वरिष्ठ कलाकार मनोज अग्रवाल की एकल प्रदर्शनी इंडिया हैबिटैट सेंटर के विजुअल आर्ट गैलरी में 1 अगस्त से आरम्भ होकर आज यानी 5 अगस्त को समाप्त हो गयी I मनोज की इस प्रदर्शनी का शीर्षक है “साइलेंट व्यूअर ” यानी मूकदर्शक I कलाकार मित्र बिपिन कुमार और जय प्रकाश त्रिपाठी के साथ दोपहर 12 बजे हम वहां पहुंचे थे I मनोज से हमारी यह मुलाकात एक लम्बे अरसे बाद हो रही थी I वर्ष 1990 के आसपास जब अपना दिल्ली आना हुआ, उन दिनों बिपिन कुमार कॉलेज ऑफ़ आर्ट, दिल्ली में एमएफए ( पेंटिंग) की पढाई कर रहे थे I विदित हो कि बिपिन कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटना के पूर्व छात्र रह चुके हैं I इसी नाते उन दिनों दिल्ली कॉलेज ऑफ़ आर्ट में अपना भी आना-जाना लगा रहता था I मनोज अग्रवाल से आरंभिक परिचय इसी दौरान हुआ था I उस पीढ़ी के अन्य जितने भी कलाकारों को जानता हूँ, मनोज सदैव उनमें से कुछ अलग से दिखे I उनके चित्रों और रेखांकनों में मानव आकृतियाँ सामान्य से अलग दिखती हैं, अतिरिक्त मांसलता युक्त ये छवियाँ किंचित विरूपित स्वरुप में सामने आती हैं I अपनी भरपूर मानवीय संवेदनाओं और अभिव्यक्तियों के साथ I
मौजूदा प्रदर्शनी में मनोज के चित्रों व रेखांकनों के साथ-साथ विभिन्न माध्यमों यथा टेराकोटा, सेरामिक और धातु में सृजित मूर्तिशिल्प भी प्रदर्शित हैं I आज की मुलाकात में उनके चित्रों पर चर्चा के क्रम में बातचीत उनके धातु मूर्तिशिल्पों और खासकर उसपर लगी पाटीना या पातीना की परत पर होती रही I इन दिनों देखा जा रहा है कि धातु मूर्तिशिल्प हो या टेराकोटा शिल्प सभी के ऊपर रंग करने का चलन आम हो चूका है I कुछ मामलों में तो इलेक्ट्रोप्लेटिंग द्वारा बहुत पतली प्लेटिना परत मूर्ति पर चढ़ाई जाती है। सुबोध गुप्ता एवं अन्य कलाकारों के मूर्तिशिल्पों में स्टील की इस परत का भरपूर इस्तेमाल देखा जा सकता है I हालिया दिनों में तो यह भी देखा जा रहा है कि महापुरुषों की जो मूर्तियाँ शहरों के चौक चौराहों पर लगायी जाती हैं, उन पर भी रंग किये जाते हैं I जबकि आज से चार-पांच दशक पहले तक के धातु मूर्तिशिल्पों पर पारम्परिक ढंग से पाटीना या पातीना ही किया जाता था I इसकी एक बड़ी वजह यह भी होती थी कि इस तकनीक के प्रयोग से खुले आकाश के नीचे रखी जानेवाली ये प्रतिमाएं दशकों तक धूप और वर्षा सहने के बावजूद ज्यादा सुरक्षित रह पाती थी I मनोज की कला पर विशेष आलेख तो अभी लिखा जाना है, किन्तु इस लेख में विशेष चर्चा पारंपरिक पातीना (पाटीना) और उसकी तकनीक पर I

दरअसल पाटीना धातु की सतह पर बनने वाली वह परत होती है जो समय के साथ या रासायनिक प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न होती है। यह परत मूर्ति को एक विशिष्ट रंग, बनावट और सौंदर्य प्रदान करती है। जब यह परत रसायनों की सहायता से कृत्रिम रूप से बनाई जाती है, तो इसे केमिकल पाटीना कहते हैं। देखा जाए तो केमिकल पाटीना एक रासायनिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा तांबा, कांस्य (ब्रॉन्ज), पीतल (ब्रास) या अन्य धातुओं की सतह पर विशेष रसायनों को लगाकर रंगीन परत बनाई जाती है। यह परत ऑक्साइड्स, सल्फाइड्स या क्लोराइड्स से बनी होती है और यह मूर्ति को एक प्राकृतिक, प्राचीन या कलात्मक रूप प्रदान करती है।

इस प्रक्रिया में प्रयुक्त होनेवाले मुख्य रासायन और उसके प्रयोग की विधि कुछ इस प्रकार है :
| रसायन | प्राप्त रंग | प्रयोग की विधि |
| लिवर ऑफ सल्फर (Liver of Sulphur) | काला, नीला, बैंगनी | गरम पानी में घोलकर लगाते हैं |
| फेरिक नाइट्रेट (Ferric Nitrate) | सुनहरा, भूरा, नारंगी | स्प्रे या ब्रश से लगाते हैं |
| क्यूप्रिक नाइट्रेट (Cupric Nitrate) | हरा | गरम सतह पर स्प्रे करते हैं |
| अमोनियम सल्फाइड (Ammonium Sulphide) | नीला, हरा | वाष्प द्वारा |
| सल्फरिक अम्ल मिश्रण | गहरा काला | सावधानीपूर्वक प्रयोग करते हैं |

इस प्रक्रिया के पहले चरण में सतह की सफाई अच्छे से की जाती है I इसके लिए धातु की सतह को अच्छी तरह से साफ किया जाता है ताकि कोई चिकनाई, धूल या जंग सतह पर न रह जाए। इसके लिए आमतौर पर एसीटोन या डिटर्जेंट का उपयोग होता है। चूँकि केमिकल पाटीना कई बार गरम सतह पर ही कार्य करता है। इसलिए धातु को थोड़े तापमान तक गर्म किया जाता है। फिर इसके बाद रसायन को ब्रश, स्प्रे या कपड़े की सहायता से लगाया जाता है। कभी-कभी धातु को रसायन के घोल में डुबोया भी जाता है, खासकर जब मूर्ति का आकार छोटा हो। इस क्रम में जैसे-जैसे रासायनिक प्रतिक्रिया होती है, रंग उभरने लगता है। कलाकार अपनी इच्छानुसार या आवश्यकतानुसार रंग की तीव्रता को नियंत्रित करता है। अंतिम रूप में मोम या वार्निश लगाकर सतह को सील कर दिया जाता है ताकि पाटीना लंबे समय तक टिका रहे ।
इस रासायनिक पाटीना के लाभ की बात करें तो इससे जहाँ धातु को एक कलात्मक, प्राचीन एवं विशिष्ट रंग मिलता है। वहीँ इसके प्रयोग से सतह पर एक सुरक्षात्मक परत बन जाता है जो ऑक्सीकरण और नमी से मूर्तिशिल्प की रक्षा करता है। वस्तुतः रासायनिक पाटीना मूर्तिकला की एक ऐसी रचनात्मक तकनीक है जो कलात्मक सौंदर्य, संरक्षण और विविध रंग प्रभावों के लिए प्रयोग की जाती है। यह तकनीक धातु की मूर्तियों को न केवल आकर्षक बनाती है, बल्कि उन्हें समय के प्रभावों से भी बचाती है।
-सुमन कुमार सिंह


सुमन कुमार सिंह पटना कला महाविद्यालय की पौध हैं। दिल्ली के एक राष्ट्रीय दैनिक में कला निदेशक पद से सेवानिवृत्त के पश्चात् से वे पूर्णकालिक ‘ हिन्दी के कला लेखक /समीक्षक ‘ बन चुके हैं। मुझे सबसे अधिक सुखकर यही लगा क्योंकि कला पर लिखने वाले अधिकांशतः लेखक / समीक्षक कला शिक्षा से दूर का भी नाता नहीं रखते (!) , और दूसरे यह कि हमारे कला के छात्र-छात्राएं आदि अपने को हिन्दी भाषा के अधिक नजदीक पाते हैं। वहीं आम दर्शक को भी ‘कला’ के पास लाने के लिए यही भाषा ज्यादा सटीक है। कला वीथिकाओं में दर्शकों का टोटा दूर करने में एक हद तक यह या क्षेत्रीय (मातृ) भाषाएं सहज काम कर सकती हैं। यहां कोई भाषा-विवाद नहीं हैं क्योंकि हमारे हिन्दी सिनेमा ने ‘ हिन्दी ‘ की समझ हर भारतवासी में पैदा ही कर दी है। सुमन अपने लेखों / समीक्षाओं में सरल भाषा में सटीक विश्लेषण कर रहे हैं, विधा / तकनीक आदि के साथ।
इस लेख में भी उन्होंने मूर्तिकार मनोज अग्रवाल और उनकी कला पर विहंगम दृष्टि डाली है।
• अखिलेश निगम
सर,प्रणाम. आपका आशीर्वाद बना रहे. सादर शुभकामनायें