राह चलते चलते…

काश बादलों से भरे इस खूबसूरत आसमान के नीचे की जमीन भी इतनी ही साफ सफाक होती। ये पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले का रामपुर हाट नामक जगह है। कुछ रिपोर्ट बताती है कि यहां लगभग 350 क्रशर इकाइयां संचालित हैं। बंगाल, बिहार और झारखंड समेत तमाम राज्यों में होनेवाले भवन और सड़क निर्माण के लिए यहां की खदानों से निकले पत्थरों का इस्तेमाल होता है। इन खदानों और क्रशर इकाइयां की वजह से यहां के आसपास के आदिवासी गांवों का सामाजिक जनजीवन और कृषि क्षेत्र बेहद प्रभावित होता रहा है। भू और जल प्रदूषण तो रिपोर्ट देखकर समझ में आता है, किन्तु  वायुमंडलीय धूल बेहद कर्कश शोर और तेज कम्पन आप यहां से गुजरते हुए भी महसूस कर सकते हैं।

वर्ष 2022 में किए गए शोध का निष्कर्ष है कि यहां कार्यरत श्रमिकों में खांसी, बुखार, आंखों में जलन, त्वचा रोग और टीबी जैसी बिमारियां सामान्य बात है। क्योंकि श्रमिकों को किसी तरह के सुरक्षा उपकरण शायद ही दिए जाते हों। रामपुर हाट मेडिकल कॉलेज ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि यहां के मजदूरों के फेफड़ों में गंभीर संक्रमण के लक्षण मिलते हैं। बहरहाल इन तथ्यों के आलोक में इतना तो स्पष्ट है कि हमारी सुख सुविधाओं की कीमत ये आदिवासी और अन्य स्थानीय आबादी चुका रहे हैं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए जब इन्टरनेट और आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस की मदद ली, तो विवरण कुछ इस तरह का मिला :

प्रमुख अध्ययन और न्यायिक रिपोर्ट्स

  1. स्वास्थ्य और उपश्वसन जोखिम: स्पाइरोमेट्रिक अध्ययन (अप्रैल–जून 2024) – रामपुरहाट मेडिकल कॉलेज द्वारा कार्यरत श्रमिकों पर किया गया अध्ययन। इसमें पाया गया कि स्टोन क्रशर कार्यकर्ताओं में फेफड़ों के कार्य में गंभीर कमी देखी गई है, जिनमें पुरुषों तथा महिलाओं के BMI लगभग 17 के आसपास थे—जो आदर्श से बहुत कम है। यह अध्ययन “West Bengal Silicosis Control Programme” के तहत हुआ था । वहीँ न्यूज़क्लिक की रिपोर्ट (2024)बताती है कि रामपुरहाट स्वास्थ्य जिला में लगभग 60 सिलिकोसिस के मरीजों की पुष्टि हुई, जो इस क्षेत्र में गंभीर फेफड़ों की बीमारी का संकेत है ।
  2. पर्यावरणीय प्रदूषण और धूल कणों की विशेषता : एक वैज्ञानिक अध्ययन में पचामी–हटगाछा ( रामपुरहाट ब्लॉक) स्थित क्रशर ज़ोन में धूल कणों का विश्लेषण किया गया। तो पाया गया कि यहाँ पाए जाने वाले कण का आकार: 101–298 नैनोमीटर है — जो मानवीय फेफड़ों के लिए अत्यंत क्षतिकारक है। वहीँ सिलिका की मौजूदगी लगभग 76.85% है — जो साँस मार्ग से संबंधित रोगों का मुख्य कारण बन सकता है । इस अध्ययन ने “वेट ड्रिलिंग”, “कार्यक्रम के दौरान पानी छिड़कना”, और “व्यक्तिगत सुरक्षात्मक उपकरणों ” के उपयोग की जरूरत पर बल दिया गया है ।

  1. जल संकट और जीवन पर प्रभाव : India Water Portal के एक आलेख में बताया गया है कि:आसपास के क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर 180 फीट तक गिर गया है। इसके चलते ग्रामीणों को पानी के लिए 10 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है—जहां सांप का खतरा और अन्य सामाजिक जोखिम बढ़ जाते हैं। इस इलाके की खेती बर्बाद हो गई है, और कई मजदूरों को पलायन करना पड़ा है ।
  2. सामाजिक-आर्थिक स्थिति एवं जनजीवन में बदलाव : IOSR-JHSS (2021) के अध्ययन के में बताया गया है कि आदिवासी समुदायों के ग्रामीण जीवन में व्यापक बदलाव — पर्यावरण, सामाजिक, सांस्कृतिक और भौतिक स्तर पर पड़ा है साथ ही भूमि व जल संसाधनों में भारी कमी आई है जिसके चलते सामान्य जीवनशैली में कटौती, कृषि विरासत का क्षरण जैसी स्थिति आ गयी है ।

  1. न्यायिक और नियामक पहल : जो सामने आईं हैं, उसकी वजह से एनजीटी (National Green Tribunal) ने बीरभूम में अवैध स्टोन खनन और क्रशर इकाइयों पर मुकदमा चलाया है। आरोप है कि इन इकाइयों द्वारा पर्यावरणीय मंजूरी और Consent to Operate जैसी आवश्यक मंजुरियाँ नहीं ली गई हैं, जो “Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974” और “Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981” का स्पष्ट उल्लंघन है। दूसरी तरफ West Bengal Pollution Control Board द्वारा (30 जनवरी 2023) को यहाँ जारी अवैध खनन और धड़ल्ले से चल रही क्रशर इकाइयों के खिलाफ नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने हेतु मोनिटरिंग और रेगुलेटरी पावर्स को अधिकृत किया गया है । किन्तु इन सबके बावजूद वहां की सड़क से गुअज्रते हुए जो कुछ दिखा, उसकी सच्चाई आपके सामने है ।

-सुमन कुमार सिंह 

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