एक मुलाकात महादेव टोप्पो दादा से

लगभग दस साल के अन्तराल पर इस बार अपना रांची आना हो पाया, इससे पहले जब आया था तब सहपाठी चुनाराम हेम्ब्रम नवोदय विद्यालय से जुड़े हुए थे और रांची से दूर कहीं पदस्थापित थे I इसलिए एक बार भी मुलाकात नहीं हो पायी थी I किन्तु इस बार स्थितियां थोड़ी अलग थीं क्योंकि हेम्ब्रम इन दिनों रांची में ही निवास कर रहे हैं I तो रांची पहुंचते के साथ ही तय हुआ कि 10 तारीख यानी रविवार को वे पूरे दिन साथ रहेंगे I ऐसे में शहर में जिन लोगों से मिलने का कार्यक्रम तय हुआ उसमें शामिल थे महादेव टोप्पो और दिनेश सिंह I महादेव दादा से परिचय हुआ था हेम्ब्रम के ही बदौलत किन्तु अभी तक जितनी भी बातचीत हुयी थी, सब टेलीफोन के माध्यम से ही I वहीँ दिनेश दा से परिचय की वजह है उनका कलाकार होना I किन्तु बारिश एवं अन्य वजहों से दिनेश दा से कल मुलाकात तो नहीं हो पायी, किन्तु महादेव दादा के साथ दुपहरिया बिताने का सुअवसर अवश्य मिला I जिसमें बातचीत के सत्र के साथ शामिल था दोपहर का भोजन भी, क्योंकि दादा का यही आदेश था  I

दादा के अध्ययन कक्ष में

महादेव दादा और हेम्ब्रम के आपसी परिचय की दास्तान कुछ ऐसी है कि उसकी थोड़ी सी चर्चा यहाँ आवश्यक है I जिन दिनों हम कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटना के छात्र हुआ करते थे, उस दौरान बिहार में पहली बार अखिल भारतीय कला प्रदर्शनी का आयोजन पटना में हो रहा था I हम सभी छात्र अपने-अपने स्तर से इस प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए चित्र रचना में संलग्न थे I निश्चित तिथि पर सभी ने अपनी कृतियाँ प्रदर्शनी के लिए जमा कर दीं I अब इंतज़ार था प्रदर्शनी में चयनित और पुरस्कृत होने वाली कृतियों की घोषणा की I जब पुरस्कारों की घोषणा हुयी तो उसमें हम छात्रों में से अगर किसी का नाम इसमें था तो वह था चुनाराम हेम्ब्रम का, यह वर्ष था 1986 I हम मित्रों के लिए यह विशेष ख़ुशी का अवसर था कि हमारे एक सहपाठी की कृति को अखिल भारतीय पुरस्कार मिल रहा था I इस ख़ुशी की एक और बड़ी वजह थी कि हेम्ब्रम द्वारा क्लास वर्क से अलग किसी विषय को केंद्र में रखकर रची गयी यह पहली कलाकृति थी I

इस चित्र का विषय भी हमारे लिए अतिरिक्त उत्सुकता और जिज्ञासा वाला था, क्योंकि इसमें संताल समाज की विवाह परंपरा को चित्रित किया गया था I इस कलाकृति का शीर्षक था “खेरवाल बापला” I उस दौरान इस कृति की चर्चा हिंदी की सर्वाधिक चर्चित साप्ताहिक पत्रिका “दिनमान” के एक आलेख में हुयी थी I महादेव दादा उन दिनों बैंकिंग सेवा से जुड़े थे I बतौर साहित्यकार उनकी पहचान भी कायम हो चुकी थी, उन्हें इस चित्र और इसके विवरण ने इन्हें इतना प्रभावित किया कि “दिनमान” के उस अंक को संभाल कर रख लिया I इस क्रम में कलाकार चुनाराम हेम्ब्रम का नाम भी उनके ज़ेहन में भलीभांति दर्ज हो चूका था I किन्तु संयोग से इन दोनों की आपस में यह मुलाकात हालिया दशक में जाकर हो पायी I

महादेव टोप्पो जी और चुनाराम हेम्ब्रम

बहरहाल कल की हमारी मुलाकात और बातचीत का मुख्य विषय झारखण्ड के कला एवं संस्कृति पर केन्द्रित रहा I कला इतिहास से संबंधित कुछ जानकारियों के लिए मैंने अपनी वेबसाइट के कुछ पुराने पोस्ट शेयर कर दिए I कुछ अन्य विस्तृत जानकारियां जो उन्हें चाहिए थीं, उसके लिए मैंने वादा किया है कि उसे जुटाकर जल्दी ही भेज दूंगा I यूं तो हिंदी के साहित्य जगत में अधिकांश लोग उनके महत्व और योगदान से भलीभांति परिचित हैं, किन्तु किसी कारण से जो उनके बारे में जानना चाहें I उनके लिए chatgpt द्वारा उपलब्ध कराय गयी यह जानकारी यहाँ प्रस्तुत है

महादेव टोप्पो: एक परिचय

जन्म और पृष्ठभूमि : महादेव टोप्पो का जन्म 1954 में रांची के हुलसी गाँव में उरांव आदिवासी परिवार में हुआ था।

साहित्यिक योगदान: उन्होंने हिंदी और कुड़ुख (Kurukh) भाषा में कविताएं, लघुकथाएं, नाटक आदि लिखे हैं। इनके प्रमुख कार्यों में ‘जंगल पहाड़ के पाठ (कविता संग्रह)” और “सभ्यों के बीच आदिवासी (लेखों का संकलन)” शामिल हैं। जंगल पहाड़ के पाठ की कविताओं को अंग्रेज़ी, मराठी, संताली आदि में अनुवादित किया गया है, और इसके माध्यम से आदिवासी जीवन, पर्यावरण, जंगल, जमीन और विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों को अभिव्यक्त किया गया है।

चुनाराम हेम्ब्रम

अभिनय और अन्य रचनात्मक कार्य : महादेव टोप्पो ने नागपुरी फिल्म “बाहा” तथा कुड़ुख भाषा की लघु फिल्में “पहाड़” और Aidpa Kaana (While Going Home) में अभिनय भी किया है।

सम्मान और नियुक्तियाँ : उन्हें झारखंड इंडिजिनस पीपल्स फोरम द्वारा सम्मानित किया गया है और वे बिरसा मुंडा सम्मान के प्राप्तकर्ता भी हैं। नवम्बर 2023 में उन्हें साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली के मौखिक एवं आदिवासी साहित्य केंद्र की कार्यकारिणी समिति का सदस्य नियुक्त किया गया, जहाँ वे पांच वर्ष के लिए शामिल रहेंगे।

विचार और दृष्टिकोण : टोप्पो आदिवासी समाज और विकास संबंधी मुद्दों को संवेदनशीलता और आत्मा से देखते हैं। एक प्रसिद्ध उद्धरण है: “आदिवासी समाज विकास के खिलाफ नहीं है, लेकिन विकास के उस स्वरूप के खिलाफ है जो उनकी ज़मीन को नष्ट कर देता है, जो जीवन के बजाय धन कमाने को प्राथमिकता देता है।” उनकी कविताएँ अक्सर प्रकृति की रक्षा, आदिवासी अस्मिता और पर्यावरणीय चिंताओं के प्रति जागरूकता जगाती हैं।

-सुमन कुमार सिंह 

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