स्मृतियों के बहाने : प्रो. दिनकर कौशिक

लखनऊ स्थित कला एवं शिल्प महाविद्यालय एक ऐसा महान कला संस्थान रहा है जहां एक से बढ़कर एक दिग्गज कलाकारों का अन्य प्रदेशों से आगमन होता रहा है। सिर्फ आगमन ही नहीं बल्कि कितनों ने यहां से शिक्षा हासिल कर देश दुनिया में कलाकार के रूप मशहूर भी हुए। चूंकि यह संस्थान देश के चार ऐतिहासिक कला संस्थानों में से एक रहा है। जिसके कारण आज भी हम उन महान कलाकारों को और उनके योगदान को निरन्तर याद करते हैं। इस संस्थान के सिर्फ प्रिंसिपल या  प्राध्यापक ही नहीं बल्कि यहां से अनेक छात्रों  ने  भी कलाकार के रूप में अपने आपको स्थापित किया और पहचान बनाई।

Bhupendra Asthana

मुझे इस बात का गर्व है कि मैं भी इसी महाविद्यालय का छात्र रहा हूं। जब भी यहां से जुड़े कलाकारों के बारे में लिखने पढ़ने और वरिष्ठ जनों से बात करने और इसके प्रांगण में घूमने का मौका मिलता है तो बहुत ही सुंदर अनुभव होता है I ऐसे में उस वातावरण को भी महसूस करता हूँ जब ये सभी कलाकार यहां रहे और अपना योगदान इस संस्थान को उच्च स्तर पर ले जाने में दिया है।

एक ऐसे ही कलाकार इस संस्थान में रहे जिन्हें उनके महत्वपूर्ण भूमिका के लिए याद किया जाता है। प्रो. दिनकर कौशिक जी । जिनका जन्म 7 अप्रैल 1918 में धारवाड़ कर्नाटक में हुआ था। 1935 में पुणे स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मॉडर्न आर्ट से 1941- 46 शांतिनिकेतन से शिक्षा हासिल की। भारतीय कला परिदृश्य में ये एक महत्वपूर्ण कलाकार रहे। कौशिक जी कला एवं शिल्प महाविद्यालय लखनऊ में 1964 से 1967 तक प्राचार्य पद पर रहे। उसके बाद शांतिनिकेतन के कला भवन में प्राचार्य बने और 1978 में सेवानिवृत हुए।

विभिन्न स्थानों पर अपना कर्मस्थली बनाते हुए चित्र,शिल्प की रचना की साथ ही कला संबंधी समीक्षात्मक लेखन कार्य करते हुए स्वतंत्रोतर भारत की आधुनिक कला को प्रगतिशील दिशा भी दी। कौशिक जी हिंदी, अंग्रेजी, कन्नड़,मराठी, बांग्ला भाषा  के अच्छे जानकार थे। इसलिए उनका लेखन अनेक भाषाओं में मिलता है। वे वरिष्ठ कलाकार के. एस. कुलकर्णी के मित्र भी थे। विदित है कि कुलकर्णी जी ने बनारस को एक महत्वपूर्ण स्तर पर लाने में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। यह एक सुखद संयोग है कि दोनों के जन्म की तारीख एक है। कलाकार सार्वभौमिक होता है। उसकी सोच कला के हित में होता है। वह दायरों में बंधता नहीं बल्कि दायरों को तोड़ता है। यदि कौशिक कुछ और समय लखनऊ में रहे होते तो कला महाविद्यालय का दृश्य और स्थिति कुछ और होता।

अपने कार्यकाल में कौशिक जी सभी अध्यापकों को रियाज़ करने के लिए कहा करते थे। उसके लिए प्रयास भी किया। वे अध्यापकों को निरन्तर प्रैक्टिस करने के पक्ष में थे। उन्होंने समकालीन कला प्रथाओं को नया रूप दिया। सुधीर खास्त्गीर और दिनकर कौशिक ऐसे दो व्यक्ति थे, जिन्होंने लखनऊ कला महाविद्यालय में एक बड़ा परिवर्तन लाया । 64 में नैशनल डिप्लोमा में आर्ट हिस्ट्री विषय को जोड़ा। कौशिक जी लिखने पढ़ने में भी काफ़ी रुचि रखते थे।

वास्तव में किसी भी कलाकार को याद करना ही उसे जीवित रखना है और उसके शताब्दी वर्ष को बड़े धूमधाम से मनाना भी हम कलाकारों की एक ज़िम्मेदारी बनती है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा नही हो पा रहा। बहरहाल 2018 में दिनकर कौशिक जी का जन्मशती वर्ष था I संयोग से वे लखनऊ में बहुत कम समय ही रहे लेकिन इतने समय में ही कई बड़े परिवर्तन लाने में सफल रहे । उन्होंने बड़ा योगदान दिया था लखनऊ के कला परिदृश्य में । लेकिन उनकी जन्मशती पर लखनऊ में  कोई विशेष आयोजन नही किया गया, इस बात का मुझे दुख है।

-भूपेन्द्र अस्थाना 

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