स्मृतियों का आलोक : नन्द किशोर खन्ना को श्रद्धांजलि

21 मार्च 2026 को वरिष्ठ कलाकार, कला समीक्षक एवं शिक्षाविद् नन्द किशोर खन्ना जी की 9वीं पुण्यतिथि एक गहन स्मृति और आत्मीय श्रद्धांजलि का अवसर बनकर उपस्थित हुई। यह केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि उस व्यक्तित्व के पुनर्स्पर्श का क्षण है, जिसने असंख्य जीवनों को कला की दिशा, दृष्टि और संवेदना प्रदान की।

भूपेन्द्र कुमार अस्थाना

मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि आदरणीय खन्ना जी (15 अगस्त 1939 – 21 मार्च 2017) ने ही मुझे हिंदी में कला लेखन की राह पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनका प्रोत्साहन केवल शब्दों तक सीमित नहीं था—उन्होंने कला के सूक्ष्म व्याकरण, उसकी अंतर्ध्वनियों और अभिव्यक्ति के अनुशासन को समझने की दृष्टि दी। उनके साथ संवाद करना मानो कला के गूढ़ आयामों के द्वार खोल देना था, जहाँ विचार केवल विचार नहीं रहते, बल्कि अनुभूति में रूपांतरित हो जाते थे।

वे अपने समय और परंपरा के जीवंत दस्तावेज़ थे। कला महाविद्यालय के पुराने छात्रों, उनके संघर्षों और सृजन की कथाओं को वे जिस आत्मीयता से साझा करते थे, उनमें कला इतिहास की अनकही परतें जीवंत हो उठती थीं। उनकी स्मृति केवल तथ्यों का संग्रह नहीं थी, बल्कि अनुभवों की वह ऊष्मा थी, जो सुनने वाले के भीतर सृजन की नई चेतना जगा देती थी।

नन्द किशोर खन्ना

उनका व्यक्तित्व केवल एक कलाकार या समीक्षक तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक ऐसे मार्गदर्शक थे, जिन्होंने कला को जीवन के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की संवेदनशील दृष्टि दी। उनके लिए कला कोई पेशा नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सत्य थी—एक ऐसी साधना, जिसमें वे अपने अंतिम क्षणों तक संलग्न रहे।

15 अगस्त 1939 को कानपुर में जन्मे खन्ना जी ने अपनी कला शिक्षा राजकीय कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ से (पाँच वर्षीय डिप्लोमा—1964, पोस्ट डिप्लोमा कला इतिहास—1967) प्राप्त की तथा 1976 में कानपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (चित्रकला) किया। उनकी शैक्षिक यात्रा जितनी सुदृढ़ थी, उतनी ही व्यापक उनकी अध्यापन यात्रा भी रही।

उन्होंने 1968 से 1970 तक आईआईटी कानपुर में अध्यापन किया। 1978 से 1982 तथा 1983 से अंतिम समय तक कला महाविद्यालय, लखनऊ में विषय विशेषज्ञ के रूप में स्नातक एवं परास्नातक स्तर पर कला इतिहास का अध्यापन किया। 1980 से 1982 तक गोरखपुर विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रवक्ता रहे तथा 1999 से 2014 तक इंटीग्रल विश्वविद्यालय, लखनऊ में अपनी सेवाएँ दीं। इस दीर्घ शैक्षिक यात्रा में उन्होंने केवल ज्ञान का संप्रेषण नहीं किया, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर कला-दृष्टि का विकास किया।

नन्द किशोर खन्ना के दो दृश्य चित्र

प्रशासनिक और तकनीकी क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा। 1970 से 1988 तक उन्होंने प्रदर्शनी अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए कला आयोजनों को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। इसके बाद 1988 से 1997 तथा पुनः 1998 से 1999 तक उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी, लखनऊ के सचिव पद पर रहते हुए उन्होंने संस्थान को नई ऊर्जा, दृष्टि और संगठनात्मक मजबूती प्रदान की।

उनकी कला-साधना और योगदान को समय-समय पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। 1965 में उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला पुरस्कार एवं उत्तर प्रदेश कलाकार संघ का रजत पदक, 1976 में स्वर्ण पदक तथा 1977 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार उनके प्रारंभिक उत्कर्ष के प्रमाण हैं। 1979 में समकालीन कला विभूति, आजमगढ़ सम्मान प्राप्त हुआ। आगे चलकर 2006 में महाराष्ट्र कलाकार सम्मान, 2007 में दूरदर्शन केंद्र, लखनऊ सम्मान, 2013–14 में राज्य ललित कला अकादमी सम्मान तथा 2016 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘कला भूषण’ से उन्हें अलंकृत किया गया। इसके अतिरिक्त, चित्रकला में शोध हेतु उन्हें सीनियर फेलोशिप भी प्रदान की गई।

भूपेन्द्र कुमार अस्थाना एवं नन्द किशोर खन्ना

लगभग छह दशकों के अपने सृजनात्मक, शैक्षिक और प्रशासनिक जीवन में उन्होंने न केवल कला का सृजन किया, बल्कि उसे संगठित, संरक्षित और प्रसारित करने का भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। विशेष रूप से युवा कलाकारों को मंच प्रदान करने के उनके प्रयास कला-जगत में लंबे समय तक स्मरण किए जाते रहेंगे।

वास्तव में, कलाकार कभी नहीं मरते—वे अपनी कृतियों, विचारों और शिष्यों के माध्यम से जीवित रहते हैं। नन्द किशोर खन्ना जी ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिनकी स्मृतियाँ आज भी कला-जगत में एक प्रकाश-स्तंभ की तरह मार्गदर्शन करती हैं। उनका जीवन इस सत्य का साक्ष्य है कि सच्ची कला-साधना समय की सीमाओं को लांघकर अनंत में विलीन हो जाती है—और वहीं से वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी नई चेतना का आलोक बनकर प्रस्फुटित होती रहती है।

 -भूपेंद्र कुमार अस्थाना

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