टिकुली पेंटिंग : परंपरा से आधुनिक कला तक की रचनात्मक यात्रा

बिहार में प्रचलित टिकुली पेंटिंग एक ऐसी विशिष्ट लोक–कला परंपरा है, जिसकी जड़ें भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में गहराई तक समाई हुई हैं। इसका संबंध केवल …

युद्ध और उन्माद के साये में मनुष्यता की पुकार

प्रो. वी. नागदास की पहचान एक कलागुरु के साथ-साथ वरिष्ठ चित्रकार और छापा कलाकार की है I शायद यही कारण रहा कि ललित कला अकादेमी …

भारत-रूस मैत्री और निकास सफ़रोनोव की कलाकृतियाँ

भारत और रूस के बीच चित्रकला का आंतरिक संबंध अत्यंत पुराना, गहरा और सांस्कृतिक सामंजस्य से भरपूर रहा है। दोनों देशों की कला परंपराएँ मानवीय …

रिचर्ड बार्थोलोमेव (1926–1985): भारतीय आधुनिक कला के संवेदनशील आलोचक और साक्षी

रिचर्ड बार्थोलोमेव (बार्थोलोमियो) भारतीय आधुनिक कला-जगत के ऐसे आलोचक, लेखक, फोटोग्राफर और सांस्कृतिक चिंतक थे, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद के भारतीय कला की दिशा को …

“लखनऊ स्पेक्ट्रम 2025: विविधता और संवेदना का उत्सव”

लखनऊ, 1 नवम्बर 2025: भारत की सांस्कृतिक राजधानी लखनऊ, जहाँ तहज़ीब और रचनात्मकता की परंपरा आज भी जीवंत है, वहीं फीनिक्स पलासियो के साउथ एट्रियम …

भारतीय लघुचित्र शैलियों में माँ दुर्गा के रूप-स्वरूप का चित्रण

आदरणीय नर्मदा प्रसाद उपाध्याय भारतीय कला इतिहास के प्रमुख विद्वानों में से हैं, जिन्होंने विशेष रूप से लघुचित्र शैली पर गहन शोध किया है। वे …

चोला नटराज और आनंद कुमारस्वामी का विश्लेषण

भारतीय शिल्पकला में चोल वंश द्वारा निर्मित नटराज की कांस्य प्रतिमा न केवल एक मूर्तिकला है, बल्कि वह भारतीय दर्शन, भक्ति और लयात्मकता का मूर्त …

ब्लॉकबस्टर गोंड कला क्यों हर किसी को पसंद आ रहा है ?

वरिष्ठ कला समीक्षक/ कला इतिहासकार जोनी एमएल,अपने बेबाक लेखन के माध्यम से आलोचना के उन तमाम जोखिम को उठाते हैं I जिससे सामान्य तौर पर …

थॉमस मैकइवेली: ‘कला और अन्यता’ सांस्कृतिक पहचान का संकट

कला इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम आता है थॉमस मैकइवेली का, एक ऐसा कला आलोचक जिसने पश्चिम की श्रेष्ठता की अवधारणा के पाखंड को खंडित …