वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की कलम का कायल हूं। पिछले दिनों उनसे मिलने कलाकार मित्र भूपेंद्र अस्थाना के साथ उनके आवास मोतीनगर, लखनऊ जाना हुआ। देर रात तक ढेरों बतकही और चर्चाओं के बीच रात्रि भोजन का दौर चला। अपनी तरह के संभवतः इकलौते मन मिजाज वाले इन जैसों से मिलना, नई जानकारियों एवं संस्मरणों का पिटारा खुलने जैसा लगता है।
इन सभी बातों के बावजूद उनके इस घर ने जिस चीज से बेहद प्रभावित किया, वह था पूरे घर की दीवारों पर मौजूद चित्रकारी। पूरे घर में कोई भी ऐसी दीवार या कोना नहीं था जो चित्रों से सजा नहीं था। वैसे इससे पहले भी हमने कई घर की दीवारों पर बच्चों द्वारा बनाए चित्र देखे हैं, किंतु पहली बार किसी ऐसे घर में था। जिसका इंच दर इंच इन चित्रों से भरा था I हम कलाकारों का तो मानना है कि इस तरह के बच्चों को भरपूर प्रोत्साहन मिलना चाहिए। क्योंकि घर की दीवारों को तो आप कभी भी साफ सफ़्फाक कर सकते हैं। किंतु अपने बच्चों का बचपन आप दुबारा लौटा नहीं सकते हैं। शायद इसीलिए निदा फ़ाज़ली साहब ने कहा है:
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे

बच्चों द्वारा रेखाएं खींचने या घर की दीवारों पर चित्र बनाने की इस प्रक्रिया के बारे में समझा जाता है कि इसके जरिये वे अपनी उपस्थिति दर्शाना चाहते हैं I यहाँ यह प्रयास कुमार सौवीर के नाती भावार्थ मिश्र की अभिव्यक्ति थी I बच्चों द्वारा इस अभिव्यक्ति पर वरिष्ठ कला इतिहासकार/समीक्षक जोनी एमएल की टिप्पणी है कि –“ चित्र बनाना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। दरअसल इसके जरिये वे किसी न किसी रूप में इस संसार पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं I दीवारों पर चित्र बनाना इसी मूल प्रवृत्ति का प्रारम्भिक रूप है, जो मनुष्य में बचपन से ही दिखाई देता है। बच्चे जब दीवारों पर चित्र बनाते हैं तो वे केवल खेल नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी दुनिया को समझने और उसे व्यक्त करने का प्रयास कर रहे होते हैं I
बड़ों को ये चित्र भले ही सरल, भोले या अर्थहीन प्रतीत हों, परंतु वास्तव में ये चित्र बच्चों की अपनी जटिल प्रतीकात्मक भाषा का हिस्सा होते हैं। उनके लिए यह अपने आसपास की दुनिया से संवाद और सामंजस्य बनाने की प्रक्रिया का सर्वाधिक सहज और सुलभ माध्यम है। आगे चलकर जब उन्हें अभिव्यक्ति के अन्य साधन मिल जाते हैं तो अधिकांश लोग इस तरह के चित्र बनाना अक्सर छोड़ ही देते हैं। लेकिन कुछ लोग जो इस प्रवृत्ति को बनाए रखते हैं, वही आगे चलकर चित्रकार बनते हैं।“

वहीँ मनोविज्ञान बच्चों द्वारा घर की दीवारों पर चित्र बनाने की इस प्रवृत्ति को शरारत या अनुशासनहीनता के रूप में नहीं, बल्कि उनके स्वाभाविक विकासक्रम के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखता है। विकासात्मक मनोवैज्ञानिक जैसे
जीन पिअगेट का मानना है कि प्रारंभिक अवस्था में बच्चा प्रतीकों के माध्यम से संसार को समझना शुरू करता है। दीवार पर रेखाएँ खींचना उसके लिए केवल आकृति बनाना नहीं, बल्कि अनुभवों को व्यवस्थित करने का प्रयास है।
इसी प्रकार सिगमंड फ्रायड की मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से यह क्रिया दबी हुई इच्छाओं, जिज्ञासा और आत्म-अभिव्यक्ति का रूप हो सकती है। आधुनिक बाल मनोविज्ञान इसे स्किल विकास, रचनात्मकता और आत्म-पहचान के निर्माण से भी जोड़ता है। इस तरह से देखें तो दीवारों पर बने चित्र बच्चे की आंतरिक दुनिया, उसकी भावनाओं और परिवेश से उसके संवाद का दृश्य दस्तावेज़ माने जाते हैं।
तो इसलिए अनुरोध है कि अब जब भी आपका बच्चा घर की दीवारों पर अपनी दुनिया उकेरने लगे तो उसे रोकिए नहीं। अपनी दुनिया रचने या सिरजने के लिए खुला आकाश दे दीजिए। मेरे लिए ऐसे तमाम माता पिता और अभिभावक स्तुत्य हैं जो अपने बच्चों के लिए घर की दीवारों की सफेदी की कुर्बानी देने से हिचकते नहीं हैं। वैसे तो इन बाल कलाकार का नाम है “भावार्थ मिश्रा ” लेकिन नानाजी यानी कुमार सौवीर ने इन्हें नाम दिया है “च्यवनप्राश”।
-सुमन कुमार सिंह
कलाकार/कला समीक्षक
