“पर्दे के पार : रंगमंच की साधना, शतक का उत्सव और दो पीढ़ियों का संवाद”

  • रंगमंच का शतक : अनिल रस्तोगी और मुस्कान गोस्वामी के साझा सृजन की ऐतिहासिक संधि

पिछले दिनों लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी का मंच एक साधारण प्रस्तुति का साक्षी नहीं बना, बल्कि वह क्षण भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक दुर्लभ और प्रेरक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। 83 वर्ष की आयु में एक वरिष्ठ रंगकर्मी और फिल्म अभिनेता द्वारा अपने रंगमंचीय जीवन का सौवाँ नाटक मंचित किया जाना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि रंगमंच की जीवटता, साधना और निरंतरता का उत्सव था। यह ऐतिहासिक शतक पूरा किया वरिष्ठ अभिनेता अनिल रस्तोगी जी ने—और वह भी किसी स्मृति-नाट्य या प्रतीकात्मक प्रस्तुति से नहीं, बल्कि पूर्ण अनुशासन, कठोर रिहर्सल और रचनात्मक जोखिम से भरे नाटक “Beyond the Curtain” के माध्यम से। इस नाटक का निर्देशन किया समकालीन भारतीय रंगमंच की सशक्त और संवेदनशील निर्देशिका मुस्कान गोस्वामी ने। यह संयोग मात्र नहीं था, बल्कि दो पीढ़ियों, दो अनुभवों और दो रंग-दृष्टियों का ऐसा संगम था, जिसने मंच को साधारण प्रदर्शन से ऊपर उठाकर आत्मीय संवाद का क्षेत्र बना दिया।

लेखक : भूपेंद्र कुमार अस्थाना

मुस्कान गोस्वामी से बातचीत में यह स्पष्ट हुआ कि “Beyond the Curtain” का निर्माण किसी रियायत या श्रद्धा-भाव से नहीं, बल्कि कठोर पेशेवर अनुशासन के साथ हुआ। रिहर्सल के दौरान न उम्र का विशेषाधिकार था, न दिग्गज होने की छूट। वहाँ केवल निर्देशक और कलाकार का रिश्ता था—जहाँ हर दृश्य, हर मौन और हर गति पर गहन काम हुआ। स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद अनिल रस्तोगी जी ने जिस समर्पण और धैर्य के साथ रिहर्सल की, वह युवा कलाकारों के लिए भी एक उदाहरण है। मंच पर अंतिम प्रस्तुति में उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि रंगमंच शरीर की नहीं, चेतना की साधना है।

स्वयं अनिल रस्तोगी जी के शब्दों में, “यह नाटक मेरी कला-यात्रा और मेरे व्यक्तिगत जीवन—दोनों पर आधारित था। इसलिए यह मेरे लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। लेकिन ईश्वर की असीम कृपा और निर्देशक के विश्वास से यह संभव हो पाया।” Beyond the Curtain इसलिए भी वर्षों तक याद किया जाएगा क्योंकि यह किसी अभिनेता का मात्र सौवाँ नाटक नहीं, बल्कि रंगमंचीय अभिनय के शतक का दुर्लभ उदाहरण है—जहाँ उम्र नहीं, अनुभव बोलता है।

इस नाटक के बारे में विस्तार से बताते हुए गोस्वामी ने कहा कि “बियॉन्ड द कर्टेन” एंटन चेखव के प्रसिद्ध नाटक स्वान सॉन्ग से प्रेरित एक गहन, संवेदनशील और प्रेरणादायक एकल-अभिनय नाटक है, जिसकी परिकल्पना और निर्देशन मुस्कान गोस्वामी ने किया है तथा पुनर्लेखन यश योगी द्वारा संपन्न हुआ है। यह नाटक केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि स्मृति, समय, कला और जीवन के बीच चलने वाला एक आत्मिक संवाद है, जो दर्शकों को मंच के भीतर से निकालकर कलाकार के अंतरंग संसार तक ले जाता है।

भूपेन्द्र अस्थाना एवं मुस्कान गोस्वामी

इस नाटक का केंद्रीय पात्र एक 82 वर्षीय जुनूनी अभिनेता है—“बूढ़ा लड़का / बशीर अहमद / अनिल”, जिसे डॉ. अनिल रस्तोगी ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ निभाया है। रात के सन्नाटे में एक छोटे कस्बे के खाली थिएटर में भटकता हुआ यह पात्र अपनी स्मृतियों की यात्रा पर निकलता है, जहाँ अतीत और वर्तमान एक-दूसरे में घुलते जाते हैं और जीवन का पूरा विस्तार मंच पर साँस लेने लगता है।

डिमेंशिया की हल्की-सी छाया के बीच उसके भीतर से एक उजला अतीत उभरता है—सीडीआरआई में परजीवी रोगों पर शोध करने वाला वैज्ञानिक, राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का फेलो, एक समर्पित रंगकर्मी और एक परिवार का स्नेहिल सदस्य। उल्टे पड़े स्टूल, 100 नंबर वाला केक, मोमबत्तियाँ और बिखरे हुए कॉस्ट्यूम्स केवल मंच-सज्जा नहीं रह जाते, बल्कि उसके जीवन के प्रतीक बनकर कभी भ्रम, कभी हास्य, कभी उपलब्धियों और कभी संघर्षों के रूप में सामने आते हैं।

माँ, पिता और भाई की स्मृतियाँ, पत्नी, बेटे और पोते का सान्निध्य, तथा सीडीआरआई और दर्पण थिएटर ग्रुप का सहयोग उसे अकेलेपन से निकालकर उसके सौवें नाटक के उत्सव तक ले आता है। दर्शकों की तालियों के बीच वह प्रेम, स्वीकार्यता और अस्तित्व के अर्थ को नए सिरे से खोजता है, और यही क्षण नाटक को गहरी मानवीय ऊँचाई प्रदान करता है।

नाटक का एक अत्यंत काव्यात्मक और प्रतीकात्मक पक्ष नायक की परछाईं है, जिसे अम्बरीश बॉबी ने निभाया है। यह परछाईं कभी स्मृति बनकर उभरती है, कभी आत्मा की आवाज़ बनती है और कभी उन अनकहे भावों को मूर्त रूप देती है, जिन्हें शब्दों में बाँध पाना संभव नहीं। मंच पर यह दृश्य-सम्वेदनात्मक अनुभव नाटक को साधारण कथा से ऊपर उठाकर एक गहन कलात्मक अनुभूति में बदल देता है।

अंत में वैज्ञानिक अनिल और अभिनेता अनिल—उसके भीतर की दो पहचानें—एक-दूसरे में विलीन होकर बूढ़ापे को उत्सव में बदल देती हैं। “जो बीत गई सो बात गई” गाते हुए वह जीवन की निरंतरता, कला की अमरता और सकारात्मक जुनून का संदेश देता है, जो दर्शकों को उम्र, सृजन और प्रेम की विजयी शक्ति पर मुस्कुराते हुए सोचने के लिए प्रेरित करता है।
मुस्कान गोस्वामी के लिए बियॉन्ड द कर्टेन केवल एक नाट्य-प्रयोग नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी है। डॉ. अनिल रस्तोगी की जीवन-यात्रा ने इस प्रस्तुति को जीवनी से आगे बढ़ाकर कविता, स्मृति, देह, मौन और हास्य में रूपांतरित कर दिया है। यह नाटक उस सामाजिक धारणा को तोड़ता है कि एक उम्र के बाद जीवन की गति धीमी हो जाती है, और यह स्थापित करता है कि इंसान की आत्मा अंतिम साँस तक नए अर्थ और नए रूप गढ़ने में सक्षम रहती है।

  • मुस्कान गोस्वामी : संवेदना, अनुशासन और साहस की रंगयात्रा-

मुस्कान गोस्वामी से मेरा परिचय वर्ष 2010 में लखनऊ में हुआ था। तब से आज तक हमारा संवाद बना हुआ है और एक-दूसरे की कलात्मक यात्राओं के साक्षी रहे हैं। आज जब वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय हैं, तो यह देखकर संतोष होता है कि उनका रंगकर्म लगातार परिपक्व और प्रासंगिक होता गया है।

मुस्कान समकालीन भारतीय रंगमंच की उन विरल आवाज़ों में से हैं, जिनका सृजन अनुशासन, करुणा और निर्भीक रचनात्मकता से जन्म लेता है। मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय, भोपाल (2013) की पूर्व छात्रा मुस्कान ने अभिनय एवं निर्देशन में विशेषज्ञता प्राप्त की। इसके पश्चात एम.पी. स्कूल ऑफ ड्रामा से निर्देशन में इंटर्नशिप, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली से थिएटर डायरेक्शन कार्यशाला तथा थिएटर इन एजुकेशन (T.I.E.) में विशेष प्रशिक्षण ने उनकी रंग-दृष्टि को वैचारिक और तकनीकी दोनों स्तरों पर समृद्ध किया।

पिछले दो दशकों से वे निर्देशन, अभिनय, लेखन, प्रशिक्षण और सामाजिक हस्तक्षेप के माध्यम से भारतीय रंगमंच को निरंतर समृद्ध कर रही हैं। उनका रंगकर्म केवल मंच तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज के हाशिये पर खड़े समुदायों—बच्चों, महिलाओं, शरणार्थियों, सेक्स वर्कर्स, वंचित वर्गों और विशेष आवश्यकता वाले लोगों—के साथ किए गए थिएटर अभियानों में मानवीय संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व का रूप लेता है।

उनका लिखित व निर्देशित नाटक “Freedom of Choice” का भारत रंग महोत्सव (NSD) में चयन उनकी वैचारिक स्पष्टता और कलात्मक साहस का प्रमाण है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत CCRT द्वारा उन्हें ‘Outstanding Person’ के रूप में मान्यता तथा “विलुप्त विदूषक की आधुनिक रंगमंच में खोज” विषय पर जूनियर रिसर्च फ़ेलोशिप प्राप्त हुई। गुरु जी. वेणु से प्राप्त नवरस साधना ने उनके रंगकर्म को भारतीय सौंदर्यशास्त्र की गहरी जड़ों से जोड़ा।

  • संघर्ष से सृजन तक : एक स्त्री की रंगमंचीय यात्रा-

अयोध्या के समीप एक छोटे किसान ब्राह्मण परिवार में जन्मी मुस्कान गोस्वामी की रंगमंचीय यात्रा किसी सुविधाजनक सांस्कृतिक वातावरण की देन नहीं रही। वह ऐसे सामाजिक ढाँचे से निकलकर आती हैं जहाँ स्त्री की शिक्षा, अभिव्यक्ति और सार्वजनिक उपस्थिति स्वयं संघर्ष का विषय रही है। खेलों—विशेषकर क्रिकेट और हॉकी—में राज्य स्तर तक की उनकी सक्रियता इस बात का संकेत देती है कि सार्वजनिक मंच की आकांक्षा उनमें बचपन से ही मौजूद थी। किंतु सामाजिक निषेधों ने उनके खेल-पथ को रोका, और यहीं से रंगमंच उनके लिए एक वैकल्पिक ‘खेल-भूमि’ बन गया।

रामलीला में पुरुष द्वारा सीता का अभिनय देखना उनके जीवन का निर्णायक क्षण सिद्ध हुआ। उन्होंने समझा कि अभिनय भी एक खेल है—ऐसा खेल जिसे समाज स्वीकार करता है। नौटंकी देखने के लिए लड़कों का वेश धारण करना, चोरी-छिपे प्रदर्शन देखना, और दर्शकों की प्रतिक्रिया को पढ़ना—इन सबने उनके भीतर रंगमंच को एक जन-सांस्कृतिक ऊर्जा के रूप में स्थापित किया।

लखनऊ आकर नौकरी, पढ़ाई और रंगमंच—तीनों को साधते हुए उन्होंने यह सीखा कि रंगमंच पैसे से नहीं, समर्पण और समय से चलता है। दर्पण, निसर्ग जैसे रंग समूहों और उर्मिल कुमार थपलियाल, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ, ललित सिंह पोखरिया जैसे गुरुओं के सान्निध्य ने उन्हें अनुशासन और अध्ययन का महत्व सिखाया।

  • प्रयोग, प्रशिक्षण और सामाजिक हस्तक्षेप-

मुस्कान गोस्वामी के रंगमंच में प्रशिक्षण केंद्रीय भूमिका निभाता है। अभिनय, निर्देशन, प्रकाश, लेखन और मंच-डिज़ाइन—इन सभी क्षेत्रों में विविध गुरुओं से प्राप्त ज्ञान ने उनके रंगकर्म को बहुआयामी बनाया। वे डिवाइस थिएटर, इंप्रोवाइजेशन और समूह-आधारित रचना-प्रक्रिया में विश्वास करती हैं, जहाँ कलाकार केवल पात्र नहीं निभाते, बल्कि सह-रचनाकार बनते हैं।

उनके निर्देशित नाटकों—Hamlet, Andha Yug, Andher Nagri, Rashmirathi, The Zero Story, Freedom of Choice, Beyond the Curtain—में प्रयोग केवल शिल्पगत नहीं, बल्कि सामाजिक भी हैं। झुग्गी-बस्ती के बच्चों, यौनकर्मियों के बच्चों, शरणार्थियों और सैनिकों के साथ किया गया उनका कार्य रंगमंच को संवाद, उपचार और परिवर्तन का माध्यम बनाता है।

  • सम्मान और वर्तमान सक्रियता-

नेशनल अभिनय रंग सम्मान (2025), श्रम का सम्मान (2024), वाग्धारा स्वयंसिद्धा पुरस्कार (2023) और ग्लोबल इंडिया नेशनल स्टारडम अवॉर्ड (2022) जैसे सम्मानों से सम्मानित मुस्कान गोस्वामी वर्तमान में मुस्कान थिएटर लैब, मुंबई की संस्थापक-निदेशक हैं। वे भारतीय सशस्त्र बलों के साथ प्रशिक्षक के रूप में जुड़ी हैं, UNICEF परियोजनाओं में सक्रिय हैं और देश-विदेश में कार्यशालाएँ संचालित कर रही हैं।

“Beyond the Curtain” केवल एक नाटक नहीं, बल्कि दो जीवन-यात्राओं का संवाद है—एक ओर 83 वर्ष का अनुभवी रंगकर्मी, दूसरी ओर समकालीन भारतीय रंगमंच की सशक्त स्त्री आवाज़। यह प्रस्तुति हमें याद दिलाती है कि रंगमंच उम्र, लिंग या सीमाओं से परे मानवीय चेतना की जीवित साधना है।

अनिल रस्तोगी का शतक और मुस्कान गोस्वामी का अनुशासित, संवेदनशील निर्देशन—दोनों मिलकर भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक उजला, प्रेरक और यादगार अध्याय रचते हैं।

लेखक : भूपेंद्र कुमार अस्थाना

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