कला केवल दृश्य-सौंदर्य प्रस्तुत करने का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह समाज के अंतर्विरोधों और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने का एक शक्तिशाली साधन भी है। लखनऊ के वरिष्ठ मूर्तिकार शिव बालक जी इसी दृष्टि के सच्चे प्रतिनिधि हैं। उनका कला-संसार यह दर्शाता है कि कलाकार किसी बंधन में नहीं बंधता—वह माध्यम चाहे ब्रॉन्ज, स्टोन, पी.ओ.पी., वुड या वॉटर कलर हो, अपनी अभिव्यक्ति के लिए हमेशा नया रास्ता खोजता है। प्रस्तुत है शिवबालक जी की कला यात्रा पर कलाकार/कला समीक्षक भूपेन्द्र कुमार अस्थाना का यह आलेख I -संपादक
भूपेन्द्र कुमार अस्थाना
शिव बालक जी की कला की यात्रा पारंपरिक माध्यमों से शुरू हुई। धातु और पत्थर से शुरू हुए उनके प्रयोग जल्द ही सिंथेटिक स्टोन की ओर बढ़े। यह नया माध्यम किफायती और टिकाऊ होने के साथ-साथ उनकी रचनात्मक दृष्टि के लिए उपयुक्त साबित हुआ। वर्तमान में अन्य कलाकार भी इस माध्यम का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन इस दिशा में अग्रणी होने का श्रेय शिव बालक जी को ही जाता है। हाल के वर्षों में उन्होंने वॉटर कलर पेंटिंग में भी प्रयोग शुरू किया है। माध्यम चाहे कोई भी हो, उनका उद्देश्य हमेशा एक ही रहा है—समाज में व्याप्त बुराइयों को उजागर करना और संवेदनशीलता जगाना।
शिव बालक जी, (जन्म 14 अगस्त 1956) लखनऊ के प्रतिष्ठित समकालीन मूर्तिकार हैं जिन्होंने भारतीय शिल्पकला में एक विशिष्ट पहचान बनाई है। उन्होंने 1984 में लखनऊ आर्ट्स कॉलेज से बी.एफ.ए. (स्कल्पचर) तथा 1997 में एम.एफ.ए. (स्कल्पचर) की डिग्री प्राप्त की। संगीत में भी उनकी गहरी रुचि रही और उन्होंने 1979 में भातखंडे संगीत महाविद्यालय, लखनऊ से विशारद (वोकल) की उपाधि ली। उन्होंने 1988 में आईकॉम से फाइबर ग्लास का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। छात्र जीवन से ही उन्हें योग्यता आधारित छात्रवृत्ति मिली और आगे चलकर उन्हें विशेष कम्पोनेंट फैलोशिप (उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग, 1998) तथा एनकार्डियो राइट इलेक्ट्रॉनिक्स प्रा.लि. फैलोशिप (2016) जैसे महत्वपूर्ण शोध व कला अनुदान प्राप्त हुए।
उनकी इस कला यात्रा में अनेक पुरस्कार शामिल हैं जिनमें लखनऊ आर्ट्स कॉलेज अवॉर्ड (1980-84), अखिल भारतीय कला प्रदर्शनी संस्कार भारती लखनऊ (1992), राजस्थान ललित कला अकादमी पुरस्कार (1994), राज्य पुरस्कार ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश (1995), और अखिल भारतीय पुरस्कार आर्ट मॉल नई दिल्ली (2009) प्रमुख हैं। उन्हें 2014 में रोटरी क्लब लखनऊ द्वारा रोटरी वोकेशनल एक्सीलेंस अवॉर्ड भी प्रदान किया गया। उन्हें 2000 में ललित कला अकादमी लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश का समकालीन कलाकार घोषित किया गया तथा 2006 में ललित कला अकादमी, नई दिल्ली की एन्साइक्लोपीडिया एंट्री में स्थान मिला।
शिव बालक जी की कला यात्रा में अनेक राष्ट्रीय प्रदर्शनियों और प्रतिष्ठित दीर्घाओं में एकल एवं समूह प्रदर्शनियाँ शामिल हैं। उन्होंने त्रिवेणी कला संगम (नई दिल्ली), कर्नाटक चित्र कला परिषद (बंगलुरु), जेहंगीर आर्ट गैलरी (मुंबई) और स्टेट ललित कला अकादमी (लखनऊ) सहित कई मंचों पर अपनी मूर्तिकला प्रदर्शित की। उनके कार्य न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रशंसा पा चुके हैं और कई प्रतिष्ठित संग्रहों में सुरक्षित हैं—जिनमें नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (नई दिल्ली), सहारा इंडिया परिवार, और भातखंडे संगीत महाविद्यालय लखनऊ प्रमुख हैं।
कला प्रदर्शनियों में भागीदारी के साथ ही वे राष्ट्रीय स्तर के मूर्तिकला शिविरों और कार्यशालाओं में भी सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं। उनके कार्यों का एक बड़ा संग्रह भारत और विदेशों के निजी व संस्थागत संग्रहकर्ताओं के पास है। वर्तमान में वे राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण प्रयोगशाला (एनआरएलसी), अलीगंज लखनऊ में वरिष्ठ संरक्षक सहायक के पद पर कार्यरत हैं और लखनऊ के राष्ट्रीय ललित कला केंद्र, एकता विहार स्थित अपने कार्यस्थल से अपनी कला साधना जारी रखे हुए हैं।
उनकी मूर्तियों में सौंदर्यबोध के साथ गहरी सामाजिक चेतना भी निहित है। उनकी चर्चित रचनाएँ जैसे “बोझ” शृंखला, टेराकोटा में गर्भवती मजदूर को बोझ उठाते हुए दिखाकर स्त्री-शोषण और समाज की संवेदनहीनता पर कटाक्ष करती हैं। बोझ तले दबे घोड़े की मूर्ति पशु-अत्याचार पर करारा प्रहार है। पी.ओ.पी. में बनी रचनाओं में भिखारियों की स्थिति को सामाजिक कलंक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि नशाखोरी पर बनी सीमेंट मूर्ति, जिसमें एक वृद्ध गांजा पीते हुए दिखाया गया है, समाज की विकृतियों को चुनौती देती है।
विशेष रूप से, शिव बालक जी की बैल-थीम वाली मूर्तियाँ उनकी कला की विशिष्ट पहचान हैं। इन मूर्तियों में वे बैल की शक्ति और नारीत्व की कोमलता को एक साथ प्रस्तुत करते हैं। यह संयोजन जीवन, ऊर्जा और प्रकृति के भीतर सामंजस्य को दर्शाता है। यह कला न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि दर्शक को गहराई से सोचने और जीवन के विरोधाभासों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।
उनकी बैल-थीम वाली मूर्तियों की विशेषताएँ इस प्रकार हैं। इसमें भावनात्मक गहराई है, क्योंकि बैल की शक्ति और नारीत्व की कोमलता का संतुलन जीवन और ऊर्जा का प्रतीक बनता है। इसमें कलात्मक कौशल भी प्रदर्शित होता है, क्योंकि जटिल नक्काशी और विभिन्न मुद्राओं में नारीत्व के तत्व सम्मिलित करना उनके तकनीकी कौशल को उजागर करता है। साथ ही, इसमें दार्शनिक संदेश भी है, जो पुरुष और स्त्री ऊर्जा के सह-अस्तित्व और परस्पर पूरक होने को दर्शाता है। संभावित मूर्तियाँ इस श्रेणी में हो सकती हैं: शक्तिशाली बैल के साथ नाजुक स्त्री आकृति, प्रकृति के तत्वों से सजाया गया बैल, या आध्यात्मिक और रहस्यमयी रूप में नारीत्व के दैवीय पहलुओं को दर्शाती मूर्तियाँ।
*शीर्षक : नंदी
कलाकार : शिव बालक
माध्यम : पत्थर/फाइबर (सतह पर नक्काशीदार पैटर्न)
इस मूर्तिशिल्प में शिव बालक जी ने पारंपरिक नंदी को समकालीन संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है। नंदी यहाँ केवल पौराणिक प्रतीक नहीं बल्कि शांति, शक्ति और धैर्य का जीवंत रूप है। स्थिर मुद्रा में बैठे इस बैल की सतह पर लहरदार रेखाओं और बारीक टेक्सचरिंग का प्रयोग उसे एक गत्यात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। नंदी का चेहरा आत्मीय और सौम्य है, जिसमें आध्यात्मिकता और जीवन के प्रति गहरा विश्वास झलकता है। कलाकार ने रूपांकन में प्रवाह और लय को प्रमुखता दी है। शरीर की सतह पर उकेरी गई तरंगें गति और स्पंदन का आभास कराती हैं, जबकि आकृति की संपूर्ण संरचना ठहराव और स्थिरता का भाव देती है। इस प्रकार यह मूर्ति गति और स्थिरता, शक्ति और शांति के द्वंद्व को एक साथ आत्मसात करती है। यह रचना बताती है कि शिव बालक केवल आकार गढ़ने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उसके भीतर छिपे सांस्कृतिक और दार्शनिक आशयों को भी मूर्त रूप देते हैं। उनकी यह शैली भारतीय परंपरा को आधुनिक शिल्पभाषा में रूपांतरित कर दर्शक को गहरे अनुभव से जोड़ती है।
शिव बालक जी की कला-यात्रा केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं रही; कुछ वर्ष पूर्व वे गंभीर बीमारी—कैंसर—से जूझे। उस कठिन दौर में कला-जगत और समाज ने उनकी मदद की। परंतु विपरीत परिस्थितियों ने उनके रचनात्मक हौसले को कमजोर नहीं किया। उनके जीवन और संघर्ष का यह पहलू उनकी मूर्तियों और पेंटिंग्स में झलकता है।
समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो शिव बालक जी की कला की प्रमुख विशेषताएँ हैं—प्रयोगधर्मिता, सामाजिक सरोकार, और सौंदर्य व प्रश्न का संतुलन। वे केवल मूर्तिकार नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय कला में सामाजिक चेतना के शिल्पकार हैं। उनकी मूर्तियाँ और चित्र दर्शक को सोचने, आत्ममंथन करने और समाज में परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करती हैं। उनकी कला, चाहे बैल-थीम वाली हो या सामाजिक संदेश वाली, हमें यह याद दिलाती है कि शक्ति और कोमलता, पुरुष और स्त्री, संघर्ष और सौंदर्य—सभी एक-दूसरे के पूरक हैं।
– भूपेंद्र कुमार अस्थाना 29 सितंबर 2025
आवरण चित्र परिचय : भूपेन्द्र कुमार अस्थाना एवं शिवबालक जी