एडवर्ड सईद का ओरिएण्टलिज़्म: भारतीय संदर्भ में महत्त्व

एडवर्ड सईद : संक्षिप्त परिचयएडवर्ड डब्ल्यू. सईद (1935–2003) बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली साहित्यिक सिद्धांतकारों, सांस्कृतिक आलोचकों और उत्तर-औपनिवेशिक चिंतकों में गिने जाते हैं। उनका …

भारतीय कला-परंपरा : औपनिवेशिक दृष्टिकोण और प्रतिकार

भारतीय कला-परंपरा पर औपनिवेशिक काल में पश्चिमी विद्वानों की दृष्टि दो विपरीत ध्रुवों के बीच झूलती रही—एक ओर रोमांटिक, सराहनात्मक और ओरिएंटलिस्ट प्रशंसा, तो दूसरी …

लोक चित्रकला : औपनिवेशिक सौंदर्यबोध, शहरी आधुनिकतावाद और हमारी सांस्कृतिक विस्मृति

भारतीय प्राचीन लोक एवं शास्त्रीय कला परंपरा अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण रही है। हम जानते हैं कि लोक कला जहाँ समुदायों की सामूहिक स्मृति, जीवन …

भारतीय पौराणिक ग्रंथों में चित्रकला: एक सांस्कृतिक और सौंदर्यशास्त्रीय अनुशीलन

भारतीय संस्कृति में चित्रकला केवल एक दृश्य कला नहीं है, बल्कि यह धर्म, दर्शन, आध्यात्म और समाज की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है। भारत के …

चोला नटराज और आनंद कुमारस्वामी का विश्लेषण

भारतीय शिल्पकला में चोल वंश द्वारा निर्मित नटराज की कांस्य प्रतिमा न केवल एक मूर्तिकला है, बल्कि वह भारतीय दर्शन, भक्ति और लयात्मकता का मूर्त …

अपराजितपृच्छा में ललित कला की अवधारणा

भारतीय कला परंपरा में ‘अपराजितपृच्छा’ एक विशिष्ट स्थान रखती है। यह एक संस्कृत ग्रंथ है, जिसे सोलहवीं शताब्दी में गुजरात के सोलंकी शासक सिद्धराज जयसिंह …

समरांगण सूत्रधार में कला  : एक अध्ययन

भारतीय वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला परंपरा में समरांगण सूत्रधार (Samarāṅgaṇa Sūtradhāra) एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना परमार वंश के प्रतापी राजा भोजराज (11वीं …

विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वर्णित चित्रसूत्र : एक अध्ययन

भारतीय कला परंपरा में पुराणों का एक विशिष्ट स्थान रहा है। जहां एक ओर ये ग्रंथ धार्मिक आख्यानों और नैतिक शिक्षाओं के वाहक हैं, वहीं …