिसिप्लिनैरिटी फुटबॉल के किसी ऐसे खेल की तरह है जहाँ खिलाड़ियों को मनमर्ज़ी से गोलपोस्ट बदलने या सीमा रेखा के बाहर कहीं भी गेंद मारकर उसे गोल घोषित कर देने की छूट होती है।

“हम एक ऐसे कलाकार को देखते हैं जो कुछ देर तक चित्रकारी करता है और अचानक कविता पाठ करने लगता है और फिर प्रदर्शन करता है, और अंत में कुछ वस्तुओं का परिचय देता है और नैनो-प्रौद्योगिकी की तकनीकी शब्दावली का उपयोग करके उन्हें समझाता है, ताकि कलाकार की पर्यावरणीय चिंताओं से जुड़कर आप शांति महसूस कर लें I

मैं दक्षिण भारत में चल रही एक बिएनाले में प्रदर्शित एक कलाकार का काम देख रहा था, जहाँ कलाकार ने गैलरी की दीवारों के पास कुछ सूखी टहनियाँ रखी थीं और उसका शीर्षक दिया था—‘बॉम्बे डक’। अब चूँकि हम सभी जानते हैं कि बॉम्बे डक एक खास तरह की मछली है। इसलिए हम वहां मछली तलाशते हैं। लेकिन हमें वहां कोई मछली दिखाई नहीं देती।

फिर हम पढ़ते हैं कि यहाँ कलाकार ने सिलिका, ग्लास-ब्लोइंग और अन्य ऐसे रूपों का इस्तेमाल किया है, जहाँ कलाकार की साँस पृथ्वी के तत्वों को स्पर्श करती है।

हे भगवान! यानी कुछ भी ?

“फिर मैं उन सूखी टहनियों पर कांच से बनी चीजों को बेतहाशा ढूंढने लगता हूँ  और तब मुझे उन पर कुछ पिघला हुआ पदार्थ लटका हुआ मिलता है ।” यह ज़रूर मुंबई की कोलीवाड़ियों में सुखाने के लिए टँगी मछलियाँ होंगी।

मुझे लगता है कि पराग टंडेल ने इससे कहीं बेहतर काम किया है।

हे प्रभु ! मुर्खता की भी कहीं कोई सीमा तो होनी चहिये……….

— जोनी एम.एल.

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