क्यूबा को गांधी का देश मानते थे सच्चिदानंद सिन्हा : अनीश अंकुर

सच्चिदानंद सिन्हा एक प्रमुख लेखक, चिंतक और वैकल्पिक विकास-दृष्टि के समर्थक थे। वे सामाजिक न्याय, समता और मनुष्य-केंद्रित विकास के प्रश्नों पर गहन चिंतन के लिए जाने जाते हैं। सोवियत मॉडल, पूँजीवाद और गांधीवादी विचार के तुलनात्मक विश्लेषण में उनकी विशेष रुचि थी। उनकी चर्चित कृतियों में Chaos and Creation (हिंदी: रूप व अरूप) उल्लेखनीय है, जिसमें कला और यथार्थ के संबंध पर गंभीर विमर्श मिलता है। वे व्याख्यानों, लेखन और संवाद के माध्यम से नई पीढ़ी को आलोचनात्मक सोच के लिए प्रेरित करते रहे। बिहार की बौद्धिक परंपरा में उनका विशिष्ट स्थान है। उनका जन्म वर्ष 1929 में बिहार में हुआ था। एवं निधन 19 नवम्बर 2025 को हुआ। वे अपने पीछे समृद्ध वैचारिक विरासत और अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियाँ छोड़ गए। प्रस्तुत है 20 सितंबर 2023 को मुजफ्फरपुर में सत्राची फाउंडेशन द्वारा उनके सम्मान में आयोजित कार्यकम में  संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर द्वारा दिया गया वक्तव्य I-संपादक

Anish ankur
  • नए ढंग के मौलिक चिंतक थे सच्चिदानंद सिन्हा : अनीश अंकुर
मैं सत्राची की फाउंडेशन को बहुत-बहुत बधाई इसलिए देना चाहता हूं कि आप लोगों ने इस सम्मान के लिए बहुत सही आदमी का चयन किया है । आदरणीय सच्चिदानंद सिन्हा मेरे भी  प्रिय लेखक हैं।
पटना में 15-16 वर्षों के दौरान मुझे कई बार उनका व्याख्यान सुनने का मौका मिला है। सन 2011 में इनके बहन के घर, उदय गिरि अपार्टमेंट में , जो पटना म्यूजियम के ठीक सामने है, उनसे लम्बे साक्षात्कार का मौका मिला था जो  पुस्तिका के रूप  में  ‘वर्तमान विकास में मुक्ति के प्रश्न’ नाम से अनुज्ञा प्रकाशन,  दिल्ली द्वारा प्रकाशित है।
भारत में सोवियत संघ से मोहाविष्ट रहने वाली एक कई पीढ़ियां रही है।  सच्चिदानंद सिन्हा जी से इस साक्षात्कार में सोवियत संघ, उसके विकास के मॉडल, बिहार की राजनीति सहित कई विषयों पर बातें हुई थी। सच्चिदानंद सिन्हा की मुख्य चिंता यह थी की आखिर सोवियत संघ क्यों बिखर गया ? उनका कहना था कि पूंजीवाद बहुत बुरा है लेकिन जो देश खुद को समाजवादी कहता है वह अगर विकास की उन्हीं पूंजीवादी मानकों पर खरा उतरने की कोशिश करता है, विकास का वही औद्योगिक मॉडल पेश करता है, ब्यूरोक्रेसी का वही ढांचा बरकरार रखता है तो अंततः वह, उसे, उसके विघटन की ओर ले जाता है। यह सच्चिदानंद सिन्हा जी की एक मुख्य प्रस्थापना थी।
ग्रीन टी शर्ट में अनीश अंकुर एवं बीच में सच्चिदानंद सिन्हा
हम लोग अब तक सुनते आए थे कि औद्योगीकरण के बिना तो दुनिया आगे बढ़ ही नहीं सकती है, प्रगति कैसे होगा ? सचिदानंद सिन्हा की प्रतिक्रिया थी कि देखिए पश्चिम में कुछ लोग जो खुद को अनार्किस्ट प्रिमिटिविस्ट कहा करते हैं, उनके अनुसार हमलोगों के आज के भोजन का जो इंटेक है वह  फल संग्राहक समाज से बेहतर नहीं है। हंटिंग और गैदरिंग समाज के अंदर प्रोटीन की मात्रा का उपभोग आज के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर था।  जिसे नियोलिथिक रिवॉल्यूशन कहा जाता है यानी जब से कृषि समाज अस्तित्व में आया; उस दौरान मनुष्य ने पशुओं को पालतू बनाना शुरू किया, उसे डॉमेस्टिकेट किया, इसी मुकाम पर आकर पशुओं के माध्यम से मनुष्य के अंदर बीमारियां आनी शुरू हुई।
मैंने सच्चिदानंद सिन्हा से उस इंटरव्यू में पूछा था तो क्या मनुष्य को फिर से फल संग्रह वाले समाज की तरफ लौटना चाहिए ? उनका जवाब था कि ना तो हमें फल संग्रह समाज की ओर लौटना चाहिए और न ही औद्योगिक समाज हमारा भविष्य हो सकता है, ऐसे में महात्मा गांधी हमें मध्य बिंदु की तरह दिखाई देते हैं। लेकिन महात्मा गांधी तो तकनीक का विरोध करते हैं?  सच्चिदानंद सिन्हा ने इस संबंध में एक दिलचस्प बात बताई  कि महात्मा गांधी टूल्स का, उपकरणों का विरोध नहीं करते थे भले वह मशीन के विरोधी थे। यदि कोई उपकरण मनुष्य के श्रम को आसान बनाता है उसकी उत्पादकता में इजाफा करता है तो महात्मा गांधी को उससे कोई दिक्कत नहीं थी। वे चार्ल्स डार्विन ( जिनकी महान किताब है ‘द औरजीन ऑफ स्पेसीज’) के पड़पोते,  (फेलिक्स करके उसका नाम था) का उदाहरण दिया करते थे।
फेलिक्स भारत में लंबे समय तक रहे और बॉक्साइट के इलाके का उन्होंने गहन अध्ययन किया था।  उनके अनुसार एक टन अल्युमिनियम पैदा करने में 1400 लीटर पानी की आवश्यकता होती है और बॉक्साइट एक ऐसी चीज है जिसके लिए आपको जमीन के बहुत अंदर जाने की जरूरत नहीं है वह उसकी सतह पर मिलता है। अतः जहां पानी की इतनी ज्यादा बर्बादी होती हो, विकास का यह मॉडल आगे नहीं बढ़ सकता है।
मैंने एक अन्य इंटरव्यू में उनसे  पूछा था कि आप गांधी की इतनी बात करते हैं। उनके विचार अव्यावहारिक से माने जाते हैं, क्या आज की जो दुनिया है क्या कोई ऐसा देश है जो गांधी के सिद्धांतों को अपने ढंग से फॉलो करने की कोशिश कर रहा है? उन्होंने जो जवाब दिया उससे मैं लगभग स्तब्ध सा  रह गया था। उन्होंने छूटते ही कहा कि “हां ! एक देश है और वह है क्यूबा।” मेरी प्रतिक्रिया थी क्यूबा ? वह तो एक कम्युनिस्ट देश है वह गांधी के सिद्धांतों को लागू करने वाला कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि ” देखिए भले ही क्यूबा पर अमेरिका ने कई दशकों से अमानवीय प्रतिबंध लागू किया हुआ है जिसे लेकर संयुक्त राष्ट्र में हमेशा उसकी मुखालफत की जाती है। जब अमेरिका ने तेल पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया तब क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो पूरे देश को साइकिल पर लेकर चले आए ताकि पेट्रोल पर निर्भरता कम किया जा सके। ट्रैक्टर के लिए जब तेल की कमी होने लगी पेट्रोल नहीं उपलब्ध होने लगा तब उन्होंने हल-बैल से खेती करनी शुरू कर दी। हवाना के आसपास  क्यारियां बनाकर सब्जियों की खेती शुरू कर दी। महात्मा गांधी मनुष्य और प्रकृति के बीच जो साहचर्य  की बात किया करते थे उसको अगर सही ढंग से लागू कर रहा है तो वह है कम्युनिस्ट क्यूबा !”
सच्चिदानंद सिन्हा क्यूबा के बारे में ये बातें कोई हवा में नहीं कर रहे थे। वहां एक नया मनुष्य बनाने का संजीदा प्रयास चल रहा था । उदाहरणस्वरूप जैसा कि हम सब जानते हैं कि क्यूबा में दो व्यक्तियों को महानायक का दर्जा हासिल है । वे दोनों हैं फिदेल कास्त्रो और अर्नेस्टो चेग्वेरा । चेग्वेरा को बोलविया में जिस आदमी ने गोली मारी थी उसका नाम था माइकल तेरान। आपको यह जान के हैरत होगी कि जिस माइकल तेरान ने क्यूबा के क्रांतिकारी आइकॉन की हत्या उसके सीने में  गोली मारकर की थी I कई दशकों बाद उसके मोतियाबिंद का इलाज और ऑपरेशन उसी क्यूबा में  किया गया और वह भी मुफ्त में।
ऐसा ही  एक और उदाहरण है क्यूबा के मुक्केबाज तियोफिलो स्टीवेंशन का।  इस महान मुक्केबाज के बारे में दुनिया बहुत कम जानती है । अभी कुछ साल पहले उनकी मृत्यु हुई है । उन्हें ओलंपिक में मुक्केबाजी के लिए तीन स्वर्ण पदक हासिल हुआ था। वे अमेरिका के मशहूर मुक्केबाज मोहम्मद अली के लगभग समकालीन थे। मुहम्मद अली को ओलंपिक में एक ही स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था, बाद में वे कमर्शियल मुक्केबाजी की ओर चले गए थे। कमर्शियल मुक्केबाजी आयोजित कर मुनाफा कमाने वालों ने दोनों के बीच एक मुकाबला कराना चाहा था। और इसके लिए तियोफिलो स्टीवेंसन को कई लाख डॉलर ऑफर किए गए थे। यह सन 1976 की बात है। पूरी दुनिया दम साध के इस जबर्दस्त मुकाबले का बेसब्री से इंतजार कर रही थी कि कौन जीतता है ! पूंजीवादी देश अमेरिका का विश्वविख्यात मुक्केबाज मोहम्मद अली या फिर तियोफिलो स्टीवेंसन जो समाजवादी देश क्यूबा का प्रतीक बन पूरी दुनिया से अपना लोहा मनवा रहा है।
Teófilo Stevenson and Fidel
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह मुकाबला नहीं हो सका क्योंकि तियोफिलो स्टीवेंशन ने लाखों डॉलर का प्रस्ताव ठुकरा दिया। क्यों ? अगर यह मुकाबला होता तो तियोफिलो स्टीवेंशन को क्यूबा छोड़ना पड़ता क्योंकि वहां खेल को व्यवसाय से अलग कर दिया गया था। क्यूबा ऐसा देश था जहां खेल, खेल भावना से खेलने पर जोर दिया जाता था। पैसा के लिए, व्यवसाय के लिए खेल पर प्रतिबंध था। यदि तियोफिलो स्टीवेंशन इस मुकाबले में शामिल होता तो उन्हें क्यूबा  छोड़ना पड़ता। उसका कहना था कि मैं फिदेल और चेग्वेरा का देश नहीं छोड़ सकता। तियोफिलो स्टीवेंशन को भले लाखों डॉलर मिलता लेकिन उसने उस पैसे को ठुकरा कर क्यूबा में रहना पसंद किया। इस घटना के दशकों बाद जब मोहम्मद अली की तियोफिलो स्टीवेंशन से भेंट हुई उस वक्त मुहम्मद अली को एक रोग के कारण हाथ कांपता  रहता था। तियोफिलो स्टीवेंशन ने उसे देख कहा इसका इलाज क्यों नहीं करवाते ?  मुहम्मद अली का जवाब था ” हमारे यहां कोई फिदेल नहीं है जो मेरी देखभाल करे।”  सच्चिदानंद सिन्हा ऐसे ही  क्यूबा के प्रशंसक नहीं थे।
Fidel castro and che guevara
सच्चिदानंद सिंह की ‘सोशलिज्म एंड पावर’, ‘इंटरनल कॉलोनी’, ‘बिटर हार्वेस्ट’ जैसी चर्चित पुस्तकों से सभी वाकिफ हैं । लेकिन पेंटिंग पर उनकी प्रमुख किताब है  ‘केओस एंड क्रिएशन ‘ हिंदी में  इसका अनुवाद है ‘रूप व अरूप’ I इस किताब को  ललित कला अकादमी, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है।  इस किताब में चित्रकला की सैद्धांतिकी को सामने लाने की कोशिश की है सच्चिदानंद सिन्हा ने।  सृजन के दौरान नई शैली का जन्म कैसे  होता है ? वे बताते हैं ” किसी कलाकार का यथार्थ से मुठभेड़ के फलस्वरूप जब नया अनुभव हासिल होता है तब उसे अभिव्यक्त करने के लिए नए शैली की आवश्यकता होती है। जैसे वह कोई लैंडस्केप देखता है, किसी भूदृश्य पर उसकी नजर जाती तो उसे महसूस होता है कि इस नजरिए से तो आजतक इसे देखा ही नहीं गया है ।
यही वक्त है अभिव्यक्ति की नई पद्धति, नए तरीके और एक नई शैली के अभ्युदय की। इस पुस्तक में सच्चिदा बाबू ने विश्वप्रसिद्ध चित्रकारों जैसे रेंब्रां, पॉल सेजान और पिकासो का उदाहरण दिया है। जब रेनेंसा काल में ऑयल पेंटिंग आया तब धर्माध्यक्षों, राजा महाराजाओं और समृद्ध नागरिकों के चित्र बनाए जाते थे। इस काल के तैलचित्रों में हम पाते हैं कि एक व्यक्ति जब अपना पोर्ट्रेट बनवाता है तो अपने साथ वह अपने घर की सारी संपत्ति, अपने खेत,अपनी  जमीन आदि के साथ चित्र खिंचवाता है। यानी आदमी की महत्ता उसकी संपत्ति के बगैर कुछ नहीं है। ऑयल पेंटिंग में व्यक्तिचित्र सबसे अधिक अभिव्यक्त किया गया है यानी निजी संपत्ति के दौर की शैली है ऑयल पेंटिंग।
सच्चिदानंद सिन्हा ने पेंटिंग में एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह उठाया कि ईसाई धर्म इतनी शताब्दियों तक समानता का प्रचार करता चला आ रहा है लेकिन आम आदमी, नया आदमी, मेहनतकश तबका, श्रमिक लोग  चित्रकला में उन्नीसवीं शताब्दी में जाकर ही आ पाए ! ऐसा क्यों ? जब समानता का उपदेश पिछले दो हजार साल से दिया जा रहा है तो कामगार तबके को चित्रकला में प्रवेश करने पर इतना समय क्यों लगा ? आम आदमी को चित्रित होने के लिए क्यों पिकासो, पॉल सेजान, मिलेट, पीटर पाल रूबेंस या  फिर विंसेंट वैनगॉग आदि का इंतजार करना पड़ा ?  वैनगॉग की महान पेंटिंग है ‘पोटैटो ईटर्स’। बल्ब की  रौशनी में सबसे गरीब लोगों द्वारा आलू खाने वालों का महान चित्र बनाया है विंसेंट वैनगॉग ने।
सच्चिदानंद सिन्हा ने बताया कि  मार्क्स के सिद्धांत के अनुसार मेहनतकश अपने शोषित होने की चेतना अपने अंदर कैसे प्राप्त करता है ?  ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ में कार्ल मार्क्स ने कहा है कि मजदूर वर्ग को ‘क्लास इन इटसेल्फ से लेकर क्लास फॉर इटसेल्फ’ ( यानी अपने आप में वर्ग से लेकर अपने लिए वर्ग) तक की यात्रा करता है।
सच्चिदानंद सिन्हा की एक अन्य प्रमुख प्रस्थापना है कि  मजदूर वर्ग को चित्रकला में स्थान कार्ल मार्क्स के इतिहास के रंगमंच पर आने के बाद प्राप्त हुआ। सच्चिदा बाबू का यह एक महत्वपूर्ण इनसाइट था जिसके महत्व को आजतक ठीक से नहीं समझा जा सका है।
सच्चिदानंद सिन्हा  की एक प्रमुख किताब है ‘जाति व्यवस्था : मिथक , वास्तविकता और चुनौती ‘ यह किताब आज के जमाने में  एक बेहद जरूरी पाठ है। आजकल अंबेडकर, फूले , पेरियार आदि का काफी वर्चस्व है और इनलोगों द्वारा प्रस्तुत यह व्याख्या आजकल जड़ जमा चुका है कि वर्ण व्यवस्था को भारत में अंग्रेजों ने  कमजोर किया था, दलितों की मुक्ति पहली बार अंग्रेजों के कारण संभव हो सका। पेरियार तो यहां तक कहते थे कि “अंग्रेज बहुत देर से आए और बहुत जल्दी चले गए।”
सच्चिदा बाबू का तर्क थोड़ा दूसरे ढंग का है। उनके अनुसार जाति व्यवस्था दो हजार साल लंबे वक्त तक टिकी रह सकी है। अब जैसे मनुस्मृति को भले ईसा से पौने दो सौ साल पहले से लेकर ईसा के दो साल बाद तक लिखा गया हो परन्तु उसे सख्ती से लागू किया गया है अंग्रेजों के आने के बाद ही। अंग्रेजों के पहले उसे उसके मौलिक स्वरूप में कभी भी लागू नहीं किया गया।
यदि पुष्यमित्र शुंग के काल को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर तो भारत के शासक पिछड़ी जाति के रहे। मौर्या वंश तो शूद्रों का शासन माना जाता है, गुप्त वंश ने अपनी जाति के बारे में खुलकर नहीं बताया है लेकिन उसे भी पिछड़ी श्रेणी में ही रखा जाता है। क्षत्रिय कभी भी लंबे काल तक राजा नहीं रहे हैं । मनुस्मृति को जीवनदान प्रदान किया अंग्रेजों ने।
Sachchidanand Sinha
जातिव्यवस्था इतने लंबे समय तक टिकी रह गई है तो उसका कारण यह है कि जातिव्यवस्था के अंदर दो सेफ्टी वाल्व थे जो उसे लंबे काल तक बने रहने में मदद पहुंचाते रहे। जैसे यदि कोई निचली जाति का व्यक्ति है लेकिन यदि उसने किसी तरह  तलवार या किसी और प्रकार से सत्ता और धन अर्जित कर लिया है तो उसका उपयोग कर वह निचली जाति से ऊंची जाति में पहुंच जा सकता था।
उन्होंने बताया कि जैसे बिहार में एक जाति है भूमिहार , दूसरा जाति है भुईयां। कहां भूमिहार, कहां भुईयां ! लेकिन दोनों एक ही कबीले के माने जाते हैं। लंबे अंतराल में एक हिस्सा आगे बढ़कर भूमिहार हो जाता है जबकि दूसरा वहीं रह जाता है।  यही सेफ्टी वाल्व है कि धन और सत्ता के बल पर आप जाति के सोपानक्रम में आगे बढ़ जा सकते हैं। समान जातियों का उद्गम एक ही है। इस बात के समर्थन में सच्चिदा बाबू ने इतने विविध श्रोतों से, व्यापक तथ्यों के आधार पर अपनी बात कही है कि हमें लगता है कि अपनी पुरानी दृष्टि पर फिर से विचार करने की जरूरत है।
जब अंग्रेज आए तो देखा कि इतने तरह के कानून है । अंग्रेजों के आने के बाद आप पिछड़ा हैं या ब्राह्मण, दलित हैं या फिर सवर्ण सबको एक कानून की छतरी में लाने की कोशिश की गई लेकिन नागरिक जीवन में बने कानूनों को छुआ तक नहीं गया। 1860 का इंडियन पिनल कोड या क्रिमिनल प्रोसीजर कोड जहां जाति धर्म के लिए एक समान था पर नागरिक जीवन में हिंदुओं के लिए अलग कानून तो मुसलमानों के लिए अलग बने रहे। अंग्रेजों ने देखा कि इतने तरह और किस्म के कानून हैं ऐसे में हमारे पास सबसे अच्छा बना हुआ कानून है ‘मनुस्मृति’। उसी को आधार बनाकर उसने इसे लागू किया।  विक्टोरियन मोरालिटी और ब्राह्ममाणिकल मोरालिटी का गठजोड़ हुआ ब्रिटिश शासन के दौरान। अब इस बात को आंबेडकर के पाठ के साथ मिलकर देखें तो बिल्कुल भिन्न बात नजर आती है।
ये फूले, आंबेडकर, पेरियार अंग्रेजों का गुणगान करते नहीं थकते। हम सब जानते हैं अंग्रेज जब आए थे तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 25 प्रतिशत था । 1947 में उनके छोड़कर जाने के वक्त वह घटकर महज 2 प्रतिशत रह गया था। अकाल में इतने लोग मारे गए, अर्थव्यवस्था तहस – नहस कर दी गई तब दलितों के लिए वह कैसे बेहतर रह सकती है। अंग्रेजों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया उसकी मार हम आज तक झेल रहे हैं। अंग्रेजों ने यहां की दो किस्म के लोगों को सबसे ज्यादा बर्बाद किया शिल्पियों और कारीगरों को। इन दोनों में से अधिकांश शूद्र जाति से आते थे। यदि अंग्रेजों का शासन अच्छा था तो शूद्र जातियों से आने वाले शिल्पियों और कारीगरों की दुर्गति क्यों हुई ?
आंबेडकर की एक किताब है ‘हू वेयर शुद्राज ?’ यानी शूद्र कौन थे। यह किताब 1946 में लिखी गई थी। इस किताब में आंबेडकर का कहना है कि शूद्र पहले क्षत्रिय थे लेकिन ब्राह्मणों के कारण वे शूद्र बन गए थे।  महाभारत में एक पैजवन राजा की कहानी को आधार बनाकर इस नतीजे पर पहुंचे थे। बाद में उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव में  भारतीय जनता पार्टी को जीत हासिल हुई उसमें दलितों के बीच, इस किताब में अंबेडकर द्वारा प्रस्तुत तर्क को आधार बनाया गया । अंबेडकर का कहना था कि शुद्ध पहले क्षत्रिय थे ब्राह्मणों ने उनको शूद्र बना डाला,  दलित बना डाला।  भारतीय जनता पार्टी ने सिर्फ एक चालाकी की।  ब्राह्मणों की जगह मुसलमानों को रख दिया । भाजपा वाले दलितों को यह कहकर भड़काते रहे कि अरे! आप  आप तो पहले क्षत्रिय थे ! आपने वाल्मीकि बनकर रामायण की रचना की। आप तो वेदव्यास थे, महाभारत जैसी महान कृति की रचना की।
लेकिन इन म्लेच्छों ने, मुसलमानों ने आपको चमार बना डाला, मरी हुई गाय का मांस उतारने का  नीच काम करने के लिए  विवश कर दिया। आपकी इस दुरअवस्था के लिए,  दुर्गति के लिए मुसलमान जिम्मेदार हैं। बाद में रामशरण शर्मा प्रख्यात इतिहासकार की एक और किताब, अम्बेडकर की किताब के दस साल बाद यानी 1956 में प्रकाशित हुई ‘शूद्राज इन इनसिएंट इंडिया’ ( प्राचीन भारत में शूद्रों का इतिहास)।  इस किताब में रामशरण शर्मा ने अंबेडकर की किताब का रिफरेंस देकर यह बताया कि अंबेडकर ने दलितों को क्षत्रिय बताकर सरलीकरण किया है।
महाभारत की सिर्फ एक कहानी के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचना की ‘शूद्र पहले क्षत्रिय थे’ सही नहीं है । अंबेडकर को बौद्ध, जैन स्रोतों सहित इस काल के अन्य श्रोतों, दूसरे विविध तथ्यों के आधार पर अपनी बात करनी चाहिए थी वैसे भी महाभारत कोई इतिहास की पुस्तक नहीं है बल्कि एक मिथकीय रचना है।  उसके आधार पर इतना बड़ा ऐतिहासिक निर्णय देना सही नहीं है।
अंबेडकर की पोती के पति हैं चर्चित लेखक आनंद तुलतूंबुडे। वे दलित तबके से आने वाले आज के भारत के महत्वपूर्ण चिंतक हैं।  मैंने उनका पटना में इंटरव्यू किया था । उनसे यही बात पूछी थी कि अंबेडकर के यहां इस तरह की गलतियों क्यों की है ? आनंद तुलटुंबुडे जवाब  दिलचस्प था। उन्होंने कहा कि अंबेडकर को दो चीजों की समझ नहीं थी ‘स्टेट एंड  रिलिजन’ I सच्चिदानंद सिन्हा की किसी महत्वपूर्ण किताब पर जितना विचार विमर्श होना चाहिए था, कई पाठआने चाहिए थे लेकिन उसे लेकर अकादमिक जगत में एक चुप्पी है, साइलेंस है।
उनकी एक छोटी सी पुस्तिका है जो चालीस साल पहले उन्होंने  लिखी थी उपभोक्तावाद पर जिसमें उन्होंने नई बात यह कही है कि पूंजीवाद इतने लंबे समय तक टिका रहता है उसमें सबसे जरूरी हथियार है उपभोक्तावाद। वह हमारे सामने नए – नए पर अनावश्यक और गैरजरूरी वस्तुओं को सामने परोसता है जिनका हमारे जीवन में कोई उपयोग नहीं है। इस कारण अपनी लांगेविटी, अपनी निरंतरता को लंबे समय तक टिकाए रख पाता है। मार्क्स ने अपनी एक कृति सम्भवतः ‘जर्मन आइडियोलॉजी’ में कहा भी है कि Capitalism is a system which not only produces object for the subject but also produces subjects for the object.यानी किसी नए उत्पाद या वस्तु के लिए नए किस्म के उपभोक्ता तैयार किए जाते हैं।
एक दिलचस्प उदाहरण सच्चिदा बाबू दिया करते थे कि हमसब लोगों के अंदर युवा दिखने, जवान होने की प्रवृत्ति बनी रहती है। हम इसके लिए क्रीम लगाते हैं, पाउडर का उपयोग करते हैं। उस पुस्तिका में उदाहरण दिया गया है कि बचपन में चाय पीने की आदत कैसे लगी ? इसके लिए चाय की पुड़िया फ्री में बांटी जाती थी , मुफ्त में जगह-जगह चाय पिलाई जाती थी।  एक बार आदत लग जाने के बाद अब देखिए हमलोग खरीद कर खूब चाय पीते हैं। चाय को लेकर उस दौर में एक कहावत काफी प्रचलित थी ” सताती है हमको न मेहनत, न सुस्ती, गरम चाय लाती है देह में फुर्ती। “
यदि पूंजीवाद से लड़ना है, उपभोक्तावाद से लड़ना है तो इसका उपाय क्या है?  उपभोक्तावाद जो अनावश्यक मांग खड़ा कर अपना समान बेचता है इससे कैसे निजात पाई जाए ?  इस सवाल के जवाब में वे गोएथे के एक विश्वविख्यात नाटक ‘फ़ाउस्ट’ का जिक्र किया करते थे ।  इस नाटक का नायक फ़ाउस्ट अपनी आत्मा बेच देता है शैतान मिस्टोफिल्स के पास ।
वह अपनी आत्मा क्यों बेच देता है ? ताकि उसकी जवानी बरकरार रहे वह चिरयुवा बना रहे। डायन से उसकी मुलाकात होती है । डायन कहती है कि वह उसे किस्म-किस्म के लेप लगाएगी, रसायन का उपयोग करेगी जिससे वह युवा दिखेगा। जैसे आजकल लोग अपने गालों पर क्रीम और पाउडर लगाते हैं। तो फ़ाउस्ट कहता है कि रसायन लगाना, लेप लगवाना  तो बेहद तकलीफदेह प्रक्रिया है। कोई दूसरा उपाय नहीं है ? शैतान जवाब देता है कि हां उसका उपाय है कि सादा जीवन जीयो, प्रकृति के नजदीक उसके साथ साहचर्य का जीवन व्यतीत करो, उन मवेशियों के साथ रहो जो तुम्हें पोषण प्रदान करती है। उन मवेशियों के खाद से जो अन्न पैदा होता है उसका भोजन ग्रहण करो । फ़ाउस्ट टिप्पणी करता है कि यह तो बहुत कठिन रास्ता है ।
फिर शैतान कहता है कि यदि तुम सादा जीवन नहीं जी सकते हो तो फिर तुम्हें अपनी आत्मा बेचनी ही पड़ेगी । नाटक का यह प्रसंग इतना मशहूर हुआ कि यह अब एक मुहावरा बन चुका है  ‘फ़ाउस्टियन बार्गेन ‘ यानी अपनी आत्मा गिरवी रख देना। सच्चिदा बाबू आजीवन समता के दर्शन को कैसे आगे बढ़ाया जाए इसे लेकर हमेशा फिक्रमंद रहे इसके चलते सोचने के जो पारंपरिक और प्रचलित तरीके थे उससे थोड़ा अलग ढंग से सोचने की कोशिश की। यही बात उन्हें सबसे अलग, सबसे अलहदा बनाती है।
-अनीश अंकुर 

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